
राजस्व लिपिक संघ का बड़ा हमला—’बिना निष्पक्ष जांच गिरफ्तारी क्यों?’, पुलिस-प्रशासन पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप
वीडियो में देखिए कर्मचारियों का आक्रोश
बिलासपुर। बिलासपुर में कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच अब प्रशासन और राजस्व अमले के बीच टकराव का कारण बनती जा रही है। तीन राजस्व लिपिकों की गिरफ्तारी के बाद छत्तीसगढ़ प्रदेश राजस्व लिपिक संघ खुलकर पुलिस कार्रवाई के विरोध में उतर आया है। संघ ने संभागायुक्त, आईजी और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपते हुए आरोप लगाया है कि पुलिस ने बिना निष्पक्ष जांच और बिना पर्याप्त आधार के केवल लिपिकों को निशाना बनाया है, जबकि पूरे प्रकरण में निर्णय लेने वाले अधिकारियों की भूमिका की अनदेखी की जा रही है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि एकतरफा कार्रवाई नहीं रोकी गई तो 27 जुलाई से चरणबद्ध आंदोलन शुरू होगा और जरूरत पड़ने पर पूरे प्रदेश में राजस्व कामकाज ठप किया जाएगा।
ज्ञापन में संघ ने सरकंडा थाना में दर्ज अपराध क्रमांक 936/2026, 937/2026, 938/2026 और 940/2026 का उल्लेख करते हुए कहा है कि धोखाधड़ी, जालसाजी और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत तीन लिपिकों को बिना पूर्व सूचना गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इसके बाद आठ अन्य राजस्व लिपिकों को नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया गया। संघ का कहना है कि सभी कर्मचारी 23 जुलाई को स्वयं थाने पहुंचे, बयान दर्ज कराए और जांच में पूरा सहयोग दिया। इसके बावजूद गिरफ्तारी की कार्रवाई जारी रखना कर्मचारियों में भय का वातावरण पैदा करने वाला कदम है।
‘रीडर सिर्फ दस्तावेज पेश करता है, फैसला अधिकारी लेते हैं’
राजस्व लिपिक संघ ने अपने ज्ञापन में सबसे बड़ा कानूनी तर्क यह दिया है कि तहसील कार्यालय में रीडर या वाचक की भूमिका केवल आवेदन और दस्तावेजों को पीठासीन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने तक सीमित होती है। आवेदन स्वीकार करना, प्रकरण दर्ज करना और अंतिम आदेश पारित करना तहसीलदार अथवा सक्षम न्यायिक अधिकारी का अधिकार है। ऐसे में केवल दस्तावेज प्रस्तुत करने वाले लिपिकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करना विधिक सिद्धांतों के विपरीत है।
संघ ने यह भी कहा कि संबंधित प्रकरणों में आदेश तीन अलग-अलग पीठासीन अधिकारियों की अदालतों से सुनवाई के बाद पारित हुए हैं। यदि किसी आवेदन में जाली हस्ताक्षर, फर्जी सील, झूठे शपथपत्र या कूटरचित दस्तावेज लगाए गए हैं तो उनकी जांच और जिम्मेदारी वास्तविक आरोपियों तक पहुंचनी चाहिए, न कि केवल कार्यालयीन प्रक्रिया निभाने वाले कर्मचारियों तक सीमित रहनी चाहिए।
‘कोर्ट को गुमराह करने वालों पर भी हो कार्रवाई’
ज्ञापन में संघ ने यह भी मांग उठाई है कि जांच के दौरान यदि न्यायालय के समक्ष मिथ्या तथ्य या कूटरचित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं तो भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 227 से 231 सहित अन्य उपयुक्त धाराओं के तहत वास्तविक दोषियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाए। संघ का कहना है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच किए बिना केवल लिपिकों को आरोपी बनाना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
प्राकृतिक आपदा राहत की प्रक्रिया भी बताई
संघ ने ज्ञापन में राज्य शासन के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के परिपत्रों का हवाला देते हुए बताया कि प्राकृतिक आपदा से मृत्यु के मामलों में चार लाख रुपये की सहायता राशि स्वीकृत करने की एक निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया होती है। इसमें आवेदन, पंजीयन, न्यायालयीन परीक्षण और आदेश की अलग-अलग जिम्मेदारियां तय हैं। लिपिक केवल कार्यालयीन अभिलेखों का संधारण और दस्तावेजों की प्रस्तुति का कार्य करते हैं। अंतिम निर्णय संबंधित अधिकारी द्वारा लिया जाता है।
तीन दिन सामूहिक अवकाश, फिर उग्र आंदोलन की चेतावनी
राजस्व लिपिक संघ ने प्रशासन को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है कि यदि कर्मचारियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई पर तत्काल रोक नहीं लगी और उचित आश्वासन नहीं मिला तो 27 जुलाई से 29 जुलाई तक प्रदेशभर के राजस्व लिपिक सामूहिक अवकाश पर रहेंगे। इसके बाद चरणबद्ध आंदोलन, कार्य बहिष्कार और आवश्यकता पड़ने पर प्रदेशव्यापी उग्र आंदोलन किया जाएगा।
संघ ने मुख्यमंत्री, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन मंत्री, गृह मंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव (राजस्व), प्रमुख सचिव (गृह), प्रमुख सचिव (सामान्य प्रशासन) और पुलिस महानिदेशक को भी ज्ञापन की प्रतिलिपि भेजकर पूरे मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।



