बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा, संस्कृति और सामाजिक समरसता से जुड़े भोजली पर्व को लेकर बिलासपुर में एक बड़ा सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है। अरपा नदी के किनारे भोजली विसर्जन के लिए स्थायी और व्यवस्थित घाट कब बनेगा? वर्षों से उठती आ रही इस मांग को लेकर आयोजकों ने एक बार फिर जनप्रतिनिधियों और प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ की पहचान और परंपराओं को संरक्षित करने की बातें लगातार होती हैं, लेकिन जिस पर्व में महिलाओं की आस्था और बड़ी संख्या में लोगों की सहभागिता होती है, उसके लिए अब तक सुविधाजनक और सुरक्षित स्थायी घाट का निर्माण नहीं हो पाना गंभीर चिंता का विषय है।
पत्रकारों से चर्चा के दौरान भोजली घाट के विकास का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। आयोजकों ने कहा कि अरपा नदी बिलासपुर की पहचान है और भोजली जैसी महत्वपूर्ण लोकपरंपरा का इससे गहरा सांस्कृतिक संबंध है। इसके बावजूद भोजली विसर्जन के लिए नदी किनारे वर्षों से कोई ऐसा स्थायी, व्यवस्थित और सुरक्षित घाट विकसित नहीं किया गया, जहां पर्व के दौरान महिलाओं और श्रद्धालुओं को आवश्यक सुविधाएं मिल सकें।
वर्षों से उठ रही मांग, अब तक नहीं बनी बात
आयोजकों के मुताबिक, भोजली के लिए स्थायी घाट बनाए जाने की मांग नई नहीं है। कई वर्षों से स्थानीय स्तर पर इस मांग को उठाया जाता रहा है। स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों के समक्ष भी इस विषय को रखा गया है, लेकिन अब तक अपेक्षित कार्रवाई जमीन पर दिखाई नहीं दी है।
हर वर्ष भोजली पर्व आने पर नदी किनारे विसर्जन की व्यवस्था को लेकर लोगों को अस्थायी इंतजामों पर निर्भर रहना पड़ता है। आयोजकों का सवाल है कि जब बिलासपुर शहर में अरपा नदी के संरक्षण, सौंदर्यीकरण और विकास को लेकर लगातार योजनाओं और चर्चाओं की बात होती है, तो अरपा के घाटों को लोकसंस्कृति और पारंपरिक पर्वों से जोड़कर विकसित करने की दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं हो रही?
महिलाओं की आस्था से जुड़ा पर्व, फिर भी सुरक्षित घाट नहीं
भोजली केवल एक धार्मिक या पारंपरिक आयोजन भर नहीं है। यह छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और विशेष रूप से महिलाओं की आस्था, सहभागिता और सामूहिक सामाजिक जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। महिलाएं भोजली की स्थापना, पूजा-अर्चना और विसर्जन की परंपरा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
ऐसे में आयोजकों ने सवाल उठाया कि जब पर्व में महिलाओं की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका है, तो उनके लिए नदी किनारे सुरक्षित, स्वच्छ, सुविधाजनक और व्यवस्थित घाट उपलब्ध कराना प्राथमिकता क्यों नहीं बन सकता?
उनका कहना है कि स्थायी घाट का निर्माण केवल भोजली पर्व के एक दिन के आयोजन के लिए नहीं होगा, बल्कि इससे शहर की लोकपरंपराओं को स्थायी पहचान मिलेगी। घाट विकसित होने के बाद वहां अन्य पारंपरिक और सामाजिक आयोजनों के लिए भी बेहतर व्यवस्था की जा सकती है।
संस्कृति संरक्षण सिर्फ भाषणों तक सीमित न रहे
आयोजकों ने कहा कि छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़िया संस्कृति, लोकपरंपराओं और पारंपरिक पर्वों को संरक्षित करने की बात लगातार कही जाती है। लेकिन संस्कृति केवल कार्यक्रम आयोजित करने या मंचों से इसकी चर्चा करने से संरक्षित नहीं होगी। इसके लिए परंपराओं से जुड़े स्थलों और व्यवस्थाओं को भी विकसित करना होगा।
भोजली पर्व इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यदि आने वाली पीढ़ियों को अपनी लोकपरंपराओं से जोड़ना है तो ऐसे पर्वों के लिए आवश्यक आधारभूत सुविधाएं विकसित करनी होंगी। आयोजकों का कहना है कि भोजली घाट का विकास इसी दिशा में एक ठोस और स्थायी कदम हो सकता है।
अरपा और भोजली—बिलासपुर की पहचान से जुड़ा सवाल
बिलासपुर की पहचान अरपा नदी से जुड़ी हुई है। ऐसे में अरपा किनारे भोजली के लिए स्थायी घाट का निर्माण केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने का भी सवाल है।
आयोजकों ने मांग रखी कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस विषय को केवल मौसमी मांग के रूप में न देखें। भोजली पर्व से पहले अस्थायी व्यवस्था करने के बजाय दीर्घकालिक योजना बनाकर अरपा नदी के उपयुक्त स्थल पर स्थायी घाट विकसित किया जाए। वहां महिलाओं और श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षित पहुंच, साफ-सफाई, प्रकाश व्यवस्था, बैठने की जगह और अन्य आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएं।
सवाल अब सिर्फ घाट का नहीं, संस्कृति के भविष्य का है
आयोजकों ने स्पष्ट कहा कि छत्तीसगढ़िया संस्कृति को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या किसी एक संस्था की नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति की इसमें भूमिका है। सरकार और प्रशासन आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं, संस्थाएं जागरूकता पैदा कर सकती हैं और समाज अपनी परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा सकता है।
भोजली पर्व के माध्यम से इसी सामूहिक जिम्मेदारी और सामाजिक समरसता का संदेश जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन इसके साथ अब एक सवाल भी मजबूती से सामने आया है—अगर बिलासपुर अपनी लोकसंस्कृति और छत्तीसगढ़िया पहचान को सहेजना चाहता है, तो भोजली के लिए अपना स्थायी घाट कब बनाएगा?
यह मांग अब केवल एक घाट के निर्माण की मांग नहीं रह गई है। यह बिलासपुर की लोकसंस्कृति, महिलाओं की आस्था, अरपा नदी और शहर की छत्तीसगढ़िया पहचान से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। आयोजकों ने उम्मीद जताई कि संबंधित जनप्रतिनिधि और प्रशासन इस मांग को गंभीरता से लेते हुए ठोस पहल करेंगे, ताकि आने वाले वर्षों में भोजली पर्व के लिए बिलासपुर को एक व्यवस्थित और गौरवपूर्ण स्थायी घाट मिल सके।



