नॉस्टेल्जिया’ में श्रुति प्रभला की सुरमयी आवाज ने जगाईं पुरानी यादें; 19 सदाबहार गीतों, रागों की दिलचस्प व्याख्या और वाद्य-संगत ने लखीराम ऑडिटोरियम को बनाया यादों का गुलदस्ता
बिलासपुर। कुछ गीत सिर्फ सुने नहीं जाते, वे दिल में उतरते हैं। कुछ धुनें केवल संगीत नहीं होतीं, बल्कि बीते हुए वक्त, अधूरी मोहब्बत, पुराने रिश्तों और जिंदगी के उन खूबसूरत लम्हों की दस्तक होती हैं, जिन्हें इंसान चाहकर भी भुला नहीं पाता। शनिवार की शाम बिलासपुर के लखीराम ऑडिटोरियम में कुछ ऐसा ही जादू बिखरा, जब ‘हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे’ की भावभूमि पर सजी सांगीतिक महफिल ‘नॉस्टेल्जिया’ ने हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर को एक बार फिर जीवंत कर दिया।






शास्त्रीय गायिका श्रुति प्रभला की सुरीली आवाज में जब पुराने हिंदी फिल्मी गीतों ने आकार लिया, तो सभागार में मौजूद श्रोता संगीत के साथ यादों की उस दुनिया में पहुंचते चले गए, जहां हर धुन के साथ कोई चेहरा, कोई रिश्ता और जिंदगी का कोई भूला-बिसरा लम्हा आंखों के सामने आ खड़ा होता है। ‘बावरा मन’ और ‘श्लोक-ध्वनि फाउंडेशन’ के संयुक्त आयोजन में 19 सदाबहार गीतों की प्रस्तुति ने साबित कर दिया कि अच्छे संगीत की उम्र नहीं होती। वक्त बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं, लेकिन दिल को छू लेने वाली धुनों का जादू कभी पुराना नहीं पड़ता।
महफिल का आगाज पुरानी यादों की खुशबू के साथ हुआ और जैसे-जैसे गीतों का कारवां आगे बढ़ा, श्रोताओं की भावनाएं भी सुरों के साथ बहती चली गईं। प्रेम की नजाकत, विरह की कसक, जिंदगी की सादगी और रिश्तों की आत्मीयता से सजे गीतों ने माहौल को ऐसा रंग दिया कि यह आयोजन महज एक संगीत कार्यक्रम नहीं, बल्कि बीते दौर से रूबरू होने का भावनात्मक सफर बन गया।
पुराने गीत, नई अनुभूति… श्रुति ने सुरों में पिरो दीं यादें
‘नॉस्टेल्जिया’ की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि श्रुति प्रभला ने सदाबहार फिल्मी गीतों को केवल अपनी आवाज में दोहराने तक सीमित नहीं रखा। उनकी शास्त्रीय साधना ने हर गीत को एक अलग सांगीतिक पहचान दी। सुरों की शुद्धता, शब्दों की संवेदना और गीत के मूल भाव के बीच ऐसा संतुलन दिखाई दिया, जिसने श्रोताओं को गीतों को नए नजरिए से सुनने का अवसर दिया।
‘पत्ता-पत्ता, बूटा-बूटा’, ‘ये रातें ये मौसम, नदी का किनारा’ और ‘एक प्यार का नगमा है’ जैसे गीतों ने सभागार में मौजूद लोगों को भावनाओं के अलग-अलग रंगों से रूबरू कराया। कहीं प्रेम की कोमलता महसूस हुई, तो कहीं बीते दिनों की मीठी यादों ने मन को छुआ। गीतों के दौरान गूंजती तालियां इस बात का संकेत थीं कि मंच से उठते सुर सीधे श्रोताओं के दिल तक पहुंच रहे थे।
इस प्रस्तुति में सबसे खास बात यह रही कि पुराने गीतों की मूल आत्मा को बरकरार रखते हुए उन्हें शास्त्रीय संगीत की दृष्टि से भी समृद्ध बनाया गया। श्रुति की गायकी में कहीं भी अनावश्यक प्रदर्शन का भाव नहीं था। इसके बजाय हर गीत को उसकी भावभूमि, राग की प्रकृति और शब्दों की संवेदना के अनुरूप प्रस्तुत करने की कोशिश नजर आई।
