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‘सर्पदंश’ के नाम पर ₹17.24 करोड़ का महाघोटाला… रिकवरी शून्य, तहसील से बैंक तक फैला सिंडिकेट, ड्राइवर बना कथित मास्टर ऑपरेटर

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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अब आधा दर्जन तहसीलदार और दर्जनभर कर्मचारी जांच के घेरे में
431 संदिग्ध मुआवजा प्रकरण, 17 गिरफ्तारियां, फिर भी रिकवरी शून्य; फर्जी पोस्टमार्टम, जाली पंचनामा, फोटोकॉपी दुकान में तैयार होते थे दस्तावेज, पुलिस जोड़ रही पूरे नेटवर्क की कड़ियां
मोहम्मद इसराइल | बिलासपुर
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर से सामने आया कथित फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाला अब केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की कई परतों को झकझोर देने वाला संगठित आर्थिक अपराध बनता जा रहा है। शुरुआती जांच अब ऐसे बिंदु पर पहुंच गई है, जहां पुलिस की नजर सिर्फ गिरफ्तार आरोपियों तक सीमित नहीं है, बल्कि बिलासपुर तहसील में वर्षों तक पदस्थ रहे आधा दर्जन से अधिक तहसीलदारों और एक दर्जन से ज्यादा कर्मचारियों की भूमिका भी संदेह के दायरे में बताई जा रही है।

