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बिलासपुर कांग्रेस में अंदरूनी घमासान: शपथ के साथ ही विवादों में घिरे जिलाध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री, संगठनात्मक अनुशासन से लेकर शक्ति प्रदर्शन तक सवालों के घेरे में

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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नोटिस से गरमाई कांग्रेस की सियासत

कांग्रेस के बिलासपुर जिला संगठन में नेतृत्व परिवर्तन के साथ जिस सृजन और मजबूती की उम्मीद की जा रही थी, वही प्रक्रिया अब भीतरखाने के टकराव, गुटबाजी और अनुशासनहीनता के आरोपों में उलझती दिख रही है। हाल ही में नियुक्त जिलाध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री का कार्यकाल शुरू होने के साथ ही पार्टी के भीतर असंतोष, प्रतीकात्मक विरोध और संगठनात्मक सवाल एक के बाद एक सामने आ रहे हैं। शपथ ग्रहण समारोह से लेकर ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ तक, हर मंच पर उभरे संकेत कांग्रेस के जिला संगठन में गहरी खींचतान की ओर इशारा कर रहे हैं।

बिलासपुर। कांग्रेस के नव-नियुक्त बिलासपुर जिला अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री ने तिलक नगर स्थित इंदिरा कांग्रेस भवन में आयोजित समारोह में शपथ ली थी। इस अवसर पर मंच सजा, भवन का रंग-रोगन हुआ, लेकिन कार्यक्रम के दौरान पार्टी के कई दिग्गज नेताओं की गैरमौजूदगी ने सियासी संदेश दे दिया। संगठन के भीतर इसे “अच्छा बाजी” का परिणाम बताया गया, वहीं अंदरूनी नाराजगी की चर्चा भी खुलकर सामने आई।
कांग्रेस सृजन अभियान के तहत पार्टी नेतृत्व ने गंगोत्री को जिला संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी है, लेकिन संगठन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं दिख रहा। इंदिरा कांग्रेस भवन के सौंदर्यीकरण और रंग-रोगन को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के ही कुछ नेताओं द्वारा इस प्रक्रिया को लेकर जवाबदेही और खर्च पर उंगलियां उठाई जा रही हैं। भीतरखाने यह चर्चा तेज है कि जिन पर संगठन को सहेजने की जिम्मेदारी है, वही विवादों के केंद्र में आ गए हैं, जिससे आगामी चुनावों से पहले पार्टी को नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
इसी बीच ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के तहत आयोजित कार्यक्रम ने कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को और उजागर कर दिया। एक फरवरी को कोटा में आयोजित पदयात्रा और सभा में प्रदेश कांग्रेस के सह प्रभारी विजय जांगिड़ और मनरेगा बचाओ अभियान के प्रदेश समन्वयक एवं पूर्व मंत्री उमेश पटेल की मौजूदगी रही। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कांग्रेसी कार्यकर्ता शामिल हुए, लेकिन पदयात्रा के दौरान इस्तेमाल किए गए बैनरों ने संगठन को असहज कर दिया।
बैनरों में प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की तस्वीरें नहीं लगाई गई थीं। इस चूक को महज तकनीकी भूल मानने के बजाय संगठनात्मक अनुशासन से जोड़कर देखा गया। मामले की शिकायत संगठन स्तर पर की गई, जिसके बाद कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया। प्रभारी महामंत्री संगठन मलकीत सिंह गैदू की ओर से बिलासपुर ग्रामीण जिलाध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। नोटिस में तीन दिनों के भीतर जवाब मांगा गया है।
नोटिस की जानकारी सामने आते ही कांग्रेस संगठन में नई बहस छिड़ गई। दरअसल, जिलाध्यक्षों के शपथ ग्रहण के समय से ही गुटबाजी और असंतोष की शिकायतें उठती रही हैं। अब प्रदेश प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष की तस्वीरें बैनर से गायब रहने का मामला सामने आने के बाद यह टकराव और खुलकर उभर आया है।
इसी क्रम में गंगोत्री पर अनुशासनहीनता के आरोप भी चर्चा में हैं। संगठन के भीतर यह बात तेजी से फैल रही है कि नोटिस मिलने के बावजूद जिलाध्यक्ष द्वारा एक होटल में ब्लॉक अध्यक्षों और कुछ कार्यकर्ताओं के लिए भोज का आयोजन किया गया। इस आयोजन की आलोचना इसलिए भी हो रही है क्योंकि उसी दिन गुरुवार रात जिले में हुए एक सड़क हादसे में कांग्रेस के एक युवा नेता की मौत हो गई थी और एक ब्लॉक अध्यक्ष गंभीर रूप से घायल हुए थे। इसके बावजूद बैठक और भोज को स्थगित नहीं किए जाने को लेकर पार्टी के भीतर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा में किए गए बदलावों के विरोध में कांग्रेस जिले और ब्लॉक स्तर पर लगातार प्रदर्शन कर रही है। कोटा की पदयात्रा भी इसी कड़ी का हिस्सा थी। लेकिन विरोध के इस मंच पर सामने आए संगठनात्मक संकेतों ने कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी को राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय बना दिया है।
शपथ ग्रहण समारोह से लेकर आंदोलन के मंच तक, हर घटनाक्रम में उभरे संकेत यह दिखा रहे हैं कि कांग्रेस का बिलासपुर जिला संगठन नेतृत्व परिवर्तन के बाद भी आंतरिक खींचतान से जूझ रहा है। हाल ही में अध्यक्ष बनाए गए महेंद्र गंगोत्री लगातार विवादों के केंद्र में हैं और पार्टी के भीतर अनुशासन, प्रतीकात्मक राजनीति और शक्ति संतुलन को लेकर सवाल तेज होते जा रहे हैं।