फिल्मी गीतों के पीछे छिपे रागों का खुला राज
संगीतप्रेमियों के लिए ‘नॉस्टेल्जिया’ सिर्फ सुनने का नहीं, सीखने का भी अवसर बना। श्रुति प्रभला ने सदाबहार फिल्मी गीतों के शास्त्रीय आधार की दिलचस्प व्याख्या करते हुए बताया कि हिंदी सिनेमा का संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपराओं से किस तरह समृद्ध हुआ है।
‘दिल ढूंढता है’ में राग बिहाग, ‘चैन से हमको कभी’ में यमन कल्याण, ‘लग जा गले’ में पहाड़ी और ‘हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे’ में राग देश की पहचान कराते हुए उन्होंने संबंधित रागों के चलन और विशेषताओं को सहज भाषा में समझाया।
उनकी प्रस्तुति का अंदाज भी खास रहा। मुख्य गीत सुनाने से पहले उसी राग पर आधारित दूसरे लोकप्रिय गीतों की पंक्तियां सुनाकर उन्होंने श्रोताओं को अलग-अलग रचनाओं के सांगीतिक संबंध समझने का मौका दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि एक ही राग किस तरह अलग-अलग गीतों में अलग भाव, अलग रंग और अलग अनुभूति के साथ सामने आ सकता है।
शास्त्रीय संगीत की बारीकियों को सरल तरीके से प्रस्तुत करने की इस शैली ने कार्यक्रम को एक विशिष्ट पहचान दी। जिन श्रोताओं के लिए रागों की दुनिया अब तक जटिल रही होगी, उनके लिए भी यह अनुभव सहज और दिलचस्प बना। वहीं, संगीत की समझ रखने वाले लोगों को फिल्मी धुनों के शास्त्रीय पक्ष को करीब से महसूस करने का अवसर मिला।
वायलिन की मिठास, तबले की थाप और सिंथेसाइजर का संगम
किसी भी यादगार संगीत प्रस्तुति की खूबसूरती सिर्फ मुख्य गायक की आवाज में नहीं, बल्कि उन तमाम सुरों में भी होती है, जो मिलकर संगीत का पूरा संसार रचते हैं। ‘नॉस्टेल्जिया’ में संगतकारों ने इसी सामंजस्य को बखूबी निभाया।
भोपाल से आए अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वायलिन वादक मनोज कुमार ने अपनी मधुर और भावप्रवण धुनों से गीतों की संवेदनाओं को विस्तार दिया। वायलिन की स्वर-लहरियां कई मौकों पर गीतों के भावों में इस तरह घुल-मिल गईं कि वाद्य स्वयं अपनी कहानी कहता महसूस हुआ। गीतों की भावनात्मक गहराई को उभारने में उनके वादन की भूमिका खास रही।
तबले पर शाहनवाज हुसैन ने सधी हुई थाप और नफासतपूर्ण लयकारी से पूरी प्रस्तुति को मजबूत आधार दिया। गायकी के साथ उनका संवेदनशील तालमेल गीतों की लय और भाव को सहजता से आगे बढ़ाता रहा।
सिंथेसाइजर पर शाहिद मासूम ने गीतों के मूल संगीत-संसार को प्रभावी ढंग से उभारा, जबकि ऑक्टोपैड पर पीटर मुदलियार ने लय के आधुनिक रंगों को जोड़कर संगीत संयोजन को समृद्ध बनाया।
आलाप से लेकर गीतों के बीच की सांगीतिक कड़ियों तक, चारों संगतकारों ने श्रुति प्रभला के सुरों के साथ ऐसा सामंजस्य बनाया कि गायन और वादन एक-दूसरे के पूरक बनकर उभरे। यही वजह रही कि प्रस्तुति में संगीत के पारंपरिक सौंदर्य और आधुनिक मंचीय संयोजन का संतुलित रूप दिखाई दिया।
गीतों के बहाने श्रोताओं से सीधा संवाद
