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लिंगयाडीह में 200 दिन से बुलडोजर के खिलाफ मोर्चा… 90 साल की दादी से लेकर लकवाग्रस्त लोग तक डटे- बोले…‘सीने पर चलाकर ही आगे बढ़ेगा निगम’

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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हाईकोर्ट की राहत के बीच लिंगियाडीह में संघर्ष का 200वां दिन, आशियाना बचाने की लड़ाई बनी शहर की सबसे लंबी नागरिक मुहिम


बिलासपुर। लिंगियाडीह में अपने घरों को बचाने के लिए चल रहा आंदोलन मंगलवार को 200 दिन पूरे कर गया। नगर निगम की प्रस्तावित कार्रवाई के खिलाफ शुरू हुआ यह संघर्ष अब केवल जमीन और मकान का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि सैकड़ों परिवारों के अस्तित्व, वर्षों पुराने बसेरे और सरकारी वादों पर भरोसे की लड़ाई में बदल चुका है। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे अंतिम सांस तक अपने आशियाने बचाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे और यदि बुलडोजर आया तो उसे उनके सीने पर चलकर ही आगे बढ़ना होगा।
आंदोलन स्थल पर मंगलवार को भी बड़ी संख्या में रहवासी जुटे। इनमें 90 वर्ष की बुजुर्ग महिलाएं, बीमार और लकवाग्रस्त लोग भी शामिल रहे। आंदोलनकारियों ने दावा किया कि बीते 200 दिनों में मौसम बदले, परिस्थितियां बदलीं, लेकिन अपने घर बचाने का उनका संकल्प नहीं बदला।
‘गरीबों के घर उजाड़कर गार्डन बनाना अन्याय’
रहवासियों का आरोप है कि नगर निगम जिस जमीन पर गार्डन और व्यावसायिक परिसर विकसित करने की योजना बना रहा है, वहां दशकों से परिवार निवास कर रहे हैं। उनका कहना है कि गरीब परिवारों को हटाकर सौंदर्यीकरण परियोजना लागू करना सामाजिक न्याय के विपरीत है।
वार्ड पार्षद दिलीप पाटिल ने आंदोलन स्थल पर कहा कि जब तक लोगों को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि प्रशासन यदि बलपूर्वक कार्रवाई करना चाहता है तो उसे पहले आंदोलनकारियों के विरोध का सामना करना होगा।


