मो इसराइल बबलू
पार्ट 2….जब मिठास में घुला ज़हर
त्योहार की मिठास अब सेहत पर भारी पड़ रही है। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में दीपावली की तैयारियों के बीच “मीठा ज़हर” का कारोबार तेज हो चुका है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश से ट्रकभर मिलावटी मावा शहर में पहुंच चुका है। कलेक्टर और खाद्य विभाग की कार्रवाई जारी है, लेकिन जांच के बावजूद ज़हरीली मिठाइयां खुलेआम बिक रही हैं। सैकड़ों किलो नकली मावा जब्त और नष्ट किया जा चुका है, पर सवाल यह है — कितना ज़हर पहले ही आपकी थाली तक पहुंच चुका है?
‘शुद्ध आहार, मिलावट पर वार’ —जयपुर समेत देश के विभिन्न शहरों में हो चुकी है बड़ी कार्रवाई
दीपावली के ठीक पहले जिले में खाद्य एवं औषधि विभाग की टीमें लगातार छापे मार रही हैं।
- 12 मावा व्यापारियों के यहां से 13 नमूने लिए गए।
- जयपुर में 1,380 किलो मिलावटी मावा मौके पर नष्ट किया गया।
- छत्तीसगढ़ में मिठाई दुकानों से काजू कतली, बुंदी लड्डू, रोल बर्फी, बेसन पात्रा, मथुरा पेड़ा और गोंद लड्डू के नमूने जांच हेतु रायपुर की लैब में भेजे गए हैं।
लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई केवल सैंपल और सीज़िंग तक सिमटी है, जबकि बाज़ारों में मिलावटी मावा से बनी मिठाइयां धड़ल्ले से बिक रही हैं।
🚨 कैसे बनता है मिलावटी मावा — सस्ती लागत, ज़हरीला नतीजा
मावा असली दूध को घंटों तक उबालकर गाढ़ा करने से बनता है।
लेकिन मिलावटखोर तेज़ मुनाफे के लिए नकली फॉर्मूला अपनाते हैं —
मिलावटी मावा का “रेसिपी ऑफ़ ज़हर”:
- स्किम्ड मिल्क पाउडर को पानी में घोला जाता है।
- उसमें तेल, यूरिया, स्टार्च, डिटर्जेंट पाउडर और कभी-कभी कास्टिक सोडा मिलाया जाता है।
- इस मिश्रण को गर्म करके ठंडा किया जाता है — दिखने में यह असली मावे जैसा लगता है।
- लागत आती है 50 से 70 रुपए किलो, जबकि असली मावे की लागत 300 रुपए किलो से कम नहीं।
यही “मावा” मिठाई की दुकानों तक पहुंचता है — और वहां से लोगों की थाली में, सीधे शरीर में।
पहचानिए असली और नकली मावा
तुलना असली मावा मिलावटी मावा रंग हल्का पीला या क्रीमी सफेद या चमकीला गंध दूध जैसी हल्की केमिकल या साबुन जैसी बनावट दानेदार और मुलायम चिकना और खिंचाव वाला पानी में घोलने पर पूरी तरह घुलता नहीं झाग बनाता है, डिटर्जेंट जैसा व्यवहार कीमत ₹300–₹400 प्रति किलो ₹100–₹150 प्रति किलो
सेहत पर असर — मीठे में घुला ज़हर
डॉ. एन अग्रवाल (फूड टॉक्सिकोलॉजिस्ट, रायपुर):
“मिलावटी मावा में मौजूद यूरिया और डिटर्जेंट सीधे किडनी और लिवर को नुकसान पहुंचाते हैं। कास्टिक सोडा आंतों की झिल्ली को जलाता है। लंबे समय तक सेवन से पाचन तंत्र नष्ट हो सकता है।”
डॉ. मनीषा (पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट):
“ऐसे मावे से बनी मिठाई बच्चों के लिए बेहद खतरनाक है। यह फूड पॉइजनिंग, उल्टी, दस्त, और गैस्ट्रिक इन्फेक्शन का बड़ा कारण है।”
‘मीठे ज़हर’ के दुष्प्रभाव
मिलावट शरीर पर असर यूरिया लीवर, किडनी फेल्योर स्टार्च पाचन बाधित डिटर्जेंट आंतों की झिल्ली में सूजन कास्टिक सोडा पेट में जलन, अल्सर सिंथेटिक मिल्क पाउडर हॉर्मोनल असंतुलन, कैंसर का खतरा
