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बेपर्दा हुई छत्तीसगढ़ में फिर स्वास्थ्य सुविधा… एंबुलेंस नहीं पहुंची, 4 किलोमीटर पैदल चली… खुले आसमान के नीचे गर्भवती ने बच्चे को दिया जन्म

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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Mohammed israil bablu

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00 “सड़क नहीं, पुल नहीं — छत्तीसगढ़ में गर्भवती महिलाएं अस्पताल नहीं, किस्मत के भरोसे जाती हैं!”00 स्वास्थ्य विभाग की ‘विकास यात्रा’ कागज़ पर तेज, ज़मीनी हालात में फेलबलरामपुर, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)।राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उस वक्त उजागर हो गई, जब प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक महिला को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी — क्योंकि गांव तक ना सड़क थी, ना पुल। नतीजा: गर्भवती महिला को कीचड़, नाला और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुज़रते हुए कंधों पर ढोकर अस्पताल ले जाया गया।सरकार के ‘स्वास्थ्य मिशन’ और ‘जननी सुरक्षा योजना’ जैसी योजनाओं के बीच यह दृश्य एक सवाल छोड़ जाता है — क्या छत्तीसगढ़ की माताएं आज भी 21वीं सदी में सुरक्षित प्रसव की उम्मीद कर सकती हैं?क्या है मामला पूर्व की घटनाएं जो साबित करती हैं व्यवस्था की विफलता किसने, क्या कहा सिस्टम की विडंबना और सरकार की योजनाएं सरकार से क्या है अपेक्षा

00 “सड़क नहीं, पुल नहीं — छत्तीसगढ़ में गर्भवती महिलाएं अस्पताल नहीं, किस्मत के भरोसे जाती हैं!”00 स्वास्थ्य विभाग की ‘विकास यात्रा’ कागज़ पर तेज, ज़मीनी हालात में फेल


बलरामपुर, बिलासपुर (छत्तीसगढ़)।राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत उस वक्त उजागर हो गई, जब प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक महिला को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी — क्योंकि गांव तक ना सड़क थी, ना पुल। नतीजा: गर्भवती महिला को कीचड़, नाला और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुज़रते हुए कंधों पर ढोकर अस्पताल ले जाया गया।सरकार के ‘स्वास्थ्य मिशन’ और ‘जननी सुरक्षा योजना’ जैसी योजनाओं के बीच यह दृश्य एक सवाल छोड़ जाता है — क्या छत्तीसगढ़ की माताएं आज भी 21वीं सदी में सुरक्षित प्रसव की उम्मीद कर सकती हैं?


क्या है मामला

  • स्थान: सोनहत गांव, वाड्रफनगर विकासखंड, जिला बलरामपुर
  • स्थिति: गर्भवती महिला को हुई प्रसव पीड़ा, एंबुलेंस बुलाई गई
  • बाधा: गांव तक एंबुलेंस नहीं पहुंच सकी क्योंकि न सड़क है, न पुल
  • स्थानीयों की मदद: ग्रामीणों ने महिला को लकड़ी के डंडे पर कपड़ा बांधकर झूले की तरह लटकाया और कई किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया
  • अस्पताल की दूरी: लगभग 7 किलोमीटर
  • सड़क की हालत: कीचड़ से भरी, बरसात में पूरी तरह दुर्गम
  • नदी पार: बिना पुल के, पैदल पार कराना पड़ा
  • नतीजा: महिला ने अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में बच्ची को जन्म दिया

पूर्व की घटनाएं जो साबित करती हैं व्यवस्था की विफलता

  • जशपुर (2023): गर्भवती महिला ने बांस की खाट पर नदी पार कर अस्पताल पहुंचने की कोशिश की — बच्चा रास्ते में मरा
  • सरगुजा (2022): प्रसव पीड़िता को 15 किलोमीटर तक बाइक से बैठाकर ले जाया गया, क्योंकि गांव में सड़क नहीं थी
  • कोरिया (2024): एंबुलेंस न मिलने पर परिजन ने ठेले पर गर्भवती को लिटाकर अस्पताल पहुंचाया

किसने, क्या कहा

  • गांव के निवासी बृजमोहन यादव:
    “हर साल सरकार वादा करती है सड़क बनेगी, लेकिन आज भी हमारे बच्चे कीचड़ में जन्म लेते हैं। ये कैसा विकास है?”
  • महिला की सास सुनीता देवी:
    “हमने चार लोगों से उठाकर बहू को अस्पताल तक पहुँचाया। भगवान का नाम लेकर चल पड़े थे। रास्ते में ही बच्चा हो गया।”
  • स्वास्थ्य अधिकारी, वाड्रफनगर (नाम नहीं देना चाहा):
    “हमारी ओर से समय पर एंबुलेंस भेजी गई थी, लेकिन रास्ता पूरी तरह बंद था। प्रशासन को कई बार सूचना दी गई है कि वहां पुल आवश्यक है।”

सिस्टम की विडंबना और सरकार की योजनाएं

समस्या घटकस्थिति और वास्तविकतापुल/सड़क की अनुपस्थिति कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं, नदी पार करना मजबूरी बारंबार की घटनाएं बलरामपुर, जशपुर, सरगुजा जैसे जिलों में लगातार ऐसी घटनाएं, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं जननी सुरक्षा योजना सिर्फ कागज़ों में सीमित — जमीनी स्तर पर सुविधा नहीं पहुँच रही महिलाओं तक सर्वत्र स्वास्थ्य अभियान स्थायी हेल्थ सेंटर नहीं, सिर्फ मोबाइल क्लीनिक से अस्थायी व्यवस्था एंबुलेंस सेवा गांवों में नहीं पहुँच पाती — या तो रास्ता नहीं या वाहन खराब


सरकार से क्या है अपेक्षा

यह घटना केवल एक महिला की नहीं, बल्कि हर उस गर्भवती महिला की है जो दूरदराज गांवों में रहती है। स्वास्थ्य विभाग की योजना जब तक फाइलों से बाहर नहीं निकलेगी और गांव तक नहीं पहुंचेगी, तब तक हर प्रसव एक युद्ध बना रहेगा।

हमारी सरकार से अपेक्षा है कि:

  • बलरामपुर जैसे इलाकों में तत्काल पुल और सड़क निर्माण की दिशा में कार्य हो
  • स्थायी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की जाए
  • रेगुलर एंबुलेंस सेवा, स्वास्थ्यकर्मी और प्रसवपूर्व देखभाल को सुदृढ़ किया जाए
  • स्वास्थ्य योजनाओं का सामाजिक ऑडिट किया जाए, ताकि केवल प्रचार न हो, असल सुविधा भी मिले

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