Mohammed israil
रायपुर, बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) बेनूर में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के औचक निरीक्षण ने स्वास्थ्य विभाग की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया। निरीक्षण के दौरान फार्मेसी स्टोर से भारी लापरवाही और अनियमितता सामने आई, जिसके चलते फार्मासिस्ट अरसद रिज़वी को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। लेकिन इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार बीएमओ और सीएमएचओ पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

मंत्री के आदेश के मुताबिक़, फार्मेसी स्टोर में एक्सपायरी और वैध दवाइयों को एक साथ रखने, स्टॉक रजिस्टर के संधारण में लापरवाही और धूल से सनी दवाओं की हालत बेहद गंभीर पाई गई। यह स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य सुरक्षा के मानकों के साथ-साथ सिविल सेवा आचरण अधिनियम 1965 का उल्लंघन है। यही नहीं, फार्मासिस्ट द्वारा नियुक्ति पत्र की शर्तों का भी उल्लंघन पाया गया, जिसके चलते उसे बर्खास्त कर दिया गया।
लेकिन अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक फार्मासिस्ट की बर्खास्तगी से पूरी लचर स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार आ जाएगा? क्या जिला स्तर पर बैठने वाले जिम्मेदार सीएमओ (मुख्य चिकित्सा अधिकारी) और सिविल सर्जन को पूरी तरह क्लीन चिट मिलनी चाहिए?
सिर्फ ‘निचले स्तर’ पर कार्रवाई क्यों?
बेहद स्पष्ट है कि एक्सपायरी दवाओं का वर्षों से संग्रहण, स्टॉक रजिस्टर में भारी गड़बड़ी और निरीक्षण तक किसी भी वरिष्ठ अधिकारी द्वारा संज्ञान न लिया जाना – इन सबका जिम्मेदार सिर्फ एक फार्मासिस्ट नहीं हो सकता।
क्या सीएमओ और सिविल सर्जन की भूमिका सिर्फ बैठकों में रिपोर्ट सुनने तक सीमित है? या फिर वे भी इस लापरवाही के साझेदार हैं?
यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि यह कार्रवाई “मछली की आंख फोड़ कर तालाब साफ़ करने” जैसा प्रयास है।
स्वास्थ्य मंत्री का सख्त संदेश, पर अधूरी कार्रवाई
मंत्री जायसवाल ने निरीक्षण के दौरान स्पष्ट कहा कि “स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी”, और सभी संस्थानों में नियमित निरीक्षण के निर्देश भी दिए। लेकिन जब तक जिम्मेदारी की पूरी चेन — सीएमओ से लेकर जिला स्तरीय मॉनिटरिंग अधिकारियों तक — पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह सख्ती सिर्फ ‘दिखावटी सुधार’ बनकर रह जाएगी।
तीन बड़े सवाल – जवाब कौन देगा?
- क्या केवल फार्मासिस्ट ही इस गड़बड़ी का जिम्मेदार है?
- सीएमओ और सिविल सर्जन की जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई?
- क्या बाकी PHC और CHC की भी होगी गंभीर जांच?
कहीं बलि का बकरा तो नहीं बना…
एक फार्मासिस्ट की बर्खास्तगी भले ही शासन की तत्परता का प्रतीक मानी जाए, लेकिन यह पूरी स्वास्थ्य प्रणाली की सड़ांध को छिपाने के लिए किया गया “बलि का बकरा” बनाने जैसा है। अगर वाकई सुधार चाहिए, तो पूरे तंत्र को जवाबदेह बनाना होगा – वरना आज बेनूर, कल कोई और PHC… और इलाज के इंतज़ार में दम तोड़ती व्यवस्थाएं।



