Latest news

सुशासन का दावा… जनदर्शन की हकीकत… बिलासपुर में पंचायत से कलेक्टर दफ्तर तक भटक रही जनता, क्या 4 एसडीएम सिस्टम पर पड़ रहे भारी?”

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
8 Min Read

मोहम्मद इसराइल

एक तरफ सरकार “सुशासन तिहार” का ढोल पीट रही है, दूसरी तरफ बिलासपुर कलेक्टोरेट हर मंगलवार जनता की बेबसी का सबसे बड़ा मंच बनता जा रहा है। राशन, पेंशन, बिजली, अवैध कब्जा, जन्म प्रमाण पत्र और जमीन विवाद जैसी पंचायत और तहसील स्तर पर हल होने वाली समस्याएं अब सीधे कलेक्टर दरबार पहुंच रही हैं। सवाल सिर्फ भीड़ का नहीं है, सवाल उस सिस्टम का है जहां गांव का सचिव, तहसील का बाबू, जोन का अफसर और एसडीएम कार्यालय तक शिकायतें दबाकर बैठ जाते हैं और आखिरकार जनता को 40 डिग्री की तपती गर्मी में मीलों सफर कर कलेक्टर कार्यालय की चौखट पकड़नी पड़ती है।
बिलासपुर का जनदर्शन अब शिकायत निवारण मंच कम और निचले प्रशासन की विफलता का सार्वजनिक चार्जशीट ज्यादा नजर आने लगा है।

