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431 मौतें, ₹17.24 करोड़ और शक के घेरे में पूरी सरकारी चेन, सर्पदंश मुआवजा केस में अब ‘बड़ी मछलियों’ को पकड़ने डाला गया जाल

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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NewsDawncg.com…लगातार

मोहम्मद इसराइल | बिलासपुर
431 संदिग्ध मौतें, 17 करोड़ 24 लाख रुपये से अधिक की कथित मुआवजा राशि, कई विभागों तक फैली जांच, लगातार गिरफ्तारियां और अब खुद बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक रामगोपाल गर्ग की सीधी मॉनिटरिंग। छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित सर्पदंश मुआवजा प्रकरण अब केवल आर्थिक अनियमितता की जांच नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात की भी पड़ताल बन चुका है कि क्या सरकारी व्यवस्था की पूरी प्रक्रिया का कथित तौर पर सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल कर करोड़ों रुपये निकाले गए।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब विवेचना की कमान केवल थाना स्तर तक सीमित नहीं है। केस की दिशा, साक्ष्यों की गुणवत्ता और अदालत में अभियोजन की मजबूती सुनिश्चित करने के लिए बिलासपुर रेंज आईजी रामगोपाल गर्ग स्वयं मैदान में उतर चुके हैं।  उन्होंने उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक लेकर विवेचकों को स्पष्ट निर्देश दिए कि जांच में किसी भी स्तर पर ऐसी तकनीकी कमी नहीं रहनी चाहिए, जिसका लाभ आरोपित अदालत में उठा सकें।
आईजी का स्पष्ट संदेश—’मजबूत केस डायरी, पुख्ता साक्ष्य और तकनीकी रूप से अभेद्य चालान’
उच्च स्तरीय बैठक में आईजी ने सभी विवेचकों से अब तक दर्ज मामलों की केस डायरी, दस्तावेजी साक्ष्य, डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय लेन-देन की कड़ियों की बारीकी से समीक्षा कराई। उन्होंने कहा कि चालान तैयार करते समय प्रत्येक कानूनी पहलू का ध्यान रखा जाए, ताकि बचाव पक्ष किसी तकनीकी आधार पर मामले को कमजोर न कर सके।
जांच अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि कथित फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कूटरचित शासकीय सील, बैंक खातों के ट्रांजेक्शन, डिजिटल डिवाइसों की एफएसएल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों को वैज्ञानिक तरीके से जोड़कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। सभी थानों से जुड़े प्रकरणों के रिकॉर्ड भी आईजी कार्यालय स्तर पर खंगाले जा रहे हैं।
जांच का दायरा लगातार बढ़ा, अब सिर्फ कर्मचारी नहीं, पूरी प्रक्रिया जांच के घेरे में
अब तक की जांच में डॉक्टर, पुलिसकर्मी, राजस्व विभाग के कर्मचारी, बैंककर्मी, लिपिक और अन्य लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। पुलिस का मानना है कि कथित नेटवर्क संगठित तरीके से काम करता था और अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां तय थीं।
अब जांच का फोकस केवल गिरफ्तार आरोपितों तक सीमित नहीं है। पुलिस यह भी पता लगाने में जुटी है कि मुआवजा राशि का वितरण किस प्रकार हुआ, किसे कितना कथित कमीशन मिला और नेटवर्क की वास्तविक कमान किसके हाथ में थी।
सिम्स से तहसील तक… कथित नेटवर्क कैसे करता था काम
जांच एजेंसियों के अनुसार पूरा कथित तंत्र बेहद सुनियोजित ढंग से संचालित होता था।
जैसे ही कोई शव पोस्टमार्टम के लिए सिम्स पहुंचता, उसकी सूचना कथित रूप से नेटवर्क से जुड़े लोगों तक पहुंच जाती थी। इसके बाद मृतक के परिजनों को शासन से मिलने वाले चार लाख रुपये के प्राकृतिक आपदा राहत मुआवजे का हवाला देकर कथित तौर पर सर्पदंश का मामला बनाने के लिए तैयार किया जाता था।
इसके बाद कथित रूप से पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बदलाव, मर्ग इंटीमेशन में हेरफेर, पटवारी प्रतिवेदन, राजस्व अभिलेख, तहसील स्तर की जांच, एसडीएम कार्यालय की प्रक्रिया और अंततः मुआवजा स्वीकृति तक पूरी फाइल आगे बढ़ती थी। यही वजह है कि अब जांच केवल फर्जी दस्तावेजों तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की भूमिका पर केंद्रित हो गई है।
सबसे बड़ा सवाल—431 मामलों में हर स्तर पर जांच कैसे हुई?
