Mohammed israil

स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल।
25 साल बाद भी सड़क पर मरीज, गार्ड से इंजेक्शन और टॉर्च में डिलीवरी, इलाज भगवान भरोसे और दवा भी बेअसर
बिलासपुर/अंबिकापुर/रायपुर।
Chhattisgarh राज्य गठन को 25 साल पूरे होने जा रहे हैं। करोड़ों का बजट, नई इमारतें, आधुनिक उपकरण और योजनाएँ… इसके बावजूद छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य विभाग बार-बार शर्मसार कर रहा है। हाल ही में अंबिकापुर, गरियाबंद, सरगुजा और तखतपुर से आई घटनाओं ने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
केस हिस्ट्री : घटनाएँ जो उठाती हैं सवाल
केस-1 : अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल


गुरुवार को यहाँ ऑक्सीजन लगे मरीज को परिजन स्ट्रेचर पर डालकर सड़क पार कर महिला वार्ड तक ले गए। अस्पताल परिसर के बीच से गुजरते एनएच के कारण प्रबंधन ने एंबुलेंस की सुविधा दी है, लेकिन ड्यूटी पर मौजूद नर्सिंग स्टाफ ने वाहन उपलब्ध नहीं कराया। अधीक्षक ने नर्सिंग सिस्टर को कारण बताओ नोटिस थमाया।
केस-2 : घटिया दवाओं की सप्लाई

CGMSCL ने महासमुंद की एक कंपनी द्वारा सप्लाई की गई पैरासिटामोल टैबलेट (500 और 650 एमजी) की खेप में दोष पाया। 2024 में निर्मित बैचों में काले धब्बे थे, जिन्हें मरीजों के उपयोग के लिए अनुपयुक्त माना गया। निगम ने कंपनी को सभी संदिग्ध बैच तत्काल वापस लेने और नई खेप उपलब्ध कराने का आदेश दिया।
केस-3 : गरियाबंद जिला अस्पताल

यहाँ नर्स की जगह महिला सुरक्षा गार्ड ने मरीज को इंजेक्शन लगाया। घटना के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका दर्ज कर सुनवाई शुरू की। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की बेंच ने सरकार को नोटिस जारी कर कहा—“यह चिकित्सा नैतिकता का उल्लंघन और प्रणालीगत विफलता का गंभीर उदाहरण है।”
केस-4 : सरगुजा और तखतपुर


- सरगुजा में सड़क न होने पर गर्भवती महिला को परिजनों ने कांवड़ में बिठाकर 2 किलोमीटर पैदल अस्पताल तक पहुँचाया। रास्ते में ही प्रसव हो गया।
- तखतपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में बिजली गुल होने पर डॉक्टरों ने टॉर्च की रोशनी में महिला की डिलीवरी कराई।

1 : हाईकोर्ट की टिप्पणी
- गरियाबंद अस्पताल की घटना पर हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
- “नैतिकता का उल्लंघन और प्रणालीगत विफलता” करार
- शासन से मांगी गई विस्तृत रिपोर्ट
2 : घटिया दवा पर कार्रवाई
- CGMSCL ने दोषपूर्ण पैरासिटामोल सप्लाई पर कंपनी को नोटिस दिया
- संदिग्ध बैच तत्काल वापस लेने का आदेश
- निविदा शर्तों के उल्लंघन पर कठोर कार्रवाई की चेतावनी
3 : मरीजों की मजबूरी
- स्ट्रेचर से सड़क पार कराना पड़ा
- गर्भवती को कांवड़ पर पैदल ले जाना पड़ा
- बिजली न होने पर टॉर्च में डिलीवरी कराना पड़ा
हेल्थ सिस्टम क्यों फेल हो रहा है?
1️⃣ ढांचा तो बना, संचालन नहीं
- अस्पताल भवन और उपकरणों पर करोड़ों खर्च हुए
- लेकिन पर्याप्त डॉक्टर, नर्स और टेक्निकल स्टाफ की भारी कमी
2️⃣ दवा और उपकरण में गड़बड़ी
- बार-बार घटिया दवाओं की सप्लाई सामने आ रही है
- खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल
3️⃣ ग्रामीण अंचलों में बदहाली
- सड़कों और परिवहन साधनों की कमी
- समय पर एंबुलेंस और रिफरल सेवाएँ उपलब्ध नहीं
4️⃣ आपात प्रबंधन की कमी
- बिजली गुल होने पर कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं
- ऑक्सीजन, जनरेटर और बेसिक सेवाओं का संकट
5️⃣ जवाबदेही शून्य
- लापरवाही के बाद केवल नोटिस तक सीमित कार्रवाई
- दोषियों पर कड़ी कार्यवाही का अभाव
❓ अब बड़ा सवाल
25 साल बाद भी जब राज्य के मरीज स्ट्रेचर पर सड़क पार कर रहे हैं, कांवड़ में अस्पताल पहुँच रहे हैं और टॉर्च की रोशनी में प्रसव हो रहा है—तो क्या करोड़ों का बजट सिर्फ़ भवन और कागजी योजनाओं में ही खप गया?



