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बिलासपुर की हवाई उड़ान पर ब्रेक, अब सरकार को जगाने उल्टा मार्च

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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सात साल का संघर्ष, घटती उड़ानें और अधूरे विकास का सवाल, 26 अक्टूबर को महाधरना स्थल से कलेक्टोरेट तक निकलेगा अनोखा विरोध मार्च

दिल्ली की उड़ान सप्ताह में सात दिन से घटकर चार दिन, प्रयागराज की चार से एक दिन; जबलपुर, भोपाल और इंदौर की सेवाएं बंद होने का समिति का दावा। 4C श्रेणी के एयरपोर्ट, रनवे विस्तार और महानगरों से सीधी कनेक्टिविटी की मांग पर फिर लामबंद हो रहा बिलासपुर


बिलासपुर |
किसी शहर के विकास की दिशा आगे बढ़ती है, लेकिन जब उसकी हवाई कनेक्टिविटी पीछे जाने लगे तो विरोध का तरीका भी प्रतीकात्मक रूप से उल्टा हो सकता है। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में हवाई सुविधाओं के विस्तार और एयरपोर्ट के विकास की मांग को लेकर सातवें वर्ष में प्रवेश कर चुका आंदोलन अब इसी संदेश के साथ सड़क पर उतरने जा रहा है। हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति ने 26 अक्टूबर को उल्टा मार्च निकालने का ऐलान किया है। सुबह 11 बजे राघवेंद्र राव सभा भवन के पास स्थित महाधरना स्थल से कलेक्टोरेट तक प्रस्तावित यह मार्च केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि शहर की हवाई कनेक्टिविटी को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों को फिर सामने लाने की कोशिश है।


समिति का तर्क है कि बिलासपुर को बड़े शहरों से जोड़ने, उड़ानों की संख्या बढ़ाने और एयरपोर्ट को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई। इसके उलट, जिन हवाई सेवाओं को आंदोलन की उपलब्धियों के रूप में देखा गया था, उनमें से कई बंद हो गईं या उनकी आवृत्ति कम हो गई। ऐसे में सवाल सिर्फ नई उड़ानें शुरू करने का नहीं, बल्कि पहले से उपलब्ध हवाई संपर्क को बनाए रखने और उसे विस्तार देने का भी है।


सात साल का आंदोलन, लेकिन हवाई कनेक्टिविटी की उलटी चाल?
बिलासपुर में हवाई सुविधाओं की मांग को लेकर शुरू हुआ अभियान शुरुआती दौर में आठ-दस लोगों तक सीमित था। समय के साथ इसमें विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठनों की भागीदारी बढ़ी। समिति के अनुसार, आंदोलन के दबाव और लगातार उठाई गई मांगों के बाद दिल्ली, कोलकाता, जबलपुर, प्रयागराज, इंदौर और भोपाल जैसे शहरों के लिए हवाई सेवाएं शुरू हुईं।
लेकिन आंदोलनकारियों का कहना है कि इन उपलब्धियों को स्थायी विस्तार में नहीं बदला जा सका। समिति ने उड़ानों की वर्तमान स्थिति को लेकर जो आंकड़े सामने रखे हैं, वे उसकी चिंता की बुनियाद हैं।
समिति के दावों के मुताबिक हवाई सेवाओं की स्थिति में बदलाव:
दिल्ली: वर्ष 2021 में सप्ताह के सातों दिन उपलब्ध उड़ान अब सप्ताह में चार दिन रह गई है।


प्रयागराज: सप्ताह में चार दिन संचालित होने वाली उड़ान अब केवल एक दिन उपलब्ध होने का दावा किया गया है।
जबलपुर, भोपाल और इंदौर: समिति के अनुसार, इन शहरों के लिए शुरू की गई सेवाएं बंद हो चुकी हैं।
कोलकाता: इस शहर के लिए सेवा शुरू होने का उल्लेख समिति ने किया है, हालांकि उपलब्ध इनपुट में इसकी मौजूदा आवृत्ति या संचालन की स्थिति का विवरण नहीं है।


