Mohammed israil
बंदर, कुत्ता, अदानी और आदिवासी अपमान: मर्यादा की रेखाएं लांघते दोनों दल, सामाजिक चेतना पर भारी सियासी खुन्नस
Bilaspur, Chhattisgarh, रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों विचारों और नीतियों से ज़्यादा कार्टून और कटाक्ष की छींटाकशी का मैदान बन गई है। कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रही बयानबाज़ी अब व्यक्तिगत अपमान और जातिगत-सांस्कृतिक असंवेदनशीलता तक जा पहुंची है।
एक तरफ कांग्रेस मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को अदानी के सहयोगी और अब बंदर के रूप में दिखा रही है, वहीं जवाबी पलटवार में भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को स्वान (कुत्ता) दर्शाने वाला कार्टून पोस्ट कर राजनीतिक मर्यादाओं को और भी लांघ दिया।
कांग्रेस का कार्टून: मुख्यमंत्री को ‘बंदर’ के रूप में दिखाया

कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को एक फिल्मी संदर्भ में अदानी के साथ जोड़ा गया। भाजपा ने इसे ‘सहिष्णुता के दायरे में’ लेकर शांत प्रतिक्रिया दी।
लेकिन जब हाल ही में एक और पोस्ट में मुख्यमंत्री को बंदर के रूप में चित्रित किया गया, तब भाजपा भड़क उठी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यह न केवल व्यक्तिगत हमला है, बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान पर चोट भी है।
भाजपा का पलटवार: भूपेश बघेल को बनाया ‘स्वान’

भाजपा ने जवाब में एक कटाक्षी पोस्ट के ज़रिए कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को कुत्ते के रूप में चित्रित कर दिया। यह अब तक का सबसे सीधा और तीखा पलटवार था, जो भाजपा की बदली हुई रणनीति को दर्शाता है — अब “जैसे को तैसा” जवाब दिया जाएगा।
भाजपा नेता का बयान (नाम न छापने की शर्त पर):
“हमारे सहज-सरल आदिवासी मुख्यमंत्री के खिलाफ ऐसा अमर्यादित चित्रण जिन लोगों को अपमान नहीं लगा, वे अब भूपेश बघेल का कार्टून देखकर घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। ये दोहरापन अब नहीं चलेगा।”
कार्टून वार की टाइमलाइन:
तारीखघटना 🔸 15 जुलाई कांग्रेस ने CM विष्णुदेव को अदानी के साथ फिल्मी अंदाज़ में दिखाया 🔸 20 जुलाई कांग्रेस ने मुख्यमंत्री को ‘बंदर’ के रूप में चित्रित किया 🔸 22 जुलाई भाजपा ने पलटवार करते हुए भूपेश बघेल को ‘स्वान’ बताया
राजनीतिक मर्यादा या रणनीतिक बदलाव?
विश्लेषकों की मानें तो भाजपा अब ‘शालीनता की राजनीति’ से बाहर निकल कर कांग्रेस की शैली में जवाब देने को तैयार दिख रही है।
कांग्रेस यह मानती रही कि भाजपा उसकी तरह संवेदनशील और शांत छवि वाली पार्टी है, जो कभी इस भाषा में प्रतिक्रिया नहीं देगी। लेकिन अब भाजपा ने संकेत दे दिया है कि ‘डिफरेंस की पार्टी’ अब डिफेंस से बाहर आ गई है।
प्रश्न जो जनता पूछ रही है:
- क्या यह बहस जन मुद्दों से ध्यान भटकाने की रणनीति है?
- क्या राजनीति में वर्ग, जाति और सामाजिक पृष्ठभूमि का उपहास अब आम बात बन गई है?
- क्या दोनों दलों को यह याद नहीं कि उनके शब्द और छवियां समाज में प्रतिध्वनि बनती हैं?



