बिलासपुर।छत्तीसगढ़ के अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय बिलासपुर द्वारा जारी परीक्षा समय-सारणी को लेकर छात्रों में असंतोष बढ़ रहा है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत आयोजित होने वाली इन परीक्षाओं की तिथियां कई प्रमुख राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और परीक्षाओं से टकरा रही हैं। इसके कारण बड़ी संख्या में छात्रों को असुविधा हो रही है। छात्रों के हित में, विभिन्न छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से समय-सारणी में बदलाव की मांग की है।


आशीर्वाद पैनल की सक्रियता
आशीर्वाद पैनल के छात्र नेताओं ने 4 जनवरी को विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक को ज्ञापन सौंपा। पैनल के नेतृत्वकर्ता और विश्वविद्यालय छात्रसंघ सचिव मनीष मिश्रा ने बताया कि 8 जनवरी 2025 से 6 फरवरी 2025 तक आयोजित होने वाली परीक्षाओं की तिथियां उन छात्रों के लिए परेशानी का सबब बन रही हैं, जो 9 जनवरी से 19 जनवरी तक होने वाली राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में भाग लेने जा रहे हैं। इसके साथ ही, 6 से 10 जनवरी तक चलने वाली यूजीसी नेट परीक्षा भी छात्रों की समस्या को और जटिल बना रही है।
ज्ञापन में तर्क दिया गया कि इन तिथियों के कारण न केवल खिलाड़ी छात्र-छात्राएं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने वाले अन्य छात्र भी प्रभावित होंगे। आशीर्वाद पैनल ने मांग की कि विश्वविद्यालय प्रशासन परीक्षा तिथियों को 20 जनवरी 2025 के बाद पुनर्निर्धारित करे।
परीक्षा नियंत्रक ने छात्रों की मांग को गंभीरता से लेते हुए इस पर शीघ्र बैठक बुलाने और तिथियों में संभावित बदलाव पर विचार करने का आश्वासन दिया। ज्ञापन सौंपने वालों में मनीष मिश्रा, बृजमोहन सिंह, सचिन सूर्या, समर्थ मिरानी, मीनाक्षी, अदिति, नैना सहित बड़ी संख्या में छात्र शामिल थे।
एनएसयूआई की मांग
छात्रों की समस्याओं को लेकर राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) भी सक्रिय रहा। एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष रंजीत सिंह के निर्देशन और प्रदेश सचिव लोकेश नायक के नेतृत्व में छात्र प्रतिनिधियों ने परीक्षा नियंत्रक तरुण धर दीवान को ज्ञापन सौंपा।
लोकेश नायक ने बताया कि 8 जनवरी 2025 से प्रारंभ होने वाली स्नातक और स्नातकोत्तर परीक्षाओं की समय-सारणी छात्रों के हितों को नजरअंदाज करती है। उन्होंने बताया कि कई छात्र 3 जनवरी से 16 जनवरी तक आयोजित सीएसआईआर यूजीसी नेट परीक्षा में भाग लेंगे। इसके अलावा, अधिकांश महाविद्यालयों में पाठ्यक्रम अभी तक पूर्ण नहीं हुआ है, और प्रायोगिक परीक्षाएं भी शेष हैं।
एनएसयूआई ने चार प्रमुख मांगें रखीं:
1. विश्वविद्यालय के सभी स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं की तिथियों में वृद्धि।
2. पाठ्यक्रम पूर्ण न होने और प्रायोगिक परीक्षाएं आयोजित न होने के कारण छात्रों को अधिक समय दिया जाए।
3. एमसीए पाठ्यक्रम की परीक्षाओं के मध्य तिथियों में अंतराल बढ़ाया जाए।
4. छात्रों के रोल नंबर सूची और अन्य तकनीकी प्रक्रियाएं समय पर पूरी की जाएं ताकि परीक्षाओं के दौरान किसी प्रकार की परेशानी न हो।
परीक्षा नियंत्रक का आश्वासन
एनएसयूआई की मांगों पर प्रतिक्रिया देते हुए परीक्षा नियंत्रक तरुण धर दीवान ने लॉ और शिक्षण विभाग को छोड़कर अन्य परीक्षाओं की तिथियों में 7 से 10 दिन की वृद्धि का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है और उनकी मांगों पर उचित निर्णय लिया जाएगा।
छात्र संगठनों का संयुक्त उद्देश्य
आशीर्वाद पैनल और एनएसयूआई के प्रयास छात्रों की समस्याओं को उजागर करने और समाधान खोजने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। दोनों संगठनों ने छात्रों के हितों को प्राथमिकता देते हुए मांग की है कि परीक्षा समय-सारणी छात्रों की शैक्षणिक और प्रतिस्पर्धात्मक जरूरतों के अनुसार बनाई जाए।
ज्ञापन सौंपने वालों में लोकेश नायक, सुमित शुक्ला, प्रवीण साहू, मीनाक्षी, शिल्पी, अवंती, अदिति, तरुण, सोनू सारथी, और भरत साहू सहित बड़ी संख्या में छात्र और एनएसयूआई कार्यकर्ता शामिल थे।
छात्रों की समस्याएं और अपेक्षाएं
छात्र संगठनों का कहना है कि समय-सारणी में बदलाव से छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं और अन्य परीक्षाओं में भाग लेने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही, उन्हें पर्याप्त समय मिलने से परीक्षा की तैयारी बेहतर हो सकेगी।
छात्र संगठनों की मांगों के मुख्य बिंदु:
राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता और यूजीसी नेट परीक्षा से परीक्षा तिथियां न टकराएं।
प्रायोगिक परीक्षाओं को समय पर आयोजित किया जाए।
पाठ्यक्रम की पूर्णता सुनिश्चित की जाए।
समय-सारणी में पर्याप्त अंतराल रखा जाए।
जज मांगों को पूरा करने का दबाव
छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए समय-सारणी में आवश्यक बदलाव करना विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। छात्र संगठनों की यह पहल न केवल उनकी समस्याओं को सुलझाने में मदद करेगी, बल्कि प्रशासन और छात्रों के बीच विश्वास को भी मजबूत करेगी। अब सभी की निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन पर हैं कि वह छात्रों की इन जायज मांगों को कैसे पूरा करता है।