कहां से आ रहा है यह “मीठा ज़हर”
त्योहार के मौसम में बिलासपुर समेत रायपुर, दुर्ग और कोरबा में जो मावा पहुंच रहा है, उसका बड़ा हिस्सा बाहरी राज्यों से आता है —
- मुरैना, ग्वालियर, मथुरा, आगरा (एमपी-यूपी बेल्ट)
- जयपुर और अलवर (राजस्थान)
रेलवे स्टेशनों और हाइवे पर पहले एफडीए की जांच चौकियां हुआ करती थीं, लेकिन इस बार न तो जांच नाकों की सख्ती दिखी, न ही किसी बड़े नेटवर्क पर कार्रवाई।
यानी मिलावट का सिंडिकेट बिना डर के सक्रिय है।
जांच के बावजूद खुली बिक्री
- गोल बाजार, राजकिशोर नगर, लिंक रोड, मुंगेली नाका, सिरगिट्टी, और तखतपुर रोड पर मिठाई की दुकानें पहले से सजी हैं।
- बड़ी दुकानों से लेकर छोटे ठेलों तक में वही मावा आधारित बर्फी, पेड़ा और लड्डू बिक रहे हैं जिनकी गुणवत्ता संदिग्ध है।
- विभागीय अधिकारी केवल “नमूना लेने” और “नष्ट करवाने” तक सीमित हैं, कोई गिरफ्तारी या फैक्ट्री सीलिंग अब तक नहीं हुई।
“शुद्ध आहार” बनाम “मिलावट पर वार” — हकीकत का आइना


कलेक्टर संजय अग्रवाल के निर्देश पर बिलासपुर में “शुद्ध आहार मिलावट पर वार” अभियान चलाया जा रहा है।
खाद्य सुरक्षा अधिकारी अंकित गुप्ता और अविषा मरावी के नेतृत्व में दर्जनों प्रतिष्ठानों की जांच की गई।
लेकिन हकीकत यह है —
➡️ लैब रिपोर्ट आने तक मिठाइयां बिक चुकी होती हैं।
➡️ जब तक कार्रवाई होती है, नया स्टॉक आ जाता है।
➡️ त्योहार खत्म होते ही अभियान भी खत्म हो जाता है।
क्यों नहीं रुक पा रहा मिलावट का कारोबार
कारण परिणाम सीमित जांच स्टाफ हज़ारों प्रतिष्ठानों की निगरानी असंभव त्योहार-आधारित अभियान मौसमी कार्रवाई से स्थायी नियंत्रण नहीं सस्ती लागत, भारी मुनाफा व्यापारी बार-बार जोखिम उठाते हैं बाहरी सप्लाई चैन स्थानीय नियंत्रण विफल उपभोक्ता की अनजानियत डिमांड बनी रहती है
🔍 “मीठा ज़हर” की पड़ताल: एक हकीकत
रिपोर्टर ने मिठाई व्यापारी बनकर एक डिस्ट्रीब्यूटर से संपर्क किया —
उसने 180 रुपए किलो में “शुद्ध मावा” देने की पेशकश की।
जब असली मावे की लागत ही 300 रुपए किलो है, तो इतना सस्ता मावा सिर्फ केमिकल से ही तैयार हो सकता है।
डीलर ने कहा —
“भैया, ये सब जगह यही चलता है… लुक्स से तो असली लगता है, बाकी कौन जांचता है?”
मेरी भी सुनिए… अब वक्त है स्थायी व्यवस्था का
त्योहार की मिठास को मिलावट का ज़हर निगल रहा है।
सरकार को “त्योहार आधारित जांच” से आगे बढ़कर सालभर सक्रिय फूड मॉनिटरिंग नेटवर्क बनाना होगा।
जिला स्तर पर फूड विजिलेंस सेल, ऑनलाइन रिपोर्टिंग पोर्टल, और सार्वजनिक लैब रिपोर्ट डिस्प्ले अनिवार्य किया जाए।
जब तक उपभोक्ता जागरूक नहीं होगा, और सख्त कानूनी दंड लागू नहीं होंगे —
“मीठा ज़हर” हर साल त्योहार के साथ लौटता रहेगा।
मिठास की आड़ में मौत का कारोबार
बिलासपुर समेत पूरे छत्तीसगढ़ में त्योहारों की सजावट के पीछे स्वास्थ्य की सबसे बड़ी साजिश चल रही है।
मिलावटी मावा और नकली मिठाइयां जनस्वास्थ्य के लिए “धीमी मौत” साबित हो रही हैं।
मिठास का यह व्यापार, असल में ज़हर की फैक्ट्री बन चुका है।



