कुपोषण, मलेरिया और सरकारी दावों का सच—औरापानी के जंगल से निकली ऐसी तस्वीर जिसने विकास के तमाम नारों पर खड़े कर दिए सवाल

बिलासपुर |
बरसात शुरू होते ही सरकारी फाइलों में दर्ज “मलेरिया नियंत्रण” के दावे एक बार फिर जंगल के भीतर जाकर दम तोड़ते नजर आए। कोटा विधानसभा क्षेत्र के औरापानी के जंगल में रहने वाले एक ही परिवार के तीन बच्चों के मलेरिया से संक्रमित होने की खबर ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जिस इलाके को पहले से संवेदनशील माना जाता है, जहां हर साल मलेरिया का खतरा मंडराता है, वहीं बीमारी ने फिर दस्तक दे दी और उसके बाद शुरू हुआ अफसरों का दौरा, निरीक्षण और समीक्षा का सिलसिला।

सरकारी दावों के बीच हकीकत यह रही कि औरापानी गांव से करीब दो किलोमीटर अंदर जंगल में रहने वाले रामलाल यादव के परिवार के तीन बच्चे—राकेश, लोकेश और हेमलता (उम्र 10 से 14 वर्ष)—मलेरिया से संक्रमित पाए गए। जांच में संक्रमण की पुष्टि होने के बाद तीनों को इलाज के लिए सिम्स बिलासपुर रेफर करना पड़ा। सवाल यही है कि जब कोटा क्षेत्र के 72 गांव पहले से मलेरिया प्रभावित घोषित हैं तो बीमारी आखिर एक ही परिवार के तीन बच्चों तक कैसे पहुंच गई?


घटना सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीम गांव पहुंची। डॉ. वीके वैष्णव और जिला मलेरिया अधिकारी कृष्णा कुमारी ने परिवार के अन्य सदस्यों की जांच की। राहत की बात यह रही कि उनमें संक्रमण नहीं मिला। इसके बाद गांव में स्वास्थ्य शिविर लगाया गया, जहां करीब 150 ग्रामीणों की जांच की गई। सर्दी, खांसी और बुखार से पीड़ित लोगों को दवाइयां बांटी गईं और संदिग्ध मरीजों के रक्त नमूने जांच के लिए भेजे गए। बेलगहना, आमाडोप और आसपास के उप स्वास्थ्य केंद्रों को भी अलर्ट कर दिया गया।
मामले के तूल पकड़ने के बाद जिला प्रशासन भी सक्रिय दिखाई दिया। कलेक्टर संजय अग्रवाल स्वयं विकासखंड कोटा के मलेरिया प्रभावित गांव औरापानी, नवाडीह, मझगांव और उप स्वास्थ्य केंद्र मझगांव पहुंचे। अधिकारियों ने उन्हें बताया कि औरापानी में प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम (पीएफ) मलेरिया के तीन और नवाडीह में एक बच्चा संक्रमित मिला है। सभी बच्चों को प्राथमिक उपचार के बाद सिम्स रेफर किया गया।
निरीक्षण के दौरान कलेक्टर ने स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों को समन्वय के साथ काम करने, मलेरिया नियंत्रण, कुपोषण उन्मूलन और स्वास्थ्य निगरानी को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए। उप स्वास्थ्य केंद्र मझगांव में भर्ती बच्चों की स्थिति देखी गई और प्रभावित क्षेत्रों में सघन सर्वे, समय पर जांच और गुणवत्तापूर्ण उपचार सुनिश्चित करने की बात कही गई।
इसके बाद कलेक्टर ने मझगांव और औरापानी के स्कूलों तथा आंगनबाड़ी केंद्रों का भी निरीक्षण किया। शिक्षकों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से कहा गया कि जो बच्चे नियमित रूप से स्कूल या आंगनबाड़ी नहीं आ रहे हैं, उनके घर जाकर कारण पता करें और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य विभाग को सूचना दें। गर्भवती महिलाओं और बच्चों को स्थानीय पोषणयुक्त “तिरंगा भोजन” अपनाने के लिए भी प्रेरित करने की बात कही गई।
आंगनबाड़ी केंद्र मझगांव में निरीक्षण के दौरान अति कुपोषित बच्चों की भी समीक्षा की गई। कलेक्टर एक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे के घर पहुंचे, परिजनों से चर्चा की और बच्चे को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) रतनपुर ले जाने के लिए समझाया। परिजनों ने अगले दिन बच्चे को एनआरसी ले जाने की सहमति दी। परिवार को संतुलित आहार और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के बारे में जानकारी भी दी गई।
निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को यह भी कहा गया कि किसी भी गांव में मौसमी बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत स्वास्थ्य विभाग को सूचना देकर आवश्यक कार्रवाई की जाए। पूरे दौरे में एसडीएम कोटा प्रवेश पैकरा, सीएमएचओ डॉ. शुभा गरेवाल, जिला मलेरिया अधिकारी, मलेरिया कंसल्टेंट, खंड चिकित्सा अधिकारी, बीपीएम कोटा, सुपरवाइजर, सीएचओ, आरएचओ, मितानिन, ग्राम सरपंच और विभिन्न विभागों के अधिकारी मौजूद रहे।
स्वास्थ्य विभाग के जिला सर्विलेंस अधिकारी डॉ. प्रमोद तिवारी के अनुसार संक्रमित तीनों बच्चों को सिम्स में भर्ती कराया गया है और औरापानी सहित आसपास के क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर लगाकर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
लेकिन जंगल से निकली यह तस्वीर सिर्फ तीन बच्चों के संक्रमित होने की कहानी नहीं कहती। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है जो हर बरसात से पहले तैयारियों के दावे करती है, संवेदनशील गांवों की सूची बनाती है, अभियान चलाने की बातें करती है, लेकिन बीमारी सामने आने के बाद ही पूरा अमला गांवों की ओर दौड़ता दिखाई देता है। औरापानी, नवाडीह और मझगांव का यह घटनाक्रम बताता है कि कागजों पर दर्ज सतर्कता और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी अब भी उतनी ही लंबी है, जितनी औरापानी के जंगल तक पहुंचने वाली पगडंडी।



