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आदिम जाति कल्याण विभाग फिर विवादों में — टेंडर, प्रोत्साहन राशि और अब छात्रावास प्रवेश में भी घोटाले का साया

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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मो इसराइल बबलू


बिलासपुर, 14 अक्टूबर 2025।
जिले का आदिम जाति कल्याण विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। गर्मियों में सामने आए टेंडर गड़बड़ी और प्रोत्साहन राशि में रिश्वतखोरी के आरोपों के बाद अब कलेक्टर जनदर्शन में विभाग से जुड़ा एक और मामला सामने आया है। इस बार अनुसूचित जाति कन्या छात्रावास, लिंक रोड की अधीक्षिका पर कम अंक पाने वाली छात्राओं को प्रवेश देने की शिकायत की गई है। कलेक्टर संजय अग्रवाल ने इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए आदिवासी विकास विभाग के आयुक्त को जांच और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

जनदर्शन के दौरान कलेक्टर ने कहा कि “किसी भी सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” वहीं विभाग से जुड़े मामलों के लगातार उजागर होने पर जिला प्रशासन की निगाह अब इस पूरे तंत्र पर और पैनी हो गई है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों से आदिवासी कल्याण विभाग का नाम बार-बार भ्रष्टाचार, मनमानी और ठेके में अनियमितता को लेकर सुर्खियों में रहा है।

  • मई माह में छात्रावासों की मरम्मत और सामग्री आपूर्ति के टेंडर में गड़बड़ी की शिकायतें आई थीं।
  • जून में छात्रवृत्ति और प्रोत्साहन राशि देने में दलालों द्वारा कमीशनखोरी का मामला उजागर हुआ था।
  • अब अक्टूबर में, छात्रावास प्रवेश की प्रक्रिया में पक्षपात और नियम विरुद्ध चयन का मामला सामने आ गया है।

शहर के जानकारों का कहना है कि यह विभाग धीरे-धीरे “आदिवासी कल्याण” से अधिक “आदिवासी शोषण” का अड्डा बनता जा रहा है, जहां नियम-कायदों से ज्यादा सिफारिश और लेनदेन का बोलबाला है।

कलेक्टर अग्रवाल की जनदर्शन बैठक में यह मामला सामने आते ही अफसरों में हड़कंप मच गया। जनदर्शन में अन्य मामलों के साथ इस शिकायत को भी प्रशासन ने “संवेदनशील श्रेणी” में दर्ज किया है। कलेक्टर ने आयुक्त को निर्देशित किया है कि जांच रिपोर्ट सीधे उनके कार्यालय को भेजी जाए ताकि आगे की कार्यवाही तय की जा सके।


पिछली गर्मियों में भी आदिवासी कल्याण विभाग के अधीन आने वाले कई छात्रावासों में मनमानी की शिकायतें हुई थीं — कहीं घटिया भोजन परोसे जाने की बात सामने आई, तो कहीं छात्राओं से अनुचित वसूली के आरोप लगे थे। विभागीय कार्रवाई के नाम पर केवल नोटिस देकर मामले ठंडे कर दिए गए। अब यह नया मामला फिर से उस सुस्त निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।

स्थानीय प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि विभाग के कुछ कर्मचारी और ठेकेदारों के बीच गठजोड़ के चलते यह स्थिति बनी हुई है। अगर इस बार कलेक्टर स्तर से जांच गंभीरता से हुई, तो कई “सुरक्षित” अफसरों की कुर्सी भी डगमगा सकती है।

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