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  चल जाबो पढ़ेबर, जीनगी गढ़ेबर… छत्तीसगढ़ में शिक्षा का मंदिर या मौत का कुआं? बरदुली स्कूल में छत का प्लास्टर गिरने से दो मासूम गंभीर, राज्य में जर्जर स्कूलों पर फिर उठे सवाल

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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Mohammed israil

Contents
छत्तीसगढ़ में स्कूलों की हालत बनी बच्चों के लिए जानलेवा – सिस्टम की लापरवाही से मासूमों पर टूटी आफत, जिम्मेदार अब भी ‘जिम्मेदारी’ से दूरकैसे हुआ हादसा – चश्मदीद और परिवार की आपबीतीस्थानीय नेताओं का पहुंचना – लेकिन क्या बदलता है?शिक्षा विभाग का रवैया – ‘अचानक’ कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिशरामचंद्र साहू (ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष, जरहागांव) का बयान: केस स्टडी – छत्तीसगढ़ में स्कूलों की जानलेवा बदहालीकेस 1: बरदुली, तखतपुर (मुंगेली, अगस्त 2025)केस 2: लोरमी (जुलाई 2024)केस 3: बिलासपुर (मार्च 2023) छत्तीसगढ़ में शिक्षा का ढांचा या मौत का जाल? क्या कहता है कानून और नीति?अब सवाल यह है –यह हादसा बड़ी चेतावनी

छत्तीसगढ़ में स्कूलों की हालत बनी बच्चों के लिए जानलेवा – सिस्टम की लापरवाही से मासूमों पर टूटी आफत, जिम्मेदार अब भी ‘जिम्मेदारी’ से दूर

बिलासपुर,जरहागांव/तखतपुर।
“चल जाबो पढ़ेबर, जीनगी गढ़ेबर” – सरकार का ये नारा अब गांव के बच्चों के लिए डरावना सपना बन गया है। मुंगेली जिले के तखतपुर ब्लॉक अंतर्गत शासकीय प्राथमिक शाला बरदुली में शुक्रवार को एक दर्दनाक हादसा हो गया, जब स्कूल की छत भरभराकर गिर गई और तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले दो मासूम छात्रों – हिमांशुक दिवाकर और आंशिक दिवाकर – गंभीर रूप से घायल हो गए।

कैसे हुआ हादसा – चश्मदीद और परिवार की आपबीती

हादसे के वक्त दोनों बच्चे क्लास में मौजूद थे। अचानक छत का बड़ा हिस्सा गिरा और सीधे उनके सिर पर आ लगा। हिमांशुक के सिर में तीन टांके आए हैं। घायल बच्चों को पहले दशरंगपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया और वहां से बिलासपुर रेफर करने की जरूरत के बावजूद उन्हें प्राथमिक इलाज के बाद ही घर भेज दिया गया।

बच्चों के पिता राजा दिवाकर और रमेश दिवाकर का कहना है कि उनके बच्चे अब स्कूल का नाम सुनकर कांप रहे हैं, गुमसुम हो गए हैं। इस हादसे ने उनके अंदर भय बैठा दिया है।

स्थानीय नेताओं का पहुंचना – लेकिन क्या बदलता है?

कांग्रेस नेता रामचंद्र साहू, सरपंच प्रतिनिधि तुकाराम साहूमकराल यादव मौके पर पहुंचे और बच्चों का हालचाल लिया। हरसंभव मदद का आश्वासन दिया गया। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि घटना के पहले स्कूल भवन की हालत की अनदेखी किसकी जिम्मेदारी थी?

शिक्षा विभाग का रवैया – ‘अचानक’ कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश

जिला शिक्षा अधिकारी सी.के. घृतलहरे ने बयान दिया है कि “घटना अचानक हुई, भवन में ऐसी स्थिति स्पष्ट नहीं थी। प्रधान पाठक व स्टाफ ने कहा कि किसी खतरे के संकेत नहीं थे। अब बच्चों की कक्षा आंगनबाड़ी भवन में लगाने का निर्देश दिया गया है।”

रामचंद्र साहू (ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष, जरहागांव) का बयान:

“भवन की हालत पहले से जर्जर थी, बच्चों की जान जोखिम में डालना अपराध है। प्रशासन से मांग की गई है कि अतिरिक्त कक्षा निर्माण कराया जाए और दोषियों पर कार्रवाई हो।”


केस स्टडी – छत्तीसगढ़ में स्कूलों की जानलेवा बदहाली

केस 1: बरदुली, तखतपुर (मुंगेली, अगस्त 2025)

छत गिरने से दो बच्चे घायल, शिक्षकों की लापरवाही और जर्जर भवन की अनदेखी। हालत गंभीर, फिर भी केवल प्राथमिक उपचार।

केस 2: लोरमी (जुलाई 2024)

प्लास्टर गिरने से बच्चा घायल, जर्जर भवन को लेकर ग्रामीणों ने शिक्षा विभाग को कई बार चेताया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं।

केस 3: बिलासपुर (मार्च 2023)

प्राथमिक स्कूल में दीवार गिरने से एक बच्ची की मौत, कोर्ट ने लिया संज्ञान, शिक्षा सचिव से जवाब-तलब।


छत्तीसगढ़ में शिक्षा का ढांचा या मौत का जाल?

  • पिछले 5 वर्षों में 100 से अधिक स्कूल भवनों की जर्जर स्थिति की रिपोर्ट शिक्षा विभाग को भेजी गई, फिर भी मरम्मत या पुनर्निर्माण नहीं
  • करोड़ों रुपये की ग्रांट के बावजूद मरम्मत कार्य अधर में।
  • हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया – लेकिन जमीन पर हालात जस के तस।
  • ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों की जान से खिलवाड़ बन चुका है सरकारी स्कूलों का दूसरा नाम।

क्या कहता है कानून और नीति?

  • आरटीई अधिनियम (2009) के तहत सभी सरकारी स्कूलों को सुरक्षित भवन, शौचालय, पीने का पानी और कक्षा कक्ष की अनिवार्यता है।
  • इसके बावजूद राज्य के सैकड़ों स्कूल बिना मरम्मत के जर्जर भवनों में चल रहे हैं।

अब सवाल यह है –

  • क्या शिक्षा विभाग मासूम बच्चों की जान से खेलता रहेगा?
  • क्या जिम्मेदारों पर आपराधिक मामला दर्ज होगा?
  • कब तक ‘दुर्घटनाएं’ जिम्मेदारों की लापरवाही का नाम छुपाती रहेंगी?

यह हादसा बड़ी चेतावनी

शिक्षा का अधिकार बच्चों का संवैधानिक हक है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह हक उन्हें डर, खतरे और जर्जर दीवारों के साए में मिल रहा है। बरदुली की यह घटना एक चेतावनी है – सिस्टम को अब जगना ही होगा, नहीं तो अगली बार कोई मासूम लौटेगा ही नहीं।

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