‘नॉस्टेल्जिया’ की शाम को और आत्मीय बनाया कार्यक्रम के संचालक विवेक जोगलेकर ने। उन्होंने गीत, फिल्म, गायक और गीतकार से जुड़े संकेत देकर श्रोताओं को गीत पहचानने के लिए आमंत्रित किया। शुरुआत में सभागार में मौजूद लोगों की झिझक दिखाई दी, लेकिन धीरे-धीरे माहौल खुलता गया और श्रोताओं की भागीदारी बढ़ने लगी।
पुराने गीतों को पहचानने, उनके संदर्भ याद करने और उनके बोलों से जुड़ने का यह सिलसिला कार्यक्रम को महज मंचीय प्रस्तुति से आगे ले गया। श्रोता सिर्फ संगीत सुनने वाले नहीं रहे, बल्कि महफिल के सक्रिय सहभागी बन गए।
विवेक जोगलेकर का सधा हुआ उद्घोषणा अंदाज, गीतों से जुड़े रोचक संकेत और श्रोताओं से आत्मीय संवाद कार्यक्रम की लय के साथ चलते रहे। इसने आयोजन में एक ऐसा अपनापन पैदा किया, जिसमें मंच और सभागार के बीच की दूरी कम होती महसूस हुई।
दीप प्रज्ज्वलन से शुरुआत, आभार के साथ समापन
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। इसके बाद आमंत्रित कलाकारों का सम्मान किया गया। ‘बावरा मन’ के सचिव राजेश दुआ ने अतिथियों और श्रोताओं का स्वागत किया। कार्यक्रम के समापन पर ‘श्लोक-ध्वनि फाउंडेशन’ के श्रीकुमार ने आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर श्रुति प्रभला ने अपने विचार साझा करते हुए कहा, “मेरे लिए ‘नॉस्टेल्जिया’ केवल पुराने गीत गाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन भावनाओं को फिर से जीने की कोशिश है, जो इन गीतों के साथ हमारी जिंदगी में रच-बस गई हैं। रागों की खूबसूरती और गीतों के सांगीतिक पक्ष को श्रोताओं के साथ साझा करना मेरे लिए विशेष अनुभव है। उनका स्नेह और उत्साह इस शाम को हमेशा यादगार बनाए रखेगा।”
संगतकारों की ओर से भी संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि श्रुति की रागप्रधान गायकी के साथ इन कालजयी गीतों को प्रस्तुत करना एक सुखद सांगीतिक अनुभव रहा। जब सुर, लय और वाद्य एक-दूसरे से संवाद करते हैं और श्रोता भी उसी भावधारा में बहने लगते हैं, तब संगीत की महफिल सचमुच यादगार बन जाती है।
आखिरी गीत ने कह दी पूरी शाम की कहानी
कार्यक्रम के समापन पर जब ‘अभी न जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं’ की धुन गूंजी, तो लगा जैसे पूरे आयोजन की भावनाएं इन्हीं शब्दों में सिमट आई हों। यह सिर्फ अंतिम गीत नहीं था, बल्कि उस शाम का सार था, जिसमें संगीत ने यादों को आवाज दी, पुराने रिश्तों की गर्माहट को फिर महसूस कराया और बीते दौर की खूबसूरती को वर्तमान में उतार दिया।
‘नॉस्टेल्जिया’ ने यह संदेश दिया कि कालजयी गीत समय की सीमाओं में कैद नहीं होते। वे पीढ़ियों के बीच पुल बनाते हैं, लोगों को उनकी स्मृतियों से जोड़ते हैं और जीवन के उन एहसासों को फिर जीवित कर देते हैं, जिन्हें रोजमर्रा की भागदौड़ में हम कहीं पीछे छोड़ आते हैं।
बिलासपुर के लखीराम ऑडिटोरियम में सजी यह सांगीतिक महफिल इसी मायने में खास रही कि यहां संगीत केवल मनोरंजन नहीं बना, बल्कि यादों, संवेदनाओं और सांस्कृतिक विरासत का उत्सव बनकर सामने आया। शाम ढल गई, कलाकारों ने विदाई ली, लेकिन अंतिम गीत के बोल देर तक मन में गूंजते रहे—
“अभी न जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं…”
