Mohammed israil,बिलासपुर | “जाने के बाद भी जिए कोई, तो उसे घनश्याम प्रसाद गुप्ता कहते हैं।” — कुछ ऐसा ही अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया तोरवा, बिलासपुर निवासी 79 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक श्री घनश्याम प्रसाद गुप्ता ने, जिन्होंने मरणोपरांत स्वेच्छा से देहदान कर नई पीढ़ी के चिकित्सा छात्रों के लिए ज्ञान का अमूल्य स्रोत छोड़ गए।
शनिवार सुबह 10 बजे उनका शांतिपूर्ण निधन हुआ। निधन से एक दिन पहले ही उन्होंने परिजनों से इच्छा जताई कि उनका शरीर चिकित्सा शिक्षा के लिए समर्पित किया जाए। उनकी इस अंतिम इच्छा को उनके परिजनों — श्री सुधीर गुप्ता, शिशिर गुप्ता और हेमंत गुप्ता (बसंत साड़ी सेंटर, सदर बाजार) — ने गंभीरता से लिया और इसकी जानकारी सिम्स चिकित्सालय, बिलासपुर को दी।
दस्तावेजी प्रक्रिया पूर्ण कर विधिवत स्वीकृति
परिवार की जानकारी के बाद सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने इसे एक पवित्र सामाजिक कार्य मानते हुए तत्काल एनाटॉमी विभागाध्यक्ष डॉ. अमित श्रीवास्तव को आगे की प्रक्रिया हेतु निर्देशित किया। जरूरी दस्तावेजों की पूर्ति के पश्चात श्री गुप्ता का देहदान विधिवत रूप से स्वीकार किया गया।
इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह, डॉ. मधुमिता मूर्ति, डॉ. शिक्षा जांगड़े, डॉ. वीणा मोटवानी, डॉ. कमलजीत बाशन, डॉ. निष्ठा सिंह, आशुतोष शर्मा एवं परिजन मौजूद रहे।
क्या होता है देहदान और एमबीबीएस की पढ़ाई में उसका महत्व?
देहदान यानी किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मृत्यु के पश्चात शरीर को चिकित्सा शिक्षा या अनुसंधान के लिए समर्पित करना।
🩻 एमबीबीएस की पढ़ाई की नींव मृत देह (कैडवर) पर आधारित होती है।
- एनाटॉमी (शरीर रचना) की पढ़ाई कैडवर के बिना अधूरी मानी जाती है।
- छात्र सबसे पहले कैडवर के सामने शपथ लेते हैं कि वे इस “प्रथम शिक्षक” के प्रति पूरे सम्मान और संवेदनशीलता से व्यवहार करेंगे।
- शरीर की नस-नाड़ी, अंगों की संरचना, क्रिया और परस्पर संबंधों को गहराई से समझने के लिए यह अध्ययन अनिवार्य है।
- कई छात्र कहते हैं — “कैडवर हमें वो सिखाता है जो कोई किताब नहीं सिखा सकती।”
🔬 इसके साथ ही मेडिकल शोध, सर्जिकल प्रशिक्षण और नवाचारों में भी देहदान अत्यंत सहायक होता है।
👉🏻 इसलिए देहदान को “अमृतदान” कहा जाता है — मृत्यु के बाद भी जीवन के लिए योगदान देने वाला कार्य।
सामाजिक चेतना का संदेश
श्री घनश्याम प्रसाद गुप्ता का यह कदम न केवल चिकित्सा जगत के लिए प्रेरक है, बल्कि आम नागरिकों को भी यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि वे मृत्यु के उपरांत भी समाज की सेवा कैसे कर सकते हैं।
सिम्स परिवार ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके सामाजिक, नैतिक और मानवीय योगदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट की।



