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अब बारिश का इंतजार नहीं, बिलासपुर रेल डिपो ने बनाया ऐसा सिस्टम, जो बिना मानसून बताएगा कोच में कहां से टपकेगा पानी

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का स्वदेशी नवाचार, स्क्रैप से तैयार ‘रेन वाटर इन्ग्रेस टेस्ट बेंच’; वंदे भारत समेत सभी कोचों की होगी कृत्रिम बारिश से जांच
बिलासपुर, 09 जुलाई 2026। भारतीय रेलवे में यात्री सुविधाओं और अनुरक्षण व्यवस्था को नई तकनीक से जोड़ने की दिशा में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर कोचिंग डिपो ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। डिपो के अधिकारियों और कर्मचारियों ने ‘रेन वाटर इन्ग्रेस टेस्ट बेंच’ नामक एक स्वदेशी प्रणाली विकसित की है, जिसके जरिए अब प्राकृतिक बारिश का इंतजार किए बिना रेल कोचों में पानी के रिसाव की जांच की जा सकेगी।
यह प्रणाली कृत्रिम वर्षा (Artificial Rain Simulation) तैयार करती है और उसी वातावरण में कोच की छत, खिड़कियां, साइड पैनल, जॉइंट्स और अन्य संवेदनशील हिस्सों की बारीकी से जांच करती है। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कोच के किस हिस्से से बारिश का पानी अंदर प्रवेश कर सकता है और उसे यात्रियों की सेवा में लगाने से पहले ही ठीक किया जा सकेगा।
अब तक बारिश पर निर्भर थी पूरी जांच व्यवस्था
रेल कोचों में वर्षा जल के रिसाव की पहचान अब तक मुख्य रूप से प्राकृतिक बारिश के दौरान ही संभव हो पाती थी। यदि मानसून समाप्त हो जाता या पर्याप्त बारिश नहीं होती, तो कई बार रिसाव की वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती थी।
यही कारण था कि कुछ कोचों में छोटी-छोटी तकनीकी खामियां यात्रियों के सामने आने के बाद ही सामने आती थीं। खासकर मानसून के दौरान छत से पानी टपकना, खिड़कियों के किनारों से पानी आना या कोच के जोड़ वाले हिस्सों से रिसाव जैसी शिकायतें रेलवे के सामने चुनौती बनी रहती थीं।
बिलासपुर कोचिंग डिपो ने इसी व्यावहारिक समस्या का तकनीकी समाधान विकसित किया है।
कैसे काम करेगा ‘रेन वाटर इन्ग्रेस टेस्ट बेंच’
इस प्रणाली में कृत्रिम वर्षा का वातावरण तैयार किया जाता है। निर्धारित दबाव और प्रवाह के साथ पानी को कोच के विभिन्न हिस्सों पर छोड़ा जाता है, जिससे वास्तविक बारिश जैसी स्थिति उत्पन्न होती है।
इसके बाद तकनीकी टीम यह निरीक्षण करती है कि—
छत के किस हिस्से से रिसाव हो सकता है।
खिड़कियों की सीलिंग पूरी तरह सुरक्षित है या नहीं।
साइड पैनलों के जोड़ पूरी तरह वाटरप्रूफ हैं या नहीं।
वेल्डिंग और जॉइंट्स में कहीं सूक्ष्म गैप तो नहीं है।
किसी हिस्से में पानी प्रवेश करने की संभावना तो नहीं बची है।
यदि कहीं भी रिसाव मिलता है तो उसी समय उसकी मरम्मत कर दी जाती है।
स्क्रैप से बना नवाचार, लागत भी बेहद कम
इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम लागत है।
रेलवे के अधिकारियों और कर्मचारियों ने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए अधिकांश संरचना स्क्रैप सामग्री से तैयार की। केवल कुछ आवश्यक पुर्जों की ही बाजार से खरीद की गई।
इससे—
नई मशीन पर भारी खर्च नहीं करना पड़ा।
अनुपयोगी सामग्री का उपयोग हुआ।
संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हुआ।
कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाली प्रणाली तैयार हो गई।
यह रेलवे के ‘मेक इन इंडिया’ और स्वदेशी नवाचार की भावना को भी मजबूत करता है।
सालभर होगी जांच, मानसून का इंतजार खत्म
नई प्रणाली लागू होने के बाद अब किसी भी मौसम में कोचों की वर्षा परीक्षण जांच की जा सकेगी।
इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि—
मानसून शुरू होने से पहले सभी कोचों का परीक्षण संभव होगा।
छिपे हुए रिसाव पहले ही पकड़ लिए जाएंगे।
यात्रियों को बारिश के दौरान पानी टपकने की समस्या कम होगी।
अनुरक्षण अधिक वैज्ञानिक और योजनाबद्ध तरीके से किया जा सकेगा।
वंदे भारत सहित आधुनिक ट्रेनों के लिए भी उपयोगी
रेन वाटर इन्ग्रेस टेस्ट बेंच की डिजाइन पोर्टेबल रखी गई है।
यही कारण है कि इसका उपयोग केवल पारंपरिक मेल-एक्सप्रेस कोचों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि—
वंदे भारत एक्सप्रेस
एलएचबी कोच
आधुनिक डिज़ाइन वाले अन्य रेल कोच
सभी में आवश्यकता के अनुसार किया जा सकेगा।
यात्रियों को क्या मिलेगा सीधा लाभ
नई प्रणाली लागू होने के बाद यात्रियों को कई स्तरों पर सुविधा मिलने की संभावना है—
बारिश में कोच के भीतर पानी टपकने की शिकायतें कम होंगी।
सीट, बर्थ और सामान भीगने जैसी परेशानी घटेगी।
लंबी दूरी की यात्रा अधिक आरामदायक होगी।
मानसून के दौरान कोचों की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
बेहतर गुणवत्ता वाले कोच यात्रियों को उपलब्ध होंगे।
रखरखाव व्यवस्था भी होगी अधिक प्रभावी
रेलवे के लिए भी यह तकनीक कई दृष्टि से महत्वपूर्ण साबित होगी।
कोच सेवा में भेजने से पहले ही कमियां दूर हो जाएंगी।
बार-बार मरम्मत की आवश्यकता कम होगी।
अनुरक्षण की गुणवत्ता बेहतर होगी।
कार्यशालाओं का समय और संसाधन बचेंगे।
कोचों की परिचालन क्षमता में सुधार होगा।
तकनीकी दक्षता और नवाचार का उदाहरण बना बिलासपुर
इस नवाचार को दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर कोचिंग डिपो के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने स्वयं विकसित किया है। सीमित संसाधनों के बीच तकनीकी सोच, अनुभव और रचनात्मकता का उपयोग करते हुए तैयार की गई यह प्रणाली इस बात का उदाहरण है कि स्थानीय स्तर पर भी ऐसे समाधान विकसित किए जा सकते हैं, जो रेलवे जैसी विशाल परिवहन व्यवस्था में गुणवत्ता सुधार और यात्री सुविधा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।
मुख्य बातें एक नजर में
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर कोचिंग डिपो की स्वदेशी तकनीक।
‘रेन वाटर इन्ग्रेस टेस्ट बेंच’ से कृत्रिम बारिश कर होगी जांच।
प्राकृतिक बारिश पर निर्भरता समाप्त।
कोच की छत, खिड़की, साइड पैनल और जॉइंट्स की होगी सटीक जांच।
अधिकांश निर्माण स्क्रैप सामग्री से, लागत बेहद कम।
वर्षभर परीक्षण की सुविधा।
वंदे भारत सहित आधुनिक कोचों में भी उपयोग संभव।
मानसून के दौरान पानी रिसाव संबंधी शिकायतों में कमी आने की उम्मीद।
अनुरक्षण गुणवत्ता, कोच विश्वसनीयता और यात्री सुविधा को मिलेगा नया आधार।

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