ये आंकड़े समिति की ओर से प्रस्तुत दावे हैं। उड़ानों की वर्तमान स्थिति, संबंधित एयरलाइनों के परिचालन निर्णय और सेवाएं बंद या सीमित होने के कारणों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए आधिकारिक उड़ान-सारिणी तथा संबंधित पक्षों का पक्ष आवश्यक है।
फिर भी, समिति की चिंता का केंद्रीय प्रश्न स्पष्ट है—यदि किसी शहर में हवाई संपर्क बढ़ाने के लिए वर्षों तक आंदोलन करना पड़े और शुरू हुई सेवाओं को भी लगातार बनाए रखने की चुनौती सामने आए, तो उस शहर की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी का भविष्य किस दिशा में जा रहा है?
एयरपोर्ट का सवाल: उड़ानें बढ़ेंगी कैसे, बुनियादी ढांचा कब बदलेगा?
हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति का विरोध केवल उड़ानों की संख्या तक सीमित नहीं है। समिति एयरपोर्ट के बुनियादी ढांचे को लेकर भी सवाल उठा रही है। उसके अनुसार, छोटे टर्मिनल, पुराने एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) टावर और रनवे के विस्तार में देरी जैसी समस्याएं बिलासपुर के हवाई विकास की राह में बड़ी चुनौतियां हैं।
समिति की प्रमुख मांग है कि बिलासपुर एयरपोर्ट को 4C श्रेणी के अनुरूप विकसित किया जाए। इसके साथ ही महानगरों के लिए सीधी उड़ानें शुरू करने, रनवे का विस्तार करने और एयरपोर्ट को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने की मांग उठाई जा रही है।
4C श्रेणी का उल्लेख यहां केवल तकनीकी उन्नयन की मांग नहीं, बल्कि एयरपोर्ट की परिचालन क्षमता और भविष्य की जरूरतों से जुड़ा मुद्दा है। हालांकि, किसी एयरपोर्ट का विस्तार किन विमानों के संचालन, रनवे की लंबाई, सुरक्षा मानकों और अन्य तकनीकी आवश्यकताओं के आधार पर होगा, यह संबंधित विमानन प्राधिकरणों के परीक्षण और स्वीकृतियों पर निर्भर करता है।
यही वजह है कि आंदोलन अब एक बड़े सवाल की ओर बढ़ रहा है—बिलासपुर के एयरपोर्ट के लिए दीर्घकालिक विकास योजना क्या है, उसकी समय-सीमा क्या है और उस पर अब तक कितना काम हुआ है?
एक ही दल की केंद्र और राज्य सरकारें, फिर भी उम्मीदों पर सवाल
समिति के सदस्यों का कहना है कि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने से उन्हें उम्मीद थी कि बिलासपुर के एयरपोर्ट के विकास और हवाई सेवाओं के विस्तार को गति मिलेगी। लेकिन उनके अनुसार, अब तक अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए हैं।
समिति ने स्थानीय सांसद और राज्य सरकार से इस मामले में ठोस पहल करने की मांग की है। उसका कहना है कि बिलासपुर की हवाई कनेक्टिविटी को लेकर केवल घोषणाओं या आश्वासनों से काम नहीं चलेगा। जरूरत ऐसी कार्ययोजना की है, जिसमें एयरपोर्ट के विकास, उड़ानों की उपलब्धता और महानगरों से संपर्क बढ़ाने के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित हों।
इस मुद्दे का एक व्यावहारिक पहलू भी है। हवाई सेवाओं की उपलब्धता का असर यात्रियों की सुविधा के साथ-साथ व्यापार, उद्योग, चिकित्सा संबंधी यात्राओं, शिक्षा और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, बिलासपुर में इन प्रभावों की वास्तविक सीमा का आकलन करने के लिए यात्री संख्या, उड़ानों की मांग और आर्थिक गतिविधियों से जुड़े आंकड़ों की जरूरत होगी।
26 अक्टूबर को उल्टा मार्च: विरोध की भाषा में प्रतीकात्मक संदेश
समिति ने 26 अक्टूबर को सुबह 11 बजे उल्टा मार्च निकालने की घोषणा की है। मार्च राघवेंद्र राव सभा भवन के पास स्थित महाधरना स्थल से शुरू होकर कलेक्टोरेट तक जाएगा। इसके बाद कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर एयरपोर्ट से संबंधित लंबित मांगों पर कार्रवाई की मांग की जाएगी।
उल्टा मार्च इस आंदोलन का सबसे विशिष्ट पहलू है। समिति के संदेश का आशय है कि जब हवाई सुविधाओं का विकास आगे बढ़ने के बजाय पीछे जाता दिखाई दे रहा है, तो सरकार और जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों का ध्यान खींचने के लिए विरोध का तरीका भी अलग होना चाहिए।
