Mohammed israil
Bilaspur। छत्तीसगढ़ कांग्रेस में गुटबाजी की आग अब धधककर बाहर आ गई है। वोट चोरी के खिलाफ आंदोलन की रणनीति तय करने बुली बैठक जिलाध्यक्षों की आपसी भिड़ंत का अखाड़ा बन गई। पूर्व मंत्री रविंद्र चौबे के बयान ने पार्टी के भीतर के मतभेद को और गहरा कर दिया। नेता आपस में भिड़ रहे हैं, चमचों की फौज नेताओं को घेरे हुए है और हाईकमान की चुप्पी ने कार्यकर्ताओं तक में असमंजस फैला दिया है। यही वजह है कि कांग्रेस संगठनात्मक मजबूती की बजाय विवादों और बयानबाजी में उलझी दिख रही है।

गुटबाजी का खुला खेल
- जगदलपुर जिलाध्यक्ष सुशील मौर्य और दुर्ग जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर आपस में भिड़ गए।
- मौर्य ने चौबे के बयान को अनुशासनहीनता कहा तो ठाकुर ने पलटवार किया कि भूपेश बघेल की तारीफ में गलत क्या है।
- विवाद इतना बढ़ा कि नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत को कहना पड़ा—“अपने-अपने चमचों को संभालकर रखें।”
- अंबिकापुर जिलाध्यक्ष बालकृष्ण पाठक के बोलने पर भी ठाकुर भड़क गए और धमकी दी कि कई राज उजागर हो जाएंगे।
चौबे के बयान से बढ़ा विवाद

भूपेश बघेल के जन्मदिन पर चौबे ने कहा था कि अब कांग्रेस का नेतृत्व भूपेश को करना चाहिए।
- इस बयान को लेकर पहले ही पीसीसी चीफ दीपक बैज और चौबे के बीच तल्खी दिख चुकी है।
- बैज ने सीधे-सीधे चेतावनी दी—“मुझे कोई कमजोर न समझे, मैं हर किसी का जवाब देने में सक्षम हूं।”
- बैठक में जिलाध्यक्षों और महामंत्रियों ने चौबे के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा पारित कर दी।
हाईकमान की चुप्पी

कांग्रेस की गुटबाजी कोई नई नहीं है। लेकिन इस बार स्थिति और गंभीर है क्योंकि—
- विधानसभा चुनाव की राह में संगठन लगातार कमजोर हो रहा है।
- बड़े नेता बयानबाजी में व्यस्त हैं और कार्यकर्ता असमंजस में हैं।
- हाईकमान अब तक खामोश है। न तो किसी को फटकार मिली, न ही सख्त संदेश।
- यही उदासीनता गुटबाजी को और हवा दे रही है।
भाजपा का तंज
भाजपा प्रवक्ता संतोष पांडेय ने कहा—
“छत्तीसगढ़ कांग्रेस में अब पीसीसी नहीं, बल्कि बीसीसी (भूपेश कांग्रेस कमेटी) चल रही है। गुटबाजी चरम पर है और यही वजह है कि महात्मा गांधी ने कहा था कांग्रेस को विसर्जित कर देना चाहिए।”
विवादों का सिलसिला
कांग्रेस में यह पहली बार नहीं है।
- 2003 से 2018 तक विपक्ष में रहते हुए भी पार्टी खेमेबाजी से उबर नहीं सकी।
- 2018 में सत्ता मिलने के बाद 5 साल का कार्यकाल भी आंतरिक संघर्ष में खप गया।
- अब विपक्ष में रहते हुए भ्रष्टाचार के आरोप और आपसी मतभेद ने कांग्रेस को कमजोर विपक्ष बना दिया है।
बैठक में भिड़ंत
- सुशील मौर्य: “चौबे का बयान अनुशासनहीनता”
- राकेश ठाकुर: “सिर्फ तारीफ की, इसमें गलत क्या?”
- चरणदास महंत: “अपने-अपने चमचों को संभालो”
चौबे बनाम बैज
- चौबे: “कांग्रेस का नेतृत्व भूपेश को करना चाहिए”
- बैज: “मुझे कमजोर न समझें, हर किसी का जवाब दूंगा”
- कार्रवाई की अनुशंसा: जिलाध्यक्षों और महामंत्रियों ने सर्वसम्मति से पास की
कांग्रेस की पुरानी बीमारी
- गुटबाजी से 15 साल विपक्ष में
- सत्ता में आने पर भी मतभेद जारी
- भ्रष्टाचार और कलह से कमजोर विपक्ष
- हाईकमान की चुप्पी से बढ़ा संकट
गुटबाजी में उलझी कांग्रेस, हाईकमान की चुप्पी ने बढ़ाई मुश्किलें

मोहम्मद इसराइल
छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस की हालत आज किसी खुले मैदान में खड़ी उस सेना जैसी है, जिसमें योद्धा तो बहुत हैं लेकिन हर कोई अपनी-अपनी दिशा में तलवार चला रहा है। पार्टी की जिला अध्यक्षों की बैठक में जिस तरह नेताओं के बीच आपसी भिड़ंत सामने आई, उसने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस का सबसे बड़ा दुश्मन आज भाजपा नहीं, बल्कि उसकी भीतरी गुटबाजी है।
✦ चौबे के बयान से राजनीतिक तूफान
पूर्व मंत्री रविंद्र चौबे के एक बयान ने पूरी कांग्रेस को आईना दिखा दिया। भूपेश बघेल के नेतृत्व को लेकर उनकी टिप्पणी ने ऐसा तूफान खड़ा किया कि जिलाध्यक्ष आपस में भिड़ गए। दरअसल यह विवाद केवल बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर चल रही खेमेबाज़ी और वर्चस्व की लड़ाई का ताजा उदाहरण है।
✦ महंत की तल्खी और ‘चमचों’ की राजनीति
नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत का यह कहना कि “अपने-अपने चमचों को संभालकर रखें”—खुद इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस के भीतर फैसले नेताओं से ज्यादा उनके समर्थक गुट और चमचे कर रहे हैं। यह स्थिति पार्टी की न केवल अनुशासनहीनता दिखाती है, बल्कि बताती है कि कांग्रेस का नेतृत्व फिलहाल नियंत्रण खो चुका है।
✦ हाईकमान की चुप्पी, गंभीर सवाल
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि लगातार गहराते विवादों पर कांग्रेस हाईकमान चुप है। न कोई सख्त संदेश, न कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई। नतीजा यह कि गुटबाजी को बढ़ावा मिल रहा है और कार्यकर्ता हताश हो रहे हैं। यही ढिलाई पहले भी कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर चुकी है।
✦ भाजपा के लिए राजनीतिक संजीवनी
कांग्रेस की अंदरूनी कलह से भाजपा को बैठे-बिठाए राजनीतिक संजीवनी मिल रही है। सरकार विरोधी लहर बनाने की बजाय कांग्रेस खुद के खिलाफ लहर खड़ी कर रही है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस विपक्ष की भूमिका निभाने लायक भी बची है?
🔎 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि उसका अपना बिखराव और गुटबाजी है। हाईकमान यदि अब भी आंखें मूंदे रहा, तो आने वाले चुनाव में कांग्रेस के लिए विपक्ष का दर्जा बचाए रखना भी मुश्किल हो जाएगा।



