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“मेरी बेटियां ही मेरा सब कुछ हैं…” पिता की अंतिम इच्छा के लिए बेटी ने बदली परंपरा, प्रयागराज में किया पिंडदान

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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बिलासपुर की नौवीं की छात्रा आस्था कौशिक ने निभाया पिता का अंतिम संकल्प, सामाजिक विरोध और धार्मिक आपत्तियों के बीच विधि-विधान से किया पिंडदान, श्रेष्ठी कुर्मी समाज में पहली पहल होने का दावा
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से सामने आई एक संवेदनशील और चर्चित घटना ने बेटियों की भूमिका और सामाजिक परंपराओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है। तखतपुर विकासखंड के ग्राम नगोई की रहने वाली कक्षा नौवीं की छात्रा आस्था कौशिक ने अपने दिवंगत पिता की अंतिम इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए प्रयागराज में विधि-विधान से उनका पिंडदान किया। परिवार के अनुसार श्रेष्ठी कुर्मी समाज में यह पहली ऐसी पहल है, जिसमें किसी बेटी ने अपने पिता का पिंडदान किया हो। इस दौरान उन्हें सामाजिक आलोचना, धार्मिक आपत्तियों और परंपरागत मान्यताओं का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने पिता के प्रति अपने दायित्व को निभाने का निर्णय नहीं बदला।


20 जुलाई को पिता का निधन, बेटी ने संभाली अंतिम संस्कार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी
तखतपुर विकासखंड के ग्राम नगोई निवासी कृषक देवनारायण (गौतम) कौशिक का 20 जुलाई को निधन हो गया। परिवार में उनकी पत्नी सुनीता कौशिक, जो पेशे से शिक्षिका हैं, एक पुत्र और दो पुत्रियां हैं। बड़ी बेटी उच्च शिक्षा के लिए अंबिकापुर में अध्ययनरत है, जबकि पुत्र अर्थव अभी छोटा है। ऐसे में अंतिम संस्कार के बाद पिंडदान की जिम्मेदारी परिवार की दूसरी संतान और सरस्वती शिशु मंदिर, तखतपुर की कक्षा नौवीं की छात्रा आस्था कौशिक ने अपने ऊपर ली।
आस्था बताती हैं कि उनके पिता अक्सर परिवार और रिश्तेदारों के बीच एक ही बात दोहराते थे—“मेरी बेटियां ही मेरा सब कुछ हैं, मेरा पिंडदान भी मेरी बेटी ही करेगी।” पिता के जीवनकाल में कही गई यही बात उनके निधन के बाद बेटी के लिए संकल्प बन गई।
प्रयागराज में परंपरा और संकल्प का सामना
पिता की अस्थियों के साथ परिवार प्रयागराज पहुंचा, जहां विधि-विधान से पिंडदान की तैयारी की गई। आस्था के अनुसार, जब उन्होंने स्वयं पिंडदान करने की इच्छा जताई तो कुछ पुरोहितों ने इस पर आपत्ति व्यक्त की। वहीं समाज के कुछ लोगों और रिश्तेदारों ने भी उनके निर्णय की आलोचना की।
इसके बावजूद परिवार के सहयोग से धार्मिक विधि-विधान पूरे किए गए और आस्था ने स्वयं अपने पिता का पिंडदान किया।
परिवार का साथ बना सबसे बड़ी ताकत
आस्था के अनुसार इस पूरे निर्णय में उन्हें परिवार का पूरा सहयोग मिला। उनके फूफा, बुआ, मामा, चाचा तथा विशेष रूप से उनके फौजी चाचा मनोज कौशिक लगातार उनके साथ खड़े रहे।
आस्था ने बताया कि उनके दिवंगत दादा तुलसी राम कौशिक ने मनोज कौशिक का पालन-पोषण किया था और उन्हें सेना तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। परिवार की यही प्रेरणादायक परंपरा उनके लिए कठिन परिस्थितियों में साहस का आधार बनी।
“पिता ने कभी बेटा-बेटी में फर्क नहीं किया”
आस्था कहती हैं कि उनके पिता ने जीवनभर बेटा और बेटी के बीच कभी कोई भेदभाव नहीं किया। वे हमेशा अपनी बेटियों पर गर्व करते थे और खुले तौर पर कहते थे कि उनकी बेटियां ही उनका सबसे बड़ा सहारा हैं।
इसी विश्वास को सम्मान देने के लिए उन्होंने पिंडदान को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पिता के विश्वास, संस्कार और अंतिम इच्छा का सम्मान माना।
‘बेटियां भी निभा सकती हैं अंतिम धर्म’
आस्था कौशिक का कहना है कि आज बेटियां परिवार की हर जिम्मेदारी निभा रही हैं। यदि वे माता-पिता की सेवा, शिक्षा, रोजगार और परिवार की जिम्मेदारियां संभाल सकती हैं तो अंतिम संस्कार और पिंडदान जैसे धार्मिक दायित्व भी निभा सकती हैं।
उन्होंने कहा कि समय के साथ सामाजिक सोच और परंपराओं में सकारात्मक परिवर्तन होना स्वाभाविक है तथा बेटियों को भी धार्मिक दायित्व निभाने के अवसर मिलने चाहिए।
प्रयागराज की व्यवस्थाओं पर भी रखा अपना पक्ष
प्रयागराज यात्रा के अनुभव साझा करते हुए आस्था ने कहा कि अस्थि पूजन और पिंडदान से जुड़े कार्यों के दौरान कई तरह की अव्यवस्थाएं देखने को मिलीं। उनका कहना है कि यदि गांवों और स्थानीय स्तर पर पुरोहित विधि-विधान के साथ इन धार्मिक प्रक्रियाओं का संचालन करें तो श्रद्धालुओं को लंबी यात्रा और अन्य कठिनाइयों से राहत मिल सकती है।
श्रेष्ठी कुर्मी समाज में पहली पहल होने का दावा
आस्था कौशिक का कहना है कि उनकी जानकारी में श्रेष्ठी कुर्मी समाज में अब तक किसी बेटी द्वारा पिता का पिंडदान किए जाने का उदाहरण सामने नहीं आया है। इसी कारण उनके निर्णय का कई लोगों ने विरोध भी किया।
हालांकि उन्होंने अपने फैसले को पिता की अंतिम इच्छा का सम्मान बताते हुए पूरा किया। इस घटना के बाद तखतपुर सहित बिलासपुर जिले में यह विषय व्यापक चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
पिता की कही एक बात, जिसे बेटी ने जीवन का संकल्प बना लिया
“मेरी बेटियां ही मेरा सब कुछ हैं, मेरा पिंडदान भी मेरी बेटी ही करेगी…”
परिवार के अनुसार, देवनारायण कौशिक की यही इच्छा उनके निधन के बाद बेटी आस्था के लिए सबसे बड़ा दायित्व बन गई। प्रयागराज में किए गए इस पिंडदान को परिवार पिता के प्रति श्रद्धा, विश्वास और उनकी अंतिम इच्छा के सम्मान के रूप में देख रहा है।

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