
मस्तूरी के ताज़ा रेल हादसे में 11 की मौत, 20 से ज़्यादा घायल — फिर भी अधूरे अंडरब्रिज और जर्जर सड़कों पर चल रही ज़िंदगियां दांव पर, सरकारें मूकदर्शक
मोहम्मद इसराइल बबलू| बिलासपुर–रायपुर

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर ज़िले के मस्तूरी विकासखण्ड में हाल ही में हुए भीषण रेल हादसे में 11 लोगों की मौत और 20 से अधिक के गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी राज्य प्रशासन और रेलवे महकमे की आंखें अब तक नहीं खुली हैं। हादसे का ज़ख्म ताज़ा है, लेकिन मौत को दावत देने वाले अधूरे पुल, जर्जर सड़कें और बंद रेलवे फाटक अब भी उसी लापरवाही से ज़िंदा हैं।
मस्तूरी–जय राम नगर मार्ग पर बना अधूरा पुल आज भी दुर्घटना का इंतज़ार कर रहा है। इस रास्ते से रोज़ हज़ारों वाहन और ग्रामीण गुजरते हैं, लेकिन अधूरे स्ट्रक्चर और खुले गड्ढों के बीच से निकलना मौत से जूझने जैसा जोखिम बन गया है। स्थानीय लोगों ने कई बार जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को चेताया, लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया।
10 साल पहले तारबहार फाटक पर भी हुआ था बड़ा हादसा
बिलासपुर के तारबहार फाटक पर करीब एक दशक पहले हुई दुर्घटना आज भी लोगों की यादों में जिंदा है, जब फाटक बंद होने के बावजूद मजदूरों और नागरिकों की जान चली गई थी। लेकिन इतने वर्षों में शासन ने कोई सबक नहीं लिया। अब वही गलती मस्तूरी, जयरामनगर और रायपुर-दल्लीराजहरा लाइन पर दोहराई जा रही है।
आठ साल में नहीं बना एक ब्रिज, अब रेलवे करेगा खुद निर्माण
PWD ने 8 साल में अंडरब्रिज नहीं बना पाया, जबकि इस दौरान फाइलें मंत्रालयों के चक्कर काटती रहीं। तकनीकी आपत्तियों और बजट संशोधन में प्रोजेक्ट अटकता चला गया। अब जाकर रेलवे ने खुद 12 अंडरब्रिजों का टेंडर निकालने की तैयारी शुरू की है।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, रायपुर और दल्लीराजहरा सेक्शन में 12 नए अंडरब्रिज प्रस्तावित हैं। इन पर करीब 150 करोड़ रुपये की लागत आएगी।
“कुछ प्रस्ताव स्वीकृत हो चुके हैं, टेंडर प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी,”
— अवधेश त्रिवेदी, सीनियर डीसीएम, रायपुर रेल मंडल।
राजधानी रायपुर में भी हाल बेहाल — हर 15 मिनट में बंद होता फाटक
रायपुर डिवीजन में खमतराई, सरस्वती नगर, कंचना और जोरा क्रॉसिंग वर्षों से शहरवासियों के लिए यातायात की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई हैं। इन मार्गों से रोजाना लगभग 200 ट्रेनें गुजरती हैं। हर 15–20 मिनट में फाटक बंद हो जाता है, जिससे दोनों तरफ वाहनों की किलोमीटरों लंबी लाइनें लग जाती हैं।
सुबह 6 से दोपहर 12 बजे और शाम 5 से रात 9 बजे तक हालात सबसे बदतर रहते हैं। स्कूली बच्चे, दफ्तर जाने वाले और एंबुलेंस तक घंटों फंसे रहते हैं।
जहां अंडरब्रिज बना, वहां पानी भरने से बंद
मोवा, महोबाबाज़ार और कचना क्षेत्रों में बने अंडरब्रिज भी राहत देने के बजाय मुसीबत बन चुके हैं। बारिश के मौसम में इनमें पानी भर जाता है और महीनों तक बंद पड़े रहते हैं। स्थानीय लोग मजबूरन रेलवे लाइन पार करते हैं — और यह हर पार के साथ मौत से जंग जैसा है।
फाइलों में उलझा सिस्टम, बढ़ती लागत और घटती सुरक्षा
अंडरब्रिज निर्माण की फाइलें सालों से मंत्रालयों के बीच घूम रही हैं। इस दौरान लागत कई गुना बढ़ गई, लेकिन परियोजनाएं ज़मीन पर नहीं उतर पाईं। PWD ने पुरानी दरों पर काम करने से इंकार कर दिया, अब रेलवे को नई लागत के साथ काम शुरू करना होगा।
यही नहीं, जिन पुलों का निर्माण हुआ है, उनमें निकासी नाली, सुरक्षा रेलिंग और लाइटिंग जैसी मूलभूत सुविधाएं तक अधूरी हैं।
जनप्रतिनिधि पर जनता का सवाल — “विधायक लहरिया आखिर हैं कहाँ?”
मस्तूरी के लोगों का आक्रोश:






रेल हादसे में 11 मौतों के बाद भी विधायक दिलीप लहरिया का इलाके में अब तक कोई प्रभावी दौरा नहीं हुआ।
स्थानीय लोग कहते हैं कि “जनप्रतिनिधि मानो नींद में हैं।”
अधूरे पुल, टूटी सड़कों और रेल क्रॉसिंग पर जान गंवा रहे लोगों के बीच विधायक की चुप्पी अब सवाल बन चुकी है।
“जब हादसे होते हैं, तब अफसर आते हैं। कैमरों के सामने बयान दिए जाते हैं, लेकिन हमारे नेता बस सोशल मीडिया पर फोटो डालते हैं,” — यह कहना है मस्तूरी निवासी संजय साहू का।
क्षेत्र के कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि विधायक लहरिया की निष्क्रियता ने पूरे क्षेत्र की विकास गति रोक दी है।
अधूरे ब्रिजों, बदहाल सड़कों और रेल हादसों पर उनकी चुप्पी अब प्रशासनिक मिलीभगत जैसी लगने लगी है।
“रेलवे-पब्लिक की जान की कीमत सिर्फ फाइलों में”
स्थानीय नागरिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि सरकार और रेलवे दोनों विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं।
मस्तूरी, बिलासपुर और रायपुर के कई इलाकों में हालात ऐसे हैं कि अगला बड़ा हादसा बस समय का इंतजार कर रहा है।