यह प्रदर्शन प्रतीकात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे उठाए जा रहे प्रश्न ठोस हैं—उड़ानों में कटौती क्यों हुई, बंद सेवाओं को फिर शुरू करने की क्या संभावनाएं हैं, एयरपोर्ट के बुनियादी ढांचे के विकास की समय-सीमा क्या है और महानगरों के लिए सीधी उड़ानों की मांग पर आगे की कार्रवाई कब होगी?
इन सवालों के जवाब केवल एक दिन के प्रदर्शन से नहीं, बल्कि संबंधित विभागों, एयरपोर्ट प्रबंधन, विमानन कंपनियों और जनप्रतिनिधियों के बीच ठोस समन्वय से सामने आ सकते हैं।
400 से अधिक संगठनों के समर्थन का दावा, बड़े आंदोलन की चेतावनी
हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति ने कहा है कि उसके आंदोलन को पहले भी 400 से अधिक सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठनों का समर्थन मिल चुका है। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि मांगों पर सकारात्मक पहल नहीं हुई, तो आगे की रणनीति तय करने के लिए विभिन्न संगठनों के साथ विस्तृत बैठक की जाएगी।
समिति ने जरूरत पड़ने पर बिलासपुर में रेलवे जोन की मांग को लेकर हुए व्यापक आंदोलन की तर्ज पर बड़े जनांदोलन की संभावना भी जताई है। इस चेतावनी से स्पष्ट है कि समिति फिलहाल प्रतीकात्मक विरोध के जरिए अपनी मांगों को फिर प्रमुखता से उठाना चाहती है, लेकिन वह आंदोलन को और व्यापक बनाने का विकल्प भी खुला रख रही है।
हालांकि, प्रस्तावित बड़े आंदोलन का स्वरूप, उसकी समय-सीमा और उसमें शामिल होने वाले संगठनों की वास्तविक भागीदारी अभी भविष्य की रणनीति पर निर्भर करेगी।
अब सरकार और जनप्रतिनिधियों के सामने क्या हैं सवाल?
बिलासपुर की हवाई सुविधाओं पर बहस को केवल आंदोलन बनाम प्रशासन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इस मामले में कुछ ऐसे प्रश्न हैं, जिनका जवाब शहर को स्पष्ट रूप से मिलना चाहिए।
पहला—उड़ानों की निरंतरता: दिल्ली और प्रयागराज की उड़ानों की आवृत्ति घटने तथा अन्य सेवाएं बंद होने के कारण क्या हैं? क्या इन सेवाओं को बहाल करने की कोई योजना है?
दूसरा—एयरपोर्ट का बुनियादी ढांचा: टर्मिनल, ATC टावर और रनवे विस्तार को लेकर वर्तमान स्थिति क्या है? क्या इनके विकास के लिए कोई स्वीकृत योजना और निर्धारित समय-सीमा है?
तीसरा—4C श्रेणी का विकास: इस मांग पर तकनीकी आकलन, प्रशासनिक प्रक्रिया और संबंधित विमानन प्राधिकरणों की भूमिका क्या होगी?
चौथा—सीधी उड़ानों की मांग: दिल्ली सहित प्रमुख महानगरों और अन्य महत्वपूर्ण शहरों के लिए अधिक नियमित हवाई संपर्क सुनिश्चित करने की संभावनाएं क्या हैं?
पांचवां—जवाबदेही: स्थानीय जनप्रतिनिधियों, राज्य सरकार, केंद्र सरकार और संबंधित विमानन एजेंसियों के स्तर पर कौन-सी पहल लंबित है और उसकी प्रगति की जानकारी सार्वजनिक रूप से कैसे उपलब्ध कराई जाएगी?
इन प्रश्नों का जवाब आंदोलन की दिशा के साथ-साथ बिलासपुर की हवाई कनेक्टिविटी के भविष्य को भी प्रभावित करेगा।
असली परीक्षा मार्च के बाद
26 अक्टूबर का उल्टा मार्च बिलासपुर के हवाई सुविधा आंदोलन में एक नया प्रतीक जोड़ने जा रहा है। सात वर्षों से जारी संघर्ष, उड़ानों में कटौती को लेकर उठ रही चिंता और एयरपोर्ट के आधुनिकीकरण की मांग ने इस मुद्दे को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
समिति ने राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों से मार्च में शामिल होने की अपील की है। अब ध्यान इस बात पर रहेगा कि ज्ञापन के बाद प्रशासन की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है, संबंधित जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर क्या पहल करते हैं और एयरपोर्ट के विकास तथा हवाई सेवाओं के विस्तार को लेकर कोई ठोस समयबद्ध योजना सामने आती है या नहीं।

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