
छत्तीसगढ़ में शराब बिक्री का राजस्व लक्ष्य अचानक 12,500 करोड़ तक पहुंच जाना कोई संयोग नहीं, बल्कि उस अराजक सिस्टम की देन है जिसे सरकार और आबकारी विभाग आज तक काबू नहीं कर पाए। अवैध शराब ने गांवों से लेकर शहरों तक कब्जा जमा लिया है, बाहरी राज्यों की व्हिस्की–रम से बाजार पटा पड़ा है और सरकारी दुकानों में नियम तोड़कर बिक्री आम हो चुकी है। हालत यह है कि राजस्व बढ़ाने के लिए सरकार अब फिर से शराब बिक्री निजी हाथों में देने के विकल्प पर विचार कर रही है—हालांकि विभाग के बड़े अधिकारी खुलकर इसकी पुष्टि करने से बच रहे हैं।
यह पूरा मामला साफ दिखाता है कि सरकार शराब राजस्व बढ़ाना चाहती है, लेकिन सिस्टम को नियंत्रित करने में बिल्कुल विफल हो चुकी है।
रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार की आबकारी समीक्षा बैठक ने एक बार फिर राज्य के शराब तंत्र की परतें खोल दी हैं। सचिव सह आबकारी आयुक्त आर. शंगीता ने अधिकारियों को 12,500 करोड़ के भारी-भरकम राजस्व लक्ष्य की प्राप्ति का आदेश तो दे दिया, लेकिन असल सवाल यह है—जब राज्य अवैध शराब और बाहरी राज्यों की बोतलों से उफन रहा है, तब यह लक्ष्य हासिल कैसे होगा?
अवैध शराब का साम्राज्य—सरकार के नियंत्रण से बाहर
प्रदेश में अवैध शराब का कारोबार इतने बड़े स्तर पर फल-फूल रहा है कि यह सरकारी दुकानों की बिक्री को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।
कई जिलों में महुआ शराब की बिक्री सरकारी सिस्टम से दोगुनी
बार–ढाबों में अवैध शराब का खुलेआम संचालन
पड़ोसी राज्यों—ओडिशा, झारखंड, यूपी, एमपी—से दर्जनों रूट पर बेहद तेज तस्करी
सीमा चौकियों पर अभियान की बात हर साल होती है, लेकिन नतीजे वही—शून्य।
बाहरी राज्यों की शराब ने गड़बड़ा दिया पूरा बैलेंस
शराब दुकानों में अधिकारी जांच के नाम पर चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन बाजार में बाहरी राज्यों की एंट्री ने सरकार की कमर तोड़ दी है।
बिहार, ओडिशा, यूपी की बोतलें ग्रामीण इलाकों में खुलेआम
कीमत आधी, नशा दोगुना—यही कारण है सरकारी दुकानों की बिक्री टूट रही है
सरकारी रैक में प्रीमियम ब्रांड रखकर राजस्व बढ़ाने का सपना दिखाया गया, पर असल खरीदी बाहर से आने वाली सस्ती शराब मुनाफा खा गई।
अधिकारी नाराज, विभाग में तीखी खीझ—“टारगेट बढ़ाने से क्या होगा?”
आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी खुद मान रहे हैं कि सिस्टम बेपटरी है।
बैठक में कई जिलों को निर्देश दिया गया कि—
दुकानवार कमी का विश्लेषण करो
रैक अच्छे करो
मांग के अनुसार स्टॉक भरो
पर असल समस्या यह है कि सरकारी दर की शराब तब तक नहीं बिकेगी, जब तक साइड में सस्ते विकल्प मिल रहे हैं।
निजी हाथों में शराब बिक्री? हाँ, सुगबुगाहट बहुत तेज
ये खबर अंदरखाने इतनी तेजी से चल रही है कि विभाग के बड़े अफसर खुद असहज हैं।
सरकार के भीतर चर्चा यह है कि:
शराब प्रबंधन में सरकारी मॉडल फेल
अवैध शराब पकड़ने में नाकामी
राजस्व लगातार खतरे में
इसके कारण फिर से निजीकरण मॉडल पर मंथन शुरू हुआ है।
अभी कोई भी अधिकारी सार्वजनिक रूप से कुछ कहने को तैयार नहीं—लेकिन ये चर्चा अब राज्य से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुकी है।
सरकार की छवि पर सबसे बड़ा प्रहार—मदिरा दुकानों में अराजकता
सचिव ने आदेश दिया कि—
कहीं भी ओवररेट न हो
मिलावट न हो
सप्ताह में दो-दो दिन आकस्मिक निरीक्षण
दोषियों को तुरंत ब्लैकलिस्ट
लेकिन जमीनी हालात?
कई दुकानों में एमआरपी से ऊपर दाम
शराब छिपाकर बैकडोर सेल
बार–ढाबों में समय सीमा के बाद बिक्री
जब्त शराब का रिकॉर्ड भी संदिग्ध
यह सब दिखाता है कि सरकार का नियंत्रण सिर्फ फाइलों में है, दुकानों में नहीं।
संकट का दौरा या फिर कुछ और
छत्तीसगढ़ का शराब तंत्र आज सबसे गंभीर संकट के दौर में है।
एक तरफ विभाग 12,500 करोड़ का राजस्व चाहता है, दूसरी तरफ अवैध शराब, तस्करी और बाहरी राज्यों की बोतलों ने सरकारी बिक्री को खोखला कर दिया है।
राज्य में शराब नीति अधर में लटक गई है—और अब यह सवाल सिर्फ प्रदेश का नहीं, राष्ट्रीय स्तर का है।



