मोहम्मद इसराइल बबलू | बिलासपुर
गले में गहरा चीरा, कटी हुई श्वासनली, तेजी से गिरता ऑक्सीजन स्तर और मौत से जंग लड़ता एक 26 वर्षीय युवक… हालात ऐसे थे कि कुछ मिनट की देरी भी उसकी जिंदगी छीन सकती थी। लेकिन बिलासपुर के सिम्स अस्पताल में डॉक्टरों की तत्परता, विशेषज्ञता और दो घंटे तक चली जटिल सर्जरी ने असंभव दिख रही चुनौती को सफलता में बदल दिया। चिकित्सकों ने न केवल युवक का श्वास मार्ग सुरक्षित किया, बल्कि क्षतिग्रस्त श्वासनली को जोड़कर उसे नया जीवन भी दिया।



1 जून की सुबह करीब 7 बजे 26 वर्षीय शादाब खान को गंभीर हालत में छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) के कैजुअल्टी विभाग में लाया गया। युवक के गले में गहरा खुला घाव था। चोट इतनी गंभीर थी कि उसकी श्वासनली कट चुकी थी और घाव से हवा का स्पष्ट आवागमन हो रहा था। चिकित्सकीय भाषा में इस तरह की स्थिति को लैरिंगोट्रेकियल इंजरी कहा जाता है, जिसे अत्यंत जानलेवा माना जाता है।
मरीज का ऑक्सीजन स्तर लगातार गिर रहा था और उसकी सांसें थमने का खतरा बढ़ता जा रहा था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. आरती पाण्डेय, सह-प्राध्यापक डॉ. विद्याभूषण साहू और सहायक प्राध्यापक डॉ. श्वेता मित्तल ने तत्काल आपातकालीन सर्जरी का निर्णय लिया।
सबसे बड़ी चुनौती थी सांसों को बचाना
ऑपरेशन थिएटर में पहुंचते ही डॉक्टरों ने सबसे पहले मरीज के श्वास मार्ग को सुरक्षित करने की प्रक्रिया शुरू की। चिकित्सकों ने आपातकालीन ट्रेकियोस्टॉमी कर सांस लेने का वैकल्पिक मार्ग बनाया और ऑक्सीजन संतृप्ति को सामान्य स्तर तक पहुंचाया। इसके बाद शुरू हुई वह जटिल सर्जरी, जिस पर मरीज की जिंदगी टिकी हुई थी।
करीब दो घंटे तक चली इस चुनौतीपूर्ण सर्जरी में चिकित्सकों ने क्षतिग्रस्त श्वासनली की मरम्मत की। इसके साथ ही गर्दन की मांसपेशियों, फैशियल लेयर और त्वचा को क्रमबद्ध तरीके से पांच अलग-अलग परतों में जोड़कर पुनर्स्थापित किया गया। सूक्ष्म तकनीक और विशेषज्ञता के साथ किए गए इस ऑपरेशन ने गंभीर चोट को नियंत्रित करने में सफलता दिलाई।
ऑपरेशन के बाद सामने आई एक और गंभीर चुनौती
सर्जरी के बाद की गई विस्तृत जांच में युवक के सिर में भी गंभीर चोट का खुलासा हुआ। जांच रिपोर्ट में सिर की हड्डी के कई हिस्सों में फ्रैक्चर पाए गए, जबकि सीटी स्कैन में मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव के संकेत भी मिले।
सिम्स में न्यूरोसर्जन उपलब्ध नहीं होने के कारण मरीज को प्राथमिक उपचार देकर स्थिर किया गया और आगे की विशेष चिकित्सा के लिए पंडित जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल, रायपुर रेफर किया गया, जहां उसका उपचार जारी है।
एनेस्थीसिया टीम ने निभाई निर्णायक भूमिका
इस जटिल सर्जरी को सफल बनाने में एनेस्थीसिया विभाग की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. मधुमिता मूर्ति तथा सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रशांत कुमार पैंकरा के नेतृत्व में पूरी टीम ने ऑपरेशन के दौरान मरीज की स्थिति को नियंत्रित और सुरक्षित बनाए रखा।
ईएनटी, एनेस्थीसिया और सर्जिकल टीम के बीच बेहतर समन्वय ने इस गंभीर मामले को सफलता की कहानी में बदल दिया।
हर मिनट था महत्वपूर्ण : डॉ. आरती पाण्डेय
ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. आरती पाण्डेय ने बताया कि जब मरीज अस्पताल पहुंचा, तब उसकी स्थिति बेहद गंभीर थी। श्वासनली में गंभीर क्षति के कारण उसकी सांस लेने की क्षमता प्रभावित हो चुकी थी। ऐसे मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। टीम ने तत्काल निर्णय लेते हुए पहले श्वास मार्ग सुरक्षित किया और उसके बाद श्वासनली की जटिल मरम्मत की प्रक्रिया पूरी की।
उन्होंने बताया कि इस प्रकार की चोटें अत्यंत दुर्लभ और जानलेवा होती हैं, लेकिन समय पर उपचार और टीमवर्क की वजह से मरीज की जान बचाई जा सकी।
सिम्स की विशेषज्ञता का उदाहरण

सिम्स के अधिष्ठाता डॉ. रमणेश मूर्ति ने इस उपलब्धि को संस्थान के चिकित्सकों की दक्षता, समर्पण और त्वरित निर्णय क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।

वहीं चिकित्सा अधीक्षक डॉ. लखन सिंह ने कहा कि गंभीर मरीजों को त्वरित और गुणवत्तापूर्ण उपचार उपलब्ध कराना संस्थान की प्राथमिकता है तथा इस मामले में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने उत्कृष्ट समन्वय का परिचय दिया।
संभाग का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल
बिलासपुर संभाग का सबसे बड़ा शासकीय अस्पताल और छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय सिम्स प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है। यहां रोजाना लगभग 1800 से 2200 मरीज ओपीडी में उपचार प्राप्त करते हैं, जबकि 150 से 180 मरीज भर्ती होकर इलाज कराते हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों और पड़ोसी राज्यों से भी मरीज यहां उपचार के लिए पहुंचते हैं।
गले की कटी श्वासनली, गिरता ऑक्सीजन स्तर और सिर की गंभीर चोट जैसी परिस्थितियों में एक युवक को सुरक्षित बचा लेना चिकित्सा क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा रहा है। यह मामला एक बार फिर दिखाता है कि आपातकालीन परिस्थितियों में समय पर लिया गया निर्णय और विशेषज्ञ टीमवर्क किसी मरीज के लिए जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है।

