

एक शहर में 72 घंटे के भीतर तीन अस्पताल, तीन बड़े विवाद… स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सबसे बड़े सवाल, मरीज और परिजन क्यों खो रहे भरोसा?
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवालों के केंद्र में है। महज कुछ दिनों के भीतर निजी अस्पतालों से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों ने पूरे जिले में बहस छेड़ दी है। कहीं गरीब आदिवासी महिला की मौत के बाद शव रोकने के आरोप लगे हैं, कहीं 18 घंटे के इलाज के बाद लाखों रुपये का बिल थमाने का विवाद सामने आया है, तो कहीं सिजेरियन ऑपरेशन के बाद महिला के पेट में सर्जिकल धागा छूटने की शिकायत ने चिकित्सा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन घटनाओं के बाद मरीजों और उनके परिजनों के बीच निजी अस्पतालों को लेकर भरोसे का संकट गहराता दिखाई दे रहा है।
पहला मामला: मौत के बाद भी नहीं मिला शव… पैसे जमा करो, तब अंतिम विदाई!
सबसे ज्यादा सुर्खियों में हरिओम हॉस्पिटल का मामला है। ग्राम नेउर, जिला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर निवासी आदिवासी (गोंड) महिला स्वर्गीय तिलबसिया पेड़ काटने के दौरान घायल होने के बाद 25 जुलाई को हरिओम हॉस्पिटल में भर्ती हुई थीं। उपचार के दौरान 28 जुलाई को उनकी मृत्यु हो गई।
मृतका के परिजनों और कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल का आरोप है कि इलाज के दौरान ₹21,780 जमा किए जाने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने ₹84,700 की अतिरिक्त राशि की मांग की और पूरी रकम जमा नहीं होने तक शव सौंपने से इनकार कर दिया। आरोप है कि गरीब पति जगन्नाथ गांव जाकर पैसे की व्यवस्था करते रहे, जबकि अस्पताल में शव लगभग दो दिनों तक रोका गया।
प्रतिनिधिमंडल ने यह भी आरोप लगाया कि जिस अस्पताल में मर्चूरी तक नहीं है, वहां शव को दो दिनों तक रखा गया और जिला अस्पताल अथवा सिम्स मेडिकल कॉलेज नहीं भेजा गया। साथ ही यह भी दावा किया गया कि मृतका आयुष्मान योजना की पात्र हितग्राही थीं, इसके बावजूद धन की मांग की गई।
कांग्रेस सड़क से प्रशासन तक… एफआईआर और मजिस्ट्रियल जांच की मांग
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय केशरवानी के नेतृत्व में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर हरिओम हॉस्पिटल प्रबंधन एवं डॉ. अभिषेक कश्यप के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने, मजिस्ट्रियल जांच कराने और कठोर कार्रवाई की मांग की।
कांग्रेस का कहना है कि गरीब आदिवासी परिवार के साथ हुआ कथित व्यवहार मानवता और स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। प्रतिनिधिमंडल ने पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता देने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी उठाई।
दूसरा मामला: 18 घंटे इलाज… फिर 4.60 लाख का बिल
इसी बीच शहर के एलाइट हॉस्पिटल का मामला भी चर्चा में है। नगर निगम के कंप्यूटर ऑपरेटर संजय मिश्रा को सीने में दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों के अनुसार भर्ती के करीब 18 घंटे बाद उनकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को ₹4.60 लाख का बिल थमा दिया। परिजनों का आरोप है कि जब इलाज का पूरा ब्योरा और आइटमाइज्ड बिल मांगा गया तो स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। विरोध बढ़ने के बाद बिल घटाकर ₹2.25 लाख कर दिया गया।
परिजनों ने सवाल उठाया कि यदि वास्तविक राशि ₹2.25 लाख थी तो पहले ₹4.60 लाख का बिल किस आधार पर बनाया गया।
अस्पताल का पक्ष भी सामने आया
एलाइट हॉस्पिटल के संचालक डॉ. राजीव लोचन भांजा का कहना है कि मरीज अत्यंत गंभीर अवस्था में अस्पताल लाया गया था। अस्पताल ने पहले ही परिजनों को उसकी स्थिति से अवगत करा दिया था। परिजनों के आग्रह पर उपचार शुरू किया गया और मानवीय आधार पर पूरी राशि नहीं लेकर केवल आधी राशि ली गई।
तीसरा मामला: ऑपरेशन के बाद पेट में छूटा धागा
तोरवा स्थित पेंडलवार नर्सिंग होम भी गंभीर आरोपों के घेरे में है। ग्राम बिजौर निवासी शक्ति लाल सूर्यवंशी ने शिकायत की है कि उनकी पत्नी रेखा सूर्यवंशी की 12 जून को सिजेरियन डिलीवरी हुई थी। डिस्चार्ज के बाद लगातार पेट दर्द और उल्टी की शिकायत बनी रही।
परिजनों का आरोप है कि दोबारा अस्पताल जाने पर बिना समुचित जांच के वापस भेज दिया गया। बाद में दूसरे अस्पताल में जांच के दौरान पेट में सर्जिकल धागा होने की बात सामने आई, जिसे दोबारा ऑपरेशन कर निकाला गया।
सीएमएचओ ने लिया संज्ञान
शिकायत मिलने के बाद सीएमएचओ डॉ. शुभा गरेवाल ने पेंडलवार नर्सिंग होम को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि जांच में इलाज में लापरवाही प्रमाणित होती है तो नर्सिंग होम एक्ट के तहत नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
72 घंटे… तीन अस्पताल… तीन विवाद
हरिओम हॉस्पिटल में शव रोकने और अतिरिक्त राशि मांगने के आरोप।
एलाइट हॉस्पिटल में इलाज और बिलिंग को लेकर विवाद।
पेंडलवार नर्सिंग होम में ऑपरेशन के बाद सर्जिकल धागा छूटने की शिकायत।
तीनों मामलों ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली, इलाज की पारदर्शिता, बिलिंग व्यवस्था, मरीजों के अधिकार, जवाबदेही और प्रशासनिक निगरानी को लेकर व्यापक चर्चा छेड़ दी है। शहर में इन घटनाओं को लेकर लगातार राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर हलचल बनी हुई है।



