मो इसराइल बबलू
बिलासपुर।दिवाली की जगमग रात — जहां खुशियां और रोशनी हर ओर बिखरी थी, वहीं कुछ घरों में मातम उतर आया। पूजा स्थल के पास खेल रही 10 साल की काव्या अचानक गिर गई और वहीं रखी पीतल की घंटी उसकी आंख में धंस गई। टक्कर इतनी गहरी थी कि घंटी ने आंख की झिल्ली को फाड़ते हुए सीधे मस्तिष्क (ब्रेन) तक रास्ता बना लिया। कुछ ही मिनटों में घर का माहौल चीख-पुकार में बदल गया।इसी रात जूना बिलासपुर क्षेत्र से दो मासूम बच्चे भी पटाखे की चपेट में आकर झुलस गए, जिनकी आंखों में जलन और चेहरा झुलसने की स्थिति थी।दिवाली की रात, जब शहर के अस्पतालों में स्टाफ सीमित होता है, तब छत्तीसगढ़ आयु विज्ञान संस्थान (सिम्स), बिलासपुर ने आपात टीम के साथ लगातार ड्यूटी निभाते हुए तीनों बच्चों की जान बचाने में सफलता पाई।
घटना का सिलसिला: तीन जिंदगियों की दौड़ के बीच सिम्स की रात

- रात करीब 8 बजे, काव्या पूजा स्थल के पास फिसली और घंटी उसकी आंख में जा घुसी, जिसने आंख की झिल्ली फाड़कर मस्तिष्क तक प्रवेश कर लिया।
- परिजन तत्काल सिम्स पहुंचे — अधीक्षक डॉ. लखन सिंह, प्रो. रमेश मूर्ति और आई विभाग की टीम ने रक्तस्राव रोकने व प्राथमिक सर्जिकल कंट्रोल किया।
- न्यूरोसर्जरी की आवश्यकता होने पर बच्ची को रात में ही रायपुर रेफर किया गया।
- दूसरी ओर, रात 12 बजे के आसपास जूना बिलासपुर से दो बच्चे पटाखों से झुलसकर सिम्स पहुंचे।
- दोनों की आंखें और चेहरा बुरी तरह प्रभावित थे, पर डॉ. एस और डॉ. दिन की सुपरविजन में तत्काल ड्रेसिंग, आई-वॉश और बर्न मैनेजमेंट किया गया।
- तीनों बच्चों की स्थिति अब स्थिर है, और सिम्स की तत्परता के कारण बड़ी दुर्घटना टल गई।
सिम्स की चिकित्सा-तत्परता और संवेदनशीलता

सिम्स बिलासपुर ने यह दिखाया कि जब चिकित्सा व्यवस्था में इंसानियत और विशेषज्ञता साथ चलें, तब चमत्कार संभव हैं। दिवाली की रात भी अस्पताल की इमरजेंसी यूनिट पूरी तरह सक्रिय रही। अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने स्वयं कमान संभाली, वहीं प्रोफेसर मूर्ति ने आंख और मस्तिष्क से जुड़ी गंभीर चोट के बावजूद सर्जिकल नियंत्रण में सफलता हासिल की।
उसी रात, जब अधिकांश स्टाफ अवकाश पर था, बर्न केस को संभालने के लिए टीम ने मिनटों में उपचार शुरू किया।
सिम्स ने एक ही रात में तीन बच्चों के जीवन की डोर थामकर साबित किया कि बिलासपुर अब स्वास्थ्य आपात स्थितियों में किसी भी महानगर से पीछे नहीं है।
प्राथमिक उपचार की गुणवत्ता, त्वरित निर्णय, और मरीज को सही समय पर रेफर करने की प्रक्रिया सिम्स को राष्ट्रीय स्तर पर ‘इमरजेंसी मॉडल’ अस्पताल की श्रेणी में ला खड़ा करती है।
डीन और एमएस की जोड़ी ने सुधारी सिम्स की छवि

सिम्स बिलासपुर के डीन और एमएस की टीम ने दिखाया कि संकट में तत्परता किसे कहते हैं। रात 12 बजे जब पटाखे से झुलसे बच्चे अस्पताल पहुंचे, तब दोनों डॉक्टर पहले से अलर्ट मोड पर थे। उन्होंने पल भर में बर्न यूनिट तैयार कर उपचार शुरू किया। ऐसे वक्त पर उनका समर्पण, संवेदनशीलता और निर्णय क्षमता यह साबित करती है कि सिम्स की मेडिकल टीम केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि समाज की आपात-जीवनरेखा हैं।
“त्योहारों में सुरक्षा आपकी जिम्मेदारी”
1. पूजा स्थल के पास बच्चों को अकेला न छोड़ें। तेज़ रोशनी और फिसलन के बीच दुर्घटनाएं आम होती हैं।
2. घंटी, दीपक, या सजावटी वस्तुओं को बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
3. पटाखे जलाने के समय हमेशा बाल्टी में पानी या फायर बकेट रखें।
4. बच्चों को पटाखे हाथ में लेकर जलाने से रोकें — विशेषकर अनार, रॉकेट, चकरी जैसे पटाखे।
5. जलने की स्थिति में घी, तेल या टूथपेस्ट न लगाएं — तुरंत ठंडे पानी से धोकर अस्पताल जाएं।
6. आंखों में चुभन या धुआं जाने पर घर पर उपचार न करें, तुरन्त आई-डॉक्टर से जांच कराएं।
7. घर में प्राथमिक चिकित्सा किट हमेशा तैयार रखें।
8. और सबसे जरूरी — हादसे के बाद घबराएं नहीं, तुरंत नजदीकी हॉस्पिटल का रुख करें।
मेरी भी सुनिए….
दिवाली की यह रात दो परिवारों के लिए यादगार नहीं, बल्कि सबक बन गई। एक मासूम की आंख से मस्तिष्क तक जा घुसी घंटी, और दो बच्चों की आंखें पटाखे से झुलस गईं — पर सिम्स बिलासपुर की तत्परता ने तीनों की जान बचाई। यह कहानी बताती है कि जब चिकित्सा प्रणाली तैयार होती है, तो दुर्घटनाएं भले घातक हों, लेकिन ज़िंदगियां फिर भी बचाई जा सकती हैं।
Mohammed israil



