

70 वार्ड वाले बिलासपुर में सिर्फ वार्ड-29 पर सबकी नजर, गफ्फार के गढ़ में संगठन, सहानुभूति और सत्ता की रणनीति आमने-सामने
मोहम्मद इसराइल | बिलासपुर
बिलासपुर नगर निगम में 70 वार्ड हैं, लेकिन सियासत की सबसे तेज धड़कन इन दिनों वार्ड क्रमांक 29 तारबाहर में सुनाई दे रही है। वजह सिर्फ उपचुनाव नहीं, बल्कि वह राजनीतिक प्रतिष्ठा है जो इस सीट से जुड़ चुकी है।
नामांकन दाखिल होने के साथ ही यह लड़ाई अब सिर्फ कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह गई है। यह मुकाबला संगठन बनाम संगठन, रणनीति बनाम रणनीति और पुराने राजनीतिक प्रभाव बनाम नई पीढ़ी की सियासी इंजीनियरिंग में बदलता दिख रहा है।
दिलचस्प यह है कि दोनों प्रमुख दलों में इस बार चुनावी कमान युवा चेहरों के हाथों में है। भाजपा में जिला अध्यक्ष दीपक सिंह और कांग्रेस में शहर अध्यक्ष सिधांशु मिश्रा की रणनीति को लेकर दोनों दलों के भीतर चर्चा तेज है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल लगातार घूम रहा है कि तारबाहर का उपचुनाव किस युवा नेतृत्व की राजनीतिक क्षमता का सबसे बड़ा टेस्ट साबित होगा।
हालांकि दोनों संगठनों के भीतर पर्दे के पीछे पुराने दिग्गज भी पूरी तरह सक्रिय बताए जा रहे हैं। वार्ड छोटा है, लेकिन इसके बहाने दोनों दल पूरे शहर की राजनीतिक दिशा पढ़ने में जुटे हैं।
भाजपा की रणनीति: सत्ता, सिस्टम और विकास मॉडल
तारबाहर में भाजपा इस बार सिर्फ चुनाव नहीं लड़ रही, बल्कि निगम की सत्ता और प्रदेश सरकार के विकास मॉडल को भी मैदान में उतार चुकी है।
नगर निगम में भाजपा सत्तासीन है। नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव लगातार बिलासपुर में विकास कार्यों और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार को मुद्दा बना रहे हैं। भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि सड़क, नाली, पेयजल और शहरी सुविधाओं से जुड़े कामों का लाभ चुनाव में मिल सकता है।
हालांकि पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक समीकरण माने जा रहे हैं। तारबाहर लंबे समय से अल्पसंख्यक प्रभाव वाला वार्ड रहा है, जहां मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। भाजपा इस बार बूथ स्तर पर अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही है।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि भाजपा ने चुनाव शुरू होने से पहले ही वार्ड के भीतर माइक्रो-मैनेजमेंट और वोटर संपर्क के लिए अलग नेटवर्क सक्रिय कर दिए हैं।
कांग्रेस की रणनीति: गफ्फार की विरासत और भावनात्मक कनेक्ट
कांग्रेस के लिए यह उपचुनाव संगठनात्मक लड़ाई से ज्यादा “विरासत बचाने” की जंग की तरह देखा जा रहा है।
तारबाहर वह वार्ड है जहां 1984 से कांग्रेस का राजनीतिक कब