200वें दिन आंदोलनकारियों का बड़ा मनोबल, हाईकोर्ट के आदेश से मिली नई ताकत
आंदोलन के 200 दिन पूरे होने के बीच छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय से मिली अंतरिम राहत ने रहवासियों के संघर्ष को नया बल दिया है। हाईकोर्ट ने लिंगियाडीह बस्ती के 36 रहवासियों के घरों और कब्जों को तोड़ने पर अंतरिम रोक लगा दी है।
जस्टिस एन.के. चंद्रवंशी की एकल पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद मामले को विस्तृत सुनवाई योग्य मानते हुए यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट के इस आदेश को आंदोलनकारी अपनी लड़ाई की महत्वपूर्ण उपलब्धि मान रहे हैं।
2019-20 के सर्वे में पात्र घोषित हुए थे रहवासी
याचिकाकर्ताओं के अनुसार वर्ष 2019-20 में किए गए सर्वे में उन्हें राजीव गांधी आश्रय योजना के तहत पात्र पाया गया था। योजना के अनुसार कब्जे वाली भूमि पर ही पट्टा प्रदान करने का निर्णय लिया गया था।
रहवासियों का दावा है कि इसी प्रक्रिया के तहत उन्होंने वर्ष 2022 में निर्धारित प्रीमियम राशि भी जमा कर दी थी। उनका कहना है कि सरकार और निगम ने उनसे पैसा लेने के बाद अब अपने ही निर्णय से पीछे हटने का प्रयास किया है।
2024 में बदली तस्वीर, गार्डन और कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स की बनी योजना
मामले में बताया गया कि वर्ष 2024 में पूर्व निर्णय को लागू नहीं किया गया। इसके बाद नगर निगम ने संबंधित भूमि पर व्यावसायिक परिसर और गार्डन विकसित करने की नई योजना तैयार कर ली।
यही निर्णय बाद में विवाद की मुख्य वजह बना और रहवासियों ने इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई शुरू की।
कोर्ट ने पूछा- पैसा लेने के बाद पट्टा क्यों नहीं दिया?
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने राज्य सरकार और नगर निगम से महत्वपूर्ण सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि जब योजना के तहत लाभार्थियों से राशि जमा करा ली गई थी तो उन्हें पट्टा क्यों नहीं दिया गया।
राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि वर्ष 2023 में शासकीय भूमि पर पट्टा देने के नियमों में बदलाव हुआ है। नए नियमों के कारण संबंधित लोगों को उसी स्थान पर पट्टा नहीं दिया जा सकता।
सरकारी पक्ष ने यह भी कहा कि प्रभावित लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत खमतराई क्षेत्र में फ्लैट उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। साथ ही यह तर्क भी रखा गया कि राजीव गांधी आश्रय योजना अब समाप्त की जा चुकी है।
‘नियम बदले तो क्या अधिकार खत्म हो जाएंगे?’
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव, अनिमेष वर्मा और आशीष बैक ने दलील दी कि उनके मुवक्किल वर्ष 2019-20 की योजना में पात्र घोषित हो चुके थे और 2022 में प्रीमियम भी जमा कर चुके हैं।
उन्होंने न्यायालय को बताया कि बाद में नियमों में हुए बदलाव का असर उन लोगों के अधिकारों पर नहीं पड़ सकता जो पहले ही योजना के दायरे में आ चुके हैं। उनका कहना था कि दशकों से निवास, योजना में चयन और प्रीमियम जमा करने जैसे तथ्यों के बाद सरकार अपने पूर्व आश्वासन से पीछे नहीं हट सकती।
मास्टर प्लान पर भी उठे सवाल
याचिका में यह मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया कि संबंधित क्षेत्र मास्टर प्लान में रिहायशी क्षेत्र के रूप में दर्ज है। ऐसे में वहां व्यावसायिक परिसर विकसित करने का प्रस्ताव नियोजन मानकों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने इसे परियोजना के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार बताया है।
503 लाभार्थियों में से 113 स्थानों पर कार्रवाई की तैयारी
राजीव गांधी आश्रय योजना के तहत कुल 503 लाभार्थियों का चयन किया गया था। इनमें से 113 स्थानों को खाली कराकर वहां व्यावसायिक परिसर और गार्डन विकसित करने की योजना प्रस्तावित बताई गई है।
लिंगियाडीह के रहवासी इसी प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि इससे बड़ी संख्या में परिवार बेघर हो सकते हैं।
आंदोलन बना शहर का बड़ा नागरिक प्रतिरोध
लगातार 200 दिनों तक धरना जारी रहना बिलासपुर की हालिया नागरिक आंदोलनों की सबसे लंबी श्रृंखलाओं में से एक माना जा रहा है। आंदोलन स्थल पर हर दिन महिलाओं, बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों की मौजूदगी देखने को मिल रही है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि उनका संघर्ष केवल मकानों के लिए नहीं, बल्कि उन अधिकारों के लिए है जिनका भरोसा उन्हें वर्षों पहले सरकारी योजनाओं के माध्यम से दिलाया गया था।
अब जून की अगली सुनवाई पर नजर
हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं में संबंधित पक्षों को जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। एक याचिका में नगर निगम अपना जवाब दाखिल कर चुका है जबकि राज्य सरकार का जवाब लंबित है। दूसरी याचिका में सभी पक्षों के जवाब आने बाकी हैं।
अंतरिम राहत के साथ फिलहाल यथास्थिति बनी हुई है। ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद जून में होने वाली अगली सुनवाई पर आंदोलनकारियों, प्रशासन और राजनीतिक हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

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