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आदिवासियों के संवैधानिक हकों की अनदेखी पर राष्ट्रपति का ध्यान खींचा, सुभाष परते ने उठाई आवाज

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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अलग आदिवासी धर्म कोड, यूसीसी से छूट और पेसा कानून में ग्रामसभा के अधिकारों की मांग; युवा प्रभाग के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष परते ने मूलनिवासियों के मुद्दों को प्रमुखता से रखा
रायपुर। आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, सांस्कृतिक पहचान और जल-जंगल-जमीन से जुड़े सवालों को लेकर सर्व आदिवासी समाज के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से मुलाकात की। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष अरविंद नेताम के नेतृत्व में 22 अक्टूबर को हुई इस मुलाकात में छत्तीसगढ़ सहित देश के आदिवासी समुदायों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए। प्रतिनिधिमंडल में शामिल युवा प्रभाग के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष सिंह परते ने छत्तीसगढ़ में मूलनिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी का मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए राष्ट्रपति का ध्यान आकर्षित कराया।
प्रतिनिधिमंडल ने आगामी जनगणना में अलग आदिवासी धर्म कोड, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से आदिवासी समाज को पृथक रखने, पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, आदिवासी भूमि की सुरक्षा, विस्थापित परिवारों की वापसी और आरक्षण से जुड़े विषयों पर अलग-अलग ज्ञापन सौंपे। समाज ने केंद्र और राज्य सरकारों से संवैधानिक प्रावधानों के पालन तथा आदिवासियों की वर्तमान स्थिति की समीक्षा कराने की मांग की।
सुभाष परते ने उठाया मूलनिवासियों के अधिकारों की अनदेखी का सवाल
इस मुलाकात में युवा प्रभाग के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष सिंह परते की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्होंने प्रदेश में मूलनिवासी आदिवासी समाज के संवैधानिक हकों की अनदेखी से जुड़े विषयों पर राष्ट्रपति का ध्यान आकर्षित कराया। प्रतिनिधिमंडल की ओर से उठाए गए मुद्दों में आदिवासी समाज की पहचान, अधिकारों की सुरक्षा और संवैधानिक प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया गया।
सुभाष परते ने जिन मुद्दों को प्रमुखता से उठाया, वे केवल आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जमीन, रोजगार, आरक्षण और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने के अधिकारों से भी जुड़े हैं। इन सवालों पर केंद्र और राज्य सरकारों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग प्रतिनिधिमंडल के ज्ञापनों का अहम हिस्सा रही।
जनगणना में अलग आदिवासी धर्म कोड की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने आगामी जनगणना में आदिवासी समाज के लिए अलग धर्म कोड का प्रावधान करने की मांग की। समाज का कहना है कि आदिवासियों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इसके साथ ही समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से आदिवासी समाज को पृथक रखने का निवेदन भी राष्ट्रपति के समक्ष रखा गया।
पेसा कानून लागू हो, ग्रामसभाओं को मिले वास्तविक अधिकार
आदिवासी बहुल क्षेत्रों में पेसा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। प्रतिनिधिमंडल ने छत्तीसगढ़ में पेसा कानून के अनुरूप नियमों को प्रभावी बनाने और ग्रामसभाओं को उनके अधिकार देने की मांग की। आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन से जुड़े फैसलों में ग्रामसभाओं की भूमिका मजबूत करने पर जोर दिया गया।
खनन और उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण पर चिंता
खनन एवं औद्योगिक परियोजनाओं के लिए आदिवासी भूमि के अधिग्रहण और इसके चलते परिवारों के विस्थापन का विषय राष्ट्रपति के सामने रखा गया। प्रतिनिधिमंडल ने आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल होने से बचाने और प्रभावित परिवारों के हितों की रक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की।
बस्तर में भूमि बंदोबस्त नहीं होने के कारण आदिवासियों को राजस्व विभाग से संबंधित कार्यों में होने वाली परेशानियों की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया गया। प्रतिनिधिमंडल ने इस समस्या के समाधान के लिए आवश्यक कार्रवाई का आग्रह किया।
सलवा जुडूम और नक्सलवाद से विस्थापित आदिवासियों को बसाने की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने नक्सलवाद और सलवा जुडूम के कारण बस्तर से विस्थापित हुए आदिवासी परिवारों की वापसी और पुनर्वास का मुद्दा उठाया। मांग की गई कि परिस्थितियां अनुकूल होने पर प्रभावित परिवारों को उनके मूल गांवों में दोबारा बसाने की दिशा में पहल की जाए।
इसके साथ ही नक्सलवाद से जुड़े मामलों में वर्षों से जेलों में बंद निर्दोष आदिवासियों के मामलों की जांच कराकर पात्र लोगों की शीघ्र रिहाई के लिए कार्रवाई करने का आग्रह किया गया।
आरक्षण, पदोन्नति और बैकलॉग भर्ती पर भी ज्ञापन
आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने आरक्षण, पदोन्नति में आरक्षण, बैकलॉग पदों पर भर्ती और स्थानीय भर्ती से जुड़े विषयों को भी राष्ट्रपति के समक्ष रखा। आय सीमा 2.50 लाख रुपये से संबंधित मुद्दा भी ज्ञापन में शामिल किया गया। इन विषयों पर अलग-अलग पत्र सौंपकर संबंधित समस्याओं के निराकरण की मांग की गई।
प्रतिनिधिमंडल ने आग्रह किया कि आदिवासियों के लिए संविधान में निर्धारित अधिकारों और प्रावधानों के पालन की केंद्र तथा राज्य सरकार के स्तर पर समीक्षा की जाए, ताकि लंबित समस्याओं का समाधान सुनिश्चित हो सके।
राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज को एकजुट और जागरूक होने का संदेश दिया
प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज को अपनी पहचान और अधिकारों के संरक्षण के लिए एकजुट होकर काम करने तथा जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने आदिवासियत और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सामूहिक प्रयासों पर जोर दिया।
देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि रहे शामिल
राष्ट्रपति से मुलाकात करने वाले प्रतिनिधिमंडल में सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम, गोंडवाना गोंड महासभा छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष अकबर राम कोर्राम, कार्यकारी अध्यक्ष बीएस रावटे, प्रदेश सचिव विनोद नागवंशी, झारखंड के पूर्व सांसद देवकुमार धान, गोंडवाना गोंड महासभा मध्यप्रदेश के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष भुवन कोर्राम, महाराष्ट्र के विश्वनाथ ताना जी वाकड़े, असम के नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स यूनियन के सलाहकार निपोन सुटिया, कोषाध्यक्ष मोहनलाल कोमारे, प्रदेश उपाध्यक्ष जीवरखान मराई, महिला प्रभाग अध्यक्ष सविता साय, युवा प्रभाग अध्यक्ष सुभाष परते, बस्तर संभाग की गोंडवाना समन्वय समिति के अध्यक्ष सुमेर सिंह नाग और संयुक्त सचिव महेश रावटे शामिल रहे।

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