मनरेगा नाम परिवर्तन पर आंदोलन की धार कुंद, बिलासपुर में कांग्रेस की रणनीति पर सवाल
मनरेगा के नाम में संभावित बदलाव के विरोध को लेकर कांग्रेस ने जिस आक्रामक जनांदोलन का दावा किया था, उसकी धार बिलासपुर जिले में कमजोर पड़ती नजर आ रही है। ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के बैनर तले शुरू हुआ आंदोलन न तो अपेक्षित जनभागीदारी जुटा पाया और न ही संगठनात्मक एकजुटता दिखा सका। जिला स्तर पर आंदोलन का स्वर बिखरा हुआ दिख रहा है, जहां मंच, बैनर और नेतृत्व के संदेशों में ही विरोधाभास सामने आ रहा है।
कोटा में आयोजित पदयात्रा और सभा को आंदोलन का बड़ा पड़ाव बताया गया था, लेकिन उसी कार्यक्रम में प्रदेश नेतृत्व की तस्वीरों का गायब होना कांग्रेस की तैयारियों और गंभीरता पर सवाल खड़े करता है। पार्टी के भीतर यह चर्चा तेज है कि मनरेगा जैसे संवेदनशील और जनहित से जुड़े मुद्दे पर भी संगठन एकजुट संदेश देने में असफल रहा। जिले में न तो व्यापक जनसंपर्क अभियान दिखा और न ही पंचायत व ग्रामीण स्तर पर ठोस लामबंदी।
आंदोलन के दौरान आंतरिक खींचतान, गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया, जिससे मुद्दा पीछे और संगठनात्मक विवाद आगे आ गया। नतीजतन, मनरेगा के नाम परिवर्तन के विरोध में उठाई गई आवाज जिले में प्रभावी दबाव बनाने में कमजोर साबित हो रही है। कांग्रेस के भीतर ही यह सवाल तैर रहा है कि क्या आंदोलन जनता के लिए है या संगठन के भीतर शक्ति संतुलन की लड़ाई का मंच बनकर रह गया है।

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