राजस्व नियमों के अनुसार सर्पदंश से मृत्यु पर मुआवजा स्वीकृत करने की प्रक्रिया कई स्तरों से गुजरती है।
सबसे पहले पुलिस मर्ग दर्ज करती है। पंचनामा और पोस्टमार्टम कराया जाता है। आवश्यक होने पर बिसरा परीक्षण होता है। इसके बाद आवेदन तहसील कार्यालय पहुंचता है। पटवारी जांच प्रतिवेदन देता है। तहसीलदार परीक्षण कर एसडीएम को भेजता है। एसडीएम अनुशंसा करता है और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति के बाद ही मुआवजा राशि जारी होती है।
इसी प्रक्रिया को देखते हुए अब जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि कथित फर्जी मामलों में भी भुगतान हुआ तो प्रत्येक स्तर पर दस्तावेजों का परीक्षण किस प्रकार हुआ और किन परिस्थितियों में फाइलें आगे बढ़ती रहीं।
राजस्व विभाग के बाद अब पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर भी सवाल
अब तक सबसे अधिक सवाल राजस्व विभाग की भूमिका को लेकर उठते रहे हैं, लेकिन जांच आगे बढ़ने के साथ पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की प्रक्रिया भी चर्चा के केंद्र में आ गई है।
मुआवजा प्रकरण का आधार बनने वाली मर्ग रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस और स्वास्थ्य विभाग से ही तैयार होती हैं। ऐसे में यह भी देखा जा रहा है कि संबंधित दस्तावेज किस स्तर पर तैयार हुए, उनका सत्यापन कैसे हुआ और अंतिम रिपोर्ट किन परिस्थितियों में आगे बढ़ी।
डॉ. प्रियंका सोनी से जुड़ी कथित फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट का मामला सामने आने के बाद यह पहलू और संवेदनशील हो गया है।
सिम्स और तहसील कार्यालय के कई संदिग्ध रडार पर
जांच एजेंसियां सिम्स अस्पताल के मॉर्च्युरी से जुड़े कर्मचारियों और तहसील कार्यालय की मुआवजा शाखा में पदस्थ रहे कर्मचारियों की भूमिका की भी गहन पड़ताल कर रही हैं।
पुलिस का मानना है कि यदि दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्य मिले तो आने वाले दिनों में और लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
तहसीलदार और पटवारियों से पूछताछ फिलहाल टली
जिन तहसीलदारों और पटवारियों की भूमिका मुआवजा स्वीकृति प्रक्रिया में रही, उनसे प्रस्तावित पूछताछ फिलहाल टल गई है। मंगलवार को राजस्व विभाग और पुलिस अधिकारियों की अलग-अलग बैठकों के चलते पूछताछ आगे नहीं बढ़ सकी। हालांकि जांच एजेंसियां इस कड़ी को भी महत्वपूर्ण मान रही हैं।
जेल में बंद आरोपियों की अन्य मामलों में भूमिका भी खंगाल रही पुलिस
अब तक गिरफ्तार सभी आरोपियों की अलग-अलग प्रकरणों में भूमिका का मिलान किया जा रहा है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि कहीं एक ही नेटवर्क ने अन्य मामलों में भी इसी तरह की कार्यप्रणाली अपनाकर सरकारी राशि प्राप्त तो नहीं की।
जांच में वित्तीय लेन-देन, मोबाइल डेटा, डिजिटल साक्ष्य और बैंक खातों का विश्लेषण भी समानांतर रूप से जारी है।
अब तक कई गिरफ्तारियां, जांच का दायरा लगातार बढ़ता गया
इस बहुचर्चित मामले में अब तक डॉ. प्रियंका सोनी, महेंद्र मनहर, गोविंद विश्वकर्मा, हीराप्रसाद खांडेकर, कुश कुमार गुप्ता, नरेंद्र कौशिक, हरिशंकर राठौर, गरीबराम बिंझवार, रामकुमार पाटनवार, रामेश्वर भास्कर सहित कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस का दावा है कि पूरा कथित नेटवर्क संगठित तरीके से कार्य कर रहा था और विभिन्न स्तरों पर उसकी भूमिका की अलग-अलग जांच की जा रही है।


राजपत्रित अधिकारियों तक पहुंचेगी जांच?
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू अब यही माना जा रहा है। मुआवजा स्वीकृति की प्रशासनिक प्रक्रिया में पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम और अन्य राजस्व अधिकारियों की अलग-अलग स्तर पर भूमिका रहती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि कथित फर्जी दस्तावेजों के बावजूद प्रकरण आगे बढ़े, तो संबंधित स्तरों पर नियमों के पालन, दस्तावेजों के परीक्षण और प्रशासनिक प्रक्रिया की भी जांच की जाएगी।
फिलहाल किसी राजपत्रित अधिकारी की जिम्मेदारी आधिकारिक रूप से तय नहीं की गई है और न ही उनके विरुद्ध किसी कार्रवाई की घोषणा की गई है। पुलिस और संबंधित एजेंसियों की विवेचना विभिन्न पहलुओं पर जारी है।

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