पुलिस जांच में अब तक जो तस्वीर सामने आई है, उसके अनुसार तहसील कार्यालय में पदस्थ एक ड्राइवर कथित रूप से पूरे नेटवर्क का प्रमुख ऑपरेटर था। आरोप है कि वह दस्तावेजों की फाइलें तैयार कराने से लेकर विभिन्न स्तरों पर उन्हें आगे बढ़ाने तक की पूरी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाता था। पुलिस इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि क्या यह सब केवल निचले स्तर पर संभव था या फिर पूरे सिस्टम में मिलीभगत के बिना इतने बड़े पैमाने पर फर्जी मुआवजा स्वीकृत नहीं हो सकता था।
431 प्रकरण, ₹17.24 करोड़ और रिकवरी अब तक शून्य
जांच के केंद्र में 431 संदिग्ध सर्पदंश मुआवजा प्रकरण हैं, जिनमें ₹17.24 करोड़ से अधिक की सरकारी राशि जारी होने की बात सामने आई है। अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी, राजस्व कर्मचारी, कथित वकील, बैंक खाताधारक और अन्य लोगों सहित 17 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये के इस कथित घोटाले में अब तक रिकवरी शून्य क्यों है?
पुलिस अब बैंक खातों, संपत्तियों, डिजिटल लेन-देन और धन के अंतिम लाभार्थियों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।
जेल से रिमांड पर लाकर पूछताछ, हेड राइटिंग के नमूने लिए
सरकण्डा थाना पुलिस ने 29 जुलाई को केंद्रीय जेल में बंद कथित मास्टरमाइंड हीराप्रसाद खांडेकर, महेन्द्र कुमार और गोविंद विश्वकर्मा को न्यायालय से अनुमति लेकर एक दिन की पुलिस रिमांड पर लिया। पूछताछ के दौरान पुलिस ने दस्तावेजी साक्ष्य जुटाए और आरोपियों की हैंडराइटिंग के नमूने भी लिए, जिन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा जाना है।
पूछताछ के बाद तीनों आरोपियों को दोबारा न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया।
फोटोकॉपी दुकान बनी थी कथित फर्जीवाड़े की फैक्ट्री
जांच में सामने आया कि सरकण्डा के अशोकनगर स्थित एक फोटोकॉपी सेंटर में कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे।
पुलिस के अनुसार, दुकान संचालक आकाश साहू की भूमिका भी सामने आई है। आरोप है कि यहीं पर फर्जी आवेदन, शपथपत्र, पहचान संबंधी दस्तावेज और अन्य रिकॉर्ड तैयार किए जाते थे, जिनके आधार पर आगे मुआवजा प्रकरण खड़े किए जाते थे।
कोनी थाना क्षेत्र के मामलों में भी पुलिस ने उसे रिमांड पर लेकर पूछताछ की और बाद में फिर जेल भेज दिया।
तहसील कार्यालय का ड्राइवर कैसे बना कथित नेटवर्क का ऑपरेटर?
जांच में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि पुलिस के अनुसार तहसील कार्यालय में पदस्थ एक दैनिक वेतनभोगी ड्राइवर कथित रूप से पूरे नेटवर्क का संचालन करता था।
आरोप है कि दस्तावेज तैयार होने के बाद राजस्व कार्यालय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने, फाइलों की आवाजाही और विभिन्न स्तरों पर समन्वय कराने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि वह किन अधिकारियों और कर्मचारियों के संपर्क में था और किस स्तर तक उसकी पहुंच थी।
सामान्य मौत को बनाया जाता था सर्पदंश
जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह कथित रूप से सामान्य मौतों को सर्पदंश से हुई मृत्यु में बदलने का खेल खेलता था।
जैसे ही अस्पताल या अन्य माध्यमों से किसी व्यक्ति की मौत की सूचना मिलती, नेटवर्क सक्रिय हो जाता। मृतक के परिजनों को प्राकृतिक आपदा राहत के तहत मिलने वाले ₹4 लाख मुआवजे का लालच देकर कथित रूप से सर्पदंश का मामला दर्ज कराने के लिए तैयार किया जाता।
इसके बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट, मर्ग इंटीमेशन, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेजों में कथित हेरफेर कर मुआवजा प्रकरण तैयार किया जाता।
महिला हितग्राही भी गिरफ्तार
जांच के दौरान पुलिस ने एक महिला हितग्राही शिवकुमारी साहू को भी गिरफ्तार किया है।
पुलिस के अनुसार, उसके पति शंकर साहू की मृत्यु वर्ष 2001 में बीमारी के कारण हुई थी, लेकिन वर्ष 2003 में कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार कर उसे सर्पदंश से हुई मौत दर्शाया गया और मुआवजा स्वीकृत करा लिया गया।
इस मामले की जांच भी अब पूरे नेटवर्क से जोड़कर की जा रही है।
10 से अधिक बैंकों में खुले खाते, आईडीबीआई बैंक सबसे ज्यादा जांच के घेरे में
पुलिस की जांच में यह भी सामने आया है कि कथित नेटवर्क ने 10 से अधिक बैंकों में खाते खुलवाए
सबसे अधिक खाते आईडीबीआई बैंक में खोले गए, जहां करीब 40 खातों में मुआवजे की राशि जमा होने की जानकारी सामने आई है। जांच एजेंसियां पिछले पांच वर्षों के बैंक स्टेटमेंट, केवाईसी दस्तावेज और लेन-देन का विश्लेषण कर रही हैं।
पुलिस यह भी जांच रही है कि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के लाभार्थियों के खाते एक ही बैंक या शाखाओं में बड़ी संख्या में क्यों खोले गए।
सिम्स से तहसील तक फैला नेटवर्क?
विवेचना के दौरान पुलिस की नजर सिम्स अस्पताल, पुलिस विभाग, राजस्व अमले और बैंकिंग नेटवर्क के बीच कथित कड़ी पर भी है।
आरोप है कि अस्पताल में मृत्यु की सूचना मिलते ही नेटवर्क सक्रिय हो जाता था। इसके बाद दस्तावेज तैयार कर राजस्व प्रक्रिया के माध्यम से मुआवजा स्वीकृत कराने की पूरी श्रृंखला संचालित होती थी।
जांच एजेंसियां मोबाइल कॉल डिटेल, डिजिटल रिकॉर्ड, बैंक ट्रांजैक्शन और दस्तावेजी साक्ष्यों का मिलान कर रही हैं।
आधा दर्जन तहसीलदार और दर्जनभर कर्मचारी जांच के दायरे में
सूत्रों के अनुसार, जिन वर्षों में कथित फर्जी मुआवजा प्रकरण स्वीकृत हुए, उस दौरान बिलासपुर तहसील में पदस्थ रहे करीब आधा दर्जन तहसीलदारों और एक दर्जन से अधिक कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि फाइलों का परीक्षण किस स्तर पर हुआ, दस्तावेजों का सत्यापन कैसे हुआ और मुआवजा स्वीकृति की प्रक्रिया में किस स्तर पर क्या भूमिका रही।
हालांकि, अब तक किसी भी तहसीलदार के खिलाफ आरोप तय नहीं किए गए हैं और न ही उनकी गिरफ्तारी हुई है। उनकी भूमिका की जांच जारी है।
सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी
इस बहुचर्चित प्रकरण में अब तक कई गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, कथित नेटवर्क की कई परतें खुल चुकी हैं और जांच लगातार आगे बढ़ रही है। इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—₹17.24 करोड़ से अधिक की सरकारी राशि आखिर किन-किन लोगों तक पहुंची, उसका वास्तविक लाभ किसे मिला और करोड़ों रुपये की अब तक रिकवरी क्यों नहीं हो सकी?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए पुलिस बैंक खातों, सरकारी रिकॉर्ड, डिजिटल साक्ष्यों और प्रशासनिक फाइलों की गहन पड़ताल कर रही है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, इस बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा प्रकरण की नई परतें लगातार सामने आ रही हैं।

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