जनदर्शन में उमड़ रही भीड़ ने खोली जमीनी प्रशासन की पोल
कलेक्टर द्वारा सभी अनुविभागीय अधिकारियों को ब्लॉक स्तर पर जनदर्शन आयोजित कर समस्याओं के निराकरण के निर्देश दिए गए थे। शासन ने भी जोन, जनपद और थाना स्तर तक शिकायत निवारण व्यवस्था मजबूत करने का दावा किया था। लेकिन हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं।
हर मंगलवार को कलेक्टोरेट में उमड़ रही भीड़ बता रही है कि पंचायत, तहसील, निगम और विभागीय कार्यालयों में लोगों की सुनवाई नहीं हो रही।
मंगलवार को आयोजित जनदर्शन में कुल 107 आवेदन पहुंचे। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र पर बड़ा सवाल है। इनमें अधिकांश शिकायतें ऐसी थीं जिनका निराकरण पंचायत सचिव, पटवारी, बिजली विभाग या जोन कार्यालय स्तर पर हो सकता था।
8 महीने से राशन-पेंशन के लिए भटकती रही दिव्यांग चैती बाई
बिल्हा के भटगांव निवासी दिव्यांग चैती बाई की कहानी पूरे सिस्टम की नाकामी की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आई।
चैती बाई पिछले आठ महीने से राशन, पेंशन और महतारी योजना के लाभ के लिए पंचायत, खाद्य विभाग और स्थानीय कार्यालयों के चक्कर काट रही थीं। तीन-तीन बार आवेदन देने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हुई।
आर्थिक तंगी, शारीरिक तकलीफ और प्रशासनिक उपेक्षा से टूट चुकी चैती बाई आखिरकार कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस महिला की समस्या पंचायत स्तर पर हल हो सकती थी, उसे आखिर कलेक्टर कार्यालय तक क्यों आना पड़ा?
सुशासन तिहार में मिले 9500 आवेदन अब तक लंबित
सरकार सुशासन तिहार मना रही है, लेकिन उसी अभियान में मिले करीब 9500 आवेदन अब तक लंबित बताए जा रहे हैं।
यानी जनता से आवेदन तो ले लिए गए, लेकिन समाधान फाइलों में अटका पड़ा है। यही वजह है कि लोगों का भरोसा विभागों से उठता जा रहा है और वे सीधे कलेक्टर जनदर्शन पहुंच रहे हैं।
लोगों का कहना है कि पंचायत, तहसील, बिजली विभाग और निगम कार्यालयों में आवेदन देने के बाद महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं होती। विडंबना यह है कि जनदर्शन में दिए गए आवेदन भी आखिरकार उन्हीं विभागों को भेज दिए जाते हैं, जहां पहले से फाइलें धूल खा रही होती हैं।
दो साल से एसडीएम कोर्ट में भटक रहा किसान
बेलगहना निवासी शिवराज सिंह पिछले दो वर्षों से जमीन विवाद के मामले में कोटा एसडीएम कोर्ट में पेशी दे रहे हैं।
उनका आरोप है कि सुनवाई पूरी होने के बावजूद फैसला नहीं हुआ और मामला लटकाकर रखा गया। जनदर्शन में आवेदन देने के बाद भी उनकी शिकायत फिर उसी एसडीएम कार्यालय भेज दी गई जहां से वे पहले ही परेशान हो चुके हैं।
यह मामला राजस्व न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार और जिम्मेदार अधिकारियों की निष्क्रियता को उजागर करता है।
अवैध निर्माण पर कार्रवाई नहीं, रसूखदारों को संरक्षण का आरोप
मगरपारा निवासी मुन्नालाल सोनी ने घर के पास हो रहे अवैध निर्माण की शिकायत की।
उन्होंने आरोप लगाया कि बिना नक्शे के निर्माण कार्य जारी है और जोन कार्यालय में पांच बार शिकायत देने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।
मुन्नालाल ने साफ कहा कि रसूखदार लोगों को संरक्षण मिलने के कारण नियमों को खुलेआम कुचला जा रहा है।
10 दिन से अंधेरे में गांव, पानी के लिए भटक रहे लोग
ग्राम लोखंडी के अर्चना विहार में पिछले 10 दिनों से बिजली बंद है। बिजली नहीं होने से पानी का संकट भी गहरा गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे बिजली विभाग के कई चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
हालात इतने खराब हो गए कि लोग एक-एक बाल्टी पानी के लिए भटकने को मजबूर हैं। आखिरकार ग्रामीणों को जनदर्शन पहुंचना पड़ा।
जन्म प्रमाण पत्र से लेकर ट्रायसाइकिल तक के लिए कलेक्टर दरबार
जनदर्शन में आए मामलों ने यह भी दिखाया कि विभागीय सिस्टम किस तरह धराशायी हो चुका है।
चकरभाठा निवासी प्रभा मानिकपुरी अपने दिव्यांग पुत्र का जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भटक रही हैं।
कपसियाखुर्द की पूर्व सरपंच कमल बाई राजपूत निर्माण कार्यों के भुगतान के लिए आवेदन लेकर पहुंचीं।
विजयपुर निवासी बहोरिक पाल राजस्व रिकॉर्ड सुधार की मांग लेकर पहुंचे।
वृद्ध महिला ढयाना बाई चोरी के मामले में कार्रवाई नहीं होने से परेशान होकर जनदर्शन पहुंचीं।
दिव्यांग मुकेश सिंह ठाकुर ट्रायसाइकिल और स्वरोजगार सहायता की गुहार लेकर पहुंचे।
ग्राम ओखर की सरपंच ललीता यादव ने शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायत की।
इन मामलों ने साफ कर दिया कि जनता अब विभागीय कार्यालयों से ज्यादा भरोसा कलेक्टर जनदर्शन पर करने लगी है।
क्या कलेक्टर पर भारी पड़ रहे जिले के 4 एसडीएम?
सबसे बड़ा सवाल अब प्रशासनिक ढांचे पर खड़ा हो रहा है।
जब कलेक्टर खुद ब्लॉक स्तर पर जनदर्शन आयोजित करने के निर्देश दे चुके हैं, फिर भी जनता सीधे कलेक्टोरेट क्यों पहुंच रही है?
क्या एसडीएम स्तर पर शिकायतों का निराकरण नहीं हो रहा?
क्या विभागीय अफसर सिर्फ आवेदन आगे बढ़ाने तक सीमित हो गए हैं?
क्या पंचायत और तहसील स्तर की जवाबदेही खत्म हो चुकी है?
लगातार बढ़ती भीड़ यह संकेत दे रही है कि निचले स्तर का प्रशासन या तो निष्क्रिय है या फिर जनता का भरोसा खो चुका है।
कलेक्टर का दावा- शिकायतों का निराकरण हो रहा
कलेक्टर संजय अग्रवाल का कहना है कि जनदर्शन में लोगों की शिकायतों का निराकरण होता है, इसलिए लोग यहां आते हैं। उनके मुताबिक जिले की आबादी 21 लाख है, इसलिए हर जनदर्शन में भीड़ रहना स्वाभाविक है।
लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और कहानी कह रही है। अगर स्थानीय स्तर पर समय पर समाधान हो रहा होता तो राशन, पेंशन, बिजली और जन्म प्रमाण पत्र जैसी मूलभूत समस्याओं के लिए लोगों को कलेक्टोरेट की चौखट नहीं पकड़नी पड़ती।

खबर को शेयर करने के लिए क्लिक करे।।