मोहम्मद इसराइल बबलू
छत्तीसगढ़ में जिला-शहर अध्यक्षों की कुर्सी पर आर-पार की लड़ाई — ब्राह्मण बनाम ओबीसी समीकरण, बघेल- महंत- सिंहदेव खेमे की रस्साकशी तेज; दिल्ली में होगी आखिरी जंग
रायपुर/बिलासपुर |
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में ‘संगठन सृजन अभियान’ अब निर्णायक दौर में पहुंच चुका है। लेकिन पार्टी के इस आंतरिक चुनावी अभ्यास में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की राजनीति, बढ़ती लॉबिंग, और बागी समीकरण ने तस्वीर को जटिल बना दिया है।
बिलासपुर जैसे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली जिले में शहर और जिला अध्यक्ष के पद को लेकर मचे घमासान ने प्रदेश की कांग्रेस राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
यह लड़ाई अब सिर्फ पद की नहीं, बल्कि जातीय प्रतिनिधित्व और शक्ति संतुलन की भी बन चुकी है।
70 दावेदार, लेकिन सोशल इंजीनियरिंग बनी निर्णायक कसौटी
बिलासपुर में शहर और जिला अध्यक्ष पद के लिए करीब 70 दावेदारी आवेदन आए हैं। इनमें पूर्व विधायक शैलेष पांडेय से लेकर मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया तक के नाम चर्चा में हैं — भले ही उन्होंने औपचारिक आवेदन नहीं दिया हो।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस पर्यवेक्षक उमंग सिंघार ने सभी दावेदारों और स्थानीय नेताओं से चर्चा कर रिपोर्ट तैयार कर ली है, जिसे 24 अक्टूबर तक हाईकमान को सौंपा जाएगा।
संगठन सूत्रों के मुताबिक, प्रारंभिक रूप से यह संकेत मिला है कि —
“शहर अध्यक्ष का पद सामान्य वर्ग (संभावित रूप से ब्राह्मण) को और जिला अध्यक्ष का पद ओबीसी वर्ग से किसी को दिया जा सकता है।”
इस निर्णय में आस-पास के जिलों — मुंगेली, जीपीएम और कोरबा — के जातीय-सामाजिक समीकरणों को भी संतुलन में रखा जा रहा है।
तीन खेमों की तिकड़ी : बघेल, महंत और सिंहदेव के प्रभाव में चयन
प्रदेश कांग्रेस में फिलहाल तीन ध्रुवीय शक्ति केंद्र उभरकर सामने हैं —
पूर्व सीएम भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत, और पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव।
तीनों ही अपने-अपने गुटों के प्रभाव वाले जिलों में अध्यक्ष पदों पर अपने समर्थकों की नियुक्ति के लिए सक्रिय लॉबिंग कर रहे हैं।
बिलासपुर में भी यही तीनों ध्रुव टकरा रहे हैं।
एक ओर बघेल खेमे के नेता ‘जमीनी कार्यकर्ता’ को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं, वहीं महंत गुट अनुभवी और प्रशासनिक सोच वाले नेताओं को तरजीह देना चाहता है। सिंहदेव समर्थक meanwhile ‘युवा और सर्वसमावेशी चेहरों’ को आगे लाने की मांग कर रहे हैं।
जातीय संतुलन का फार्मूला : ब्राह्मण बनाम ओबीसी समीकरण
बिलासपुर शहर संगठन में ब्राह्मण वर्ग की मजबूत पकड़ रही है — नामों में महेश दुबे, राजकुमार तिवारी, दिलीप पाटिल, सिद्धांशु मिश्रा, दीपांशु श्रीवास्तव, स्वर्णा शुक्ला, सीमा पांडेय जैसे दावेदार शामिल हैं।
वहीं जिला स्तर पर ओबीसी चेहरों में लक्ष्मीनाथ साहू, शिवबालक कौशिक, त्रिलोक श्रीवास, राजेंद्र साहू (डब्बू) और नीरज जायसवाल प्रमुख नामों में हैं।
पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व इस बार ‘वोटर स्ट्रक्चर’ के अनुरूप संतुलन साधने की रणनीति पर चल रहा है, ताकि 2028 विधानसभा चुनाव से पहले जातीय वर्गों में भरोसे की कमी न हो।
दिल्ली में आखिरी दौर की फाइनल स्क्रीनिंग — स्थानीय हस्तक्षेप नहीं
कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान में पहली बार “लोकल इंटरफेरेंस फ्री” चयन प्रक्रिया अपनाई है।
पर्यवेक्षकों द्वारा एकत्रित रिपोर्ट के आधार पर 22 अक्टूबर को सभी रिपोर्ट दिल्ली पहुंचेंगी, और उसके अगले दिन 23 अक्टूबर को एआईसीसी की केंद्रीय स्क्रीनिंग बैठक होगी, जिसमें प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज और नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत से फीडबैक लिया जाएगा।
सभी नामों की वन-टू-वन चर्चा दिल्ली में होगी और किसी भी स्थानीय नेता को इस प्रक्रिया से दूर रखा जाएगा।
यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि “गुट विशेष की पैरवी” से बचा जा सके।
संगठन का विस्तार : 1,200 से अधिक मंडल और 25,000 पदाधिकारी
राज्य में कांग्रेस अब तक का सबसे बड़ा सांगठनिक ढांचा तैयार कर रही है।
1,200 से अधिक मंडल कमेटियों में लगभग 25,000 नए पदाधिकारी बनाए जाएंगे। प्रत्येक मंडल में एक अध्यक्ष, तीन उपाध्यक्ष, एक कोषाध्यक्ष, तीन सचिव, तीन सहसचिव, एक सोशल मीडिया संयोजक और नौ कार्यकारिणी सदस्य होंगे।
ब्लॉक अध्यक्षों की सूची पहले ही दिल्ली भेजी जा चुकी है, और जिलाध्यक्षों के चयन के बाद मंडल व सेक्टर कमेटियों की घोषणा की जाएगी।
शहर संगठन का विस्तार भी चर्चा में
बिलासपुर शहर संगठन फिलहाल बिलासपुर विधानसभा क्षेत्र तक सीमित है, लेकिन नए अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद इसे नगर निगम सीमा तक विस्तारित करने पर विचार किया जा रहा है।
यदि ऐसा हुआ, तो शहर अध्यक्ष को बेलतरा, बिल्हा और वाडों के प्रत्याशी चयन अधिकार भी प्राप्त होंगे — जिससे संगठन का क्षेत्रीय प्रभाव और बढ़ेगा।
‘संगठन सृजन’ या ‘सत्ता संतुलन’?
कांग्रेस का यह अभियान महज सांगठनिक नहीं बल्कि आंतरिक शक्ति पुनर्गठन की कवायद भी बन चुका है।
‘सोशल इंजीनियरिंग’ के नाम पर जातीय समीकरणों का पुनर्विन्यास किया जा रहा है, और इसके जरिए हाईकमान आगामी चुनावी रणनीति की नींव रख रहा है।
पर्यवेक्षकों की रिपोर्टें अब ‘पार्टी में किसकी चल रही है’ का बैरोमीटर बनेंगी —
जहां कुछ नाम संतुलन साधेंगे, वहीं कुछ बागी भी उत्पन्न हो सकते हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि
“संगठन सृजन दरअसल कांग्रेस का 2028 के लिए सामाजिक और सांगठनिक ‘री-इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट’ है।”
मेरी भी सुनिए…
बिलासपुर से लेकर रायपुर तक कांग्रेस की इस सांगठनिक कवायद में गुटबाज़ी, जातीयता और लॉबिंग एक साथ चल रही है।
अब नज़रें दिल्ली पर हैं, जहां कांग्रेस की ‘संगठन सृजन’ स्क्रिप्ट का आखिरी पन्ना लिखा जाएगा —
और तय होगा कि पार्टी छत्तीसगढ़ में संगठन को सशक्त बनाती है या बागियों को जन्म देती है।
Mohammed israil bablu
9993077736



