बिलासपुर की pds दुकानों पर जांच का शिकंजा, खाद्य विभाग ने मांगा हिसाब—किसे और क्यों बांटा गया बिना बायोमेट्रिक राशन?
अप्रैल में गड़बड़ी की आशंका, वितरण OTP से होने पर सवाल; नेताओं और संगठन पदाधिकारियों से जुड़ी कुछ दुकानों के भी जांच दायरे में आने की चर्चा
बिलासपुर। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत गरीबों को मिलने वाले राशन के वितरण को लेकर बिलासपुर जिले में बड़ा प्रशासनिक परीक्षण शुरू हो गया है। जिले की 697 सरकारी राशन दुकानों में से शहर और आसपास संचालित 163 शासकीय उचित मूल्य दुकानों का डेटा खंगालने पर 99 दुकानों में असामान्य रूप से अधिक मात्रा में ओटीपी आधारित वितरण दर्ज होने के बाद खाद्य विभाग ने जांच के आदेश जारी किए हैं। इन दुकानों में अप्रैल महीने के दौरान 10 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक खाद्यान्न वितरण बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण के बजाय ओटीपी के माध्यम से किया गया है।
मामले ने तब गंभीर रूप ले लिया जब केंद्र सरकार ने तीन माह का राशन एक साथ वितरण किए जाने की प्रक्रिया के दौरान संभावित अनियमितताओं को लेकर राज्य सरकार से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा। इसके बाद राज्य स्तर से सभी जिलों को रिकॉर्ड की जांच और सत्यापन के निर्देश जारी किए गए हैं।
डेटा ने बढ़ाई हलचल, अब घर-घर सत्यापन की तैयारी
खाद्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार जिन दुकानों में 10 प्रतिशत से अधिक वितरण ओटीपी के माध्यम से दर्ज हुआ है, उन सभी की जांच की जाएगी। जांच के दौरान यह देखा जाएगा कि जिन हितग्राहियों को ओटीपी के जरिए राशन दिया गया, वे वास्तव में पात्र परिस्थितियों में थे या नहीं।
अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि प्रत्येक मामले में बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण नहीं हो पाने के कारणों का दस्तावेजी सत्यापन किया जाए और पंचनामा तैयार कर रिपोर्ट भेजी जाए। पूरी जांच रिपोर्ट 25 जून तक संचालनालय को भेजी जानी है।
ओटीपी सुविधा किसके लिए, अब यही बनेगा जांच का आधार
पीडीएस व्यवस्था में सामान्य परिस्थितियों में राशन वितरण बायोमेट्रिक सत्यापन के आधार पर किया जाता है। ओटीपी आधारित वितरण केवल विशेष परिस्थितियों में अनुमन्य माना गया है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार बुजुर्ग, दिव्यांग अथवा ऐसी स्थिति जहां बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण संभव न हो, वहां ओटीपी का उपयोग किया जा सकता है।
यही कारण है कि अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह होगा कि अप्रैल माह में जिन हजारों ट्रांजेक्शनों में ओटीपी का उपयोग किया गया, वे निर्धारित प्रावधानों के अनुरूप थे या नहीं।
कुछ चर्चित दुकानों के नाम भी जांच दायरे में आने की चर्चा
खाद्य विभाग के रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद जिन 99 दुकानों को जांच सूची में शामिल किया गया है, उनमें कुछ ऐसी दुकानें भी बताई जा रही हैं जिनका संचालन राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों, विभिन्न दलों से जुड़े पदाधिकारियों अथवा राशन दुकान विक्रेता संघ से जुड़े लोगों के प्रभाव क्षेत्र में है। हालांकि विभाग ने जांच पूरी होने से पहले किसी भी दुकान या संचालक का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।
जवाब सिर्फ दुकानदारों से नहीं, अधिकारियों से भी मांगा जाएगा
इस पूरे प्रकरण की खास बात यह है कि जांच का दायरा केवल राशन दुकान संचालकों तक सीमित नहीं रखा गया है। संचालनालय स्तर से स्पष्ट किया गया है कि यदि जांच में नियमों के विपरीत ओटीपी आधारित वितरण सामने आता है तो संबंधित दुकान संचालक के साथ-साथ क्षेत्रीय खाद्य निरीक्षक और सहायक खाद्य अधिकारियों की भूमिका भी जांची जाएगी।
इससे पहली बार जवाबदेही की श्रृंखला निचले स्तर से लेकर निगरानी तंत्र तक पहुंचती दिखाई दे रही है।
बिलासपुर में कुल 697 राशन दुकानें, निगाहें अब 99 पर
बिलासपुर जिले में वर्तमान में 697 शासकीय उचित मूल्य दुकानें संचालित हैं, जिनके माध्यम से लाखों हितग्राहियों तक खाद्यान्न पहुंचाया जाता है। इनमें से 99 दुकानों के रिकॉर्ड ने प्रशासन का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जांच का केंद्र बिंदु यह रहेगा कि अप्रैल माह में दर्ज ओटीपी आधारित वितरण वास्तविक जरूरत के कारण हुआ या फिर इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक अथवा तकनीकी वजह थी।
खाद्य विभाग का रुख सख्त
प्रभारी खाद्य नियंत्रक राजीव लोचन तिवारी ने बताया कि शासन के निर्देश पर जांच की जा रही है। नियमानुसार ओटीपी के माध्यम से राशन वितरण केवल विशेष श्रेणी के हितग्राहियों के लिए निर्धारित है। सभी मामलों का परीक्षण किया जा रहा है और जांच रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी।
इधर, खाद्य संचालनालय ने भी स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता है और जांच के दौरान प्राप्त तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर
फिलहाल जिले की 99 राशन दुकानों का रिकॉर्ड जांच एजेंसियों और खाद्य विभाग के अधिकारियों के सामने है। अप्रैल महीने में हुए ओटीपी आधारित वितरण के प्रत्येक मामले की पड़ताल की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बढ़े हुए ओटीपी ट्रांजेक्शन के पीछे तकनीकी, मानवीय या प्रशासनिक कारण क्या थे और रिकॉर्ड तथा जमीनी स्थिति में कितना सामंजस्य है।




