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बाघिन और 3 शावकों पर बरसते रहे पत्थर, मौके से वन विभाग गायब!

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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फाइल फोटो

युवक की मौत के बाद भी नहीं जागा अमला? अचानकमार के जंगल में खुलेआम बांस कटाई के आरोप, गुफानुमा ठिकाने के आसपास एक माह से मंडरा रही थी बाघिन
EXCLUSIVE | तखतपुर के बांधा में युवक की मौत के बाद जंगल की सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल—ग्रामीणों ने खुद भेजा वीडियो, पथराव के बीच बाघिन अपने तीन शावकों के साथ पहाड़ी पर दिखाई दी
बिलासपुर/तखतपुर। तखतपुर क्षेत्र के ग्राम बांधा के जोगीपुर जंगल में 25 वर्षीय धरम दास घृतलहरे की बाघिन के हमले में मौत ने इलाके को दहला दिया है, लेकिन इस दर्दनाक घटना के बाद जंगल से सामने आई तस्वीरें इससे भी ज्यादा गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। जिस बाघिन को अपने तीन शावकों के साथ पहाड़ी पर मौजूद बताया जा रहा है, उसी पर ग्रामीणों द्वारा पथराव किए जाने की बात सामने आई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस वक्त बाघिन और उसके शावकों पर पत्थर बरस रहे थे, उस वक्त वन विभाग की टीम मौके पर कहां थी?


ग्रामीणों द्वारा भेजे गए वीडियो में बाघिन और उसके शावकों की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक बाघिन पिछले करीब एक महीने से पहाड़ी पर मौजूद गुफानुमा क्षेत्र के आसपास घूम रही थी। इसके बावजूद इस संवेदनशील इलाके में लोगों की आवाजाही और जंगल से बांस समेत अन्य वन उपज काटने की गतिविधियों पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लगाई गई, यह सवाल अब वन विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर खड़ा हो गया है।
युवक की मौत के बाद खुली जंगल की ‘खौफनाक’ तस्वीर
जोगीपुर जंगल के फॉरेस्ट बीट आरए-98 क्षेत्र में धरम दास घृतलहरे बांस से निकलने वाला करिल काटने और पीहरी लेने गया था। इसी दौरान बाघिन ने उस पर हमला कर दिया। हमले में उसकी गर्दन पर गंभीर चोट आई और उसकी मौके पर ही मौत हो गई। हमले के बाद वन्यजीव द्वारा शव को भी नुकसान पहुंचाए जाने की जानकारी सामने आई है।
एक युवक की जान चली गई। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गांव में दहशत फैल गई। लेकिन इसी घटना ने जंगल के भीतर चल रही गतिविधियों और वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
आखिर बाघिन की मौजूदगी की जानकारी होने के बावजूद ग्रामीण जंगल तक कैसे पहुंच रहे थे?
बाघिन के शावकों की मौजूदगी वाले इलाके में सुरक्षा घेरा क्यों नहीं बनाया गया?
और घटना के दौरान वन विभाग की टीम मौके पर मौजूद क्यों नहीं थी?
बाघिन पर पथराव… शावकों की जान भी खतरे में!
घटना के बाद सामने आए वीडियो और स्थानीय ग्रामीणों के दावों ने मामले को और गंभीर बना दिया है। ग्रामीणों के अनुसार बाघिन अपने तीन शावकों के साथ पहाड़ी क्षेत्र में मौजूद थी और इसी दौरान कुछ लोगों ने उसे और शावकों को पत्थर मारना शुरू कर दिया।
यह स्थिति न केवल ग्रामीणों के लिए बल्कि वन्यजीवों के लिए भी बेहद खतरनाक है। विशेषज्ञों के अनुसार शावकों के साथ मौजूद बाघिन किसी भी खतरे को अपने बच्चों पर हमला मान सकती है और ऐसी स्थिति में उसका व्यवहार बेहद आक्रामक हो सकता है।
यानी एक तरफ ग्रामीणों की जान खतरे में है और दूसरी तरफ बाघिन तथा उसके शावक भी लगातार मानवीय हस्तक्षेप के बीच फंसे हुए हैं।
लेकिन सवाल फिर वही—वन विभाग की निगरानी कहां है?
एक महीने से गुफानुमा ठिकाने के आसपास बाघिन, फिर भी जंगल में आवाजाही!
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बाघिन पिछले करीब एक महीने से पहाड़ पर मौजूद एक गुफानुमा क्षेत्र के आसपास दिखाई दे रही थी। ग्रामीणों ने इसी से संबंधित वीडियो भी भेजे हैं।
यदि ग्रामीणों के दावे सही हैं और बाघिन लंबे समय से इस क्षेत्र में सक्रिय थी, तो यह वन विभाग के लिए बेहद महत्वपूर्ण इनपुट होना चाहिए था। ऐसे इलाके को संवेदनशील घोषित कर वहां लोगों की आवाजाही रोकने, गश्त बढ़ाने और वन्यजीव की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखने की जरूरत थी।
इसके उलट ग्रामीणों के मुताबिक बड़ी संख्या में लोग रोजाना जंगल में बांस काटने जा रहे हैं।
एक तरफ बाघिन और उसके शावक, दूसरी तरफ जंगल में लगातार इंसानी आवाजाही—यह टकराव किसी भी वक्त फिर जानलेवा हो सकता है।
बांस की कटाई पर भी उठे सवाल—क्या जंगल में चल रही है खुली मनमानी?
ग्रामीणों के मुताबिक जंगल में बड़ी संख्या में लोग बांस काटने पहुंच रहे हैं। स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों ने लकड़ी की कटाई होने का भी दावा किया है।
हालांकि लकड़ी कटाई के इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन अगर संवेदनशील वन क्षेत्र में नियमित रूप से बांस और लकड़ी की कटाई हो रही है तो यह वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जिस जंगल में बाघिन अपने तीन शावकों के साथ मौजूद हो, वहां रोजाना लोगों का पहुंचना आखिर किसकी अनुमति से हो रहा है?
क्या वन विभाग को इसकी जानकारी नहीं थी?
अगर जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
और अगर जानकारी नहीं थी तो जंगल की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
अचानकमार के जंगल में सुरक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल
अचानकमार क्षेत्र के जंगलों को वन्यजीवों के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे क्षेत्र में वन्यजीव और इंसान का आमना-सामना रोकना वन विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल है।
लेकिन बांधा-जोगीपुर की घटना के बाद सामने आ रही परिस्थितियां बताती हैं कि जंगल की सीमा, वन्यजीवों के मूवमेंट और ग्रामीणों की आवाजाही के बीच समन्वय की भारी कमी हो सकती है।
एक ओर बाघिन की मौजूदगी की स्थानीय स्तर पर चर्चा थी। दूसरी ओर ग्रामीण जंगल में पहुंच रहे थे। अब एक युवक की जान चली गई और घटना के बाद बाघिन तथा उसके तीन शावकों पर पथराव की तस्वीरें सामने आ रही हैं।
यह केवल एक वन्यजीव हमले की कहानी नहीं है। यह जंगल की निगरानी, मानव-वन्यजीव संघर्ष और वन विभाग की जमीनी व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
अफसरों से सीधे सवाल: घटना से पहले क्यों नहीं रोकी गई जंगल में आवाजाही?
वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को अब इन सवालों का जवाब देना होगा—
▶ क्या विभाग को बाघिन की एक महीने से मौजूदगी की जानकारी थी?
▶ क्या बाघिन और उसके तीन शावकों के संभावित ठिकाने की पहचान की गई थी?
▶ क्या उस क्षेत्र में ग्रामीणों की आवाजाही पर रोक लगाई गई थी?
▶ अगर रोक थी तो रोजाना बांस काटने के लिए लोग जंगल तक कैसे पहुंच रहे थे?
▶ घटना के वक्त मौके पर वन विभाग की टीम मौजूद थी या नहीं?
▶ यदि टीम मौजूद नहीं थी तो बाघिन और शावकों पर पथराव जैसी स्थिति को रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी?
▶ जंगल में बांस और लकड़ी कटाई के आरोपों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?
▶ क्या घटना से पहले बाघिन की निगरानी, कैमरा ट्रैप, गश्त या सुरक्षा घेरा लगाया गया था?
इन सवालों के जवाब अब इसलिए जरूरी हैं क्योंकि एक युवक की जान जा चुकी है और खतरा अभी टला नहीं है।
खतरा अभी खत्म नहीं—बाघिन शावकों के साथ जंगल में
सबसे बड़ी चिंता यह है कि बाघिन अपने तीन शावकों के साथ अभी भी क्षेत्र में मौजूद हो सकती है। ऐसे में ग्रामीणों का जंगल में जाना, बाघिन को घेरना या उस पर पथराव करना किसी दूसरी बड़ी दुर्घटना को न्योता दे सकता है।
पुलिस और वन विभाग को तत्काल संयुक्त रूप से संवेदनशील क्षेत्र को चिन्हित कर वहां लोगों की आवाजाही रोकने, लगातार गश्त बढ़ाने और बाघिन तथा शावकों की सुरक्षित निगरानी करनी होगी।
जुनापारा पुलिस की टीम घटना के बाद मौके के लिए रवाना हुई थी। वन विभाग की टीम द्वारा भी क्षेत्र का जायजा लेने की बात सामने आई है। लेकिन अब कार्रवाई केवल घटना के बाद मौके का निरीक्षण करने तक सीमित नहीं रह सकती।
जरूरत है जंगल के भीतर उतरकर यह पता लगाने की कि बाघिन यहां क्यों रुकी हुई है, ग्रामीण लगातार अंदर क्यों जा रहे हैं और वन विभाग की निगरानी व्यवस्था जमीन पर कितनी सक्रिय है।
एक मौत ने खोल दिए कई सवाल
धरम दास की मौत को महज वन्यजीव हमले की घटना मानकर मामला खत्म कर देना आसान होगा। लेकिन घटनास्थल से सामने आ रही तस्वीरें एक बड़े सवाल की ओर इशारा कर रही हैं—क्या जंगल में इंसान और वन्यजीव के बीच बढ़ता टकराव दरअसल निगरानी और प्रबंधन की कमजोरी का नतीजा है?
बाघिन ने हमला किया और एक युवक की जान चली गई। लेकिन अब बाघिन और उसके तीन शावकों पर पथराव, जंगल में लगातार ग्रामीणों की आवाजाही और बांस-लकड़ी कटाई के आरोपों ने पूरे मामले को नए सवालों के घेरे में ला दिया है।
अब देखना यह है कि वन विभाग इन सवालों का जवाब सिर्फ कागजों में देता है या जंगल के भीतर उतरकर कार्रवाई भी करता है।
क्योंकि खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है—बाघिन और उसके तीन शावक अभी भी जंगल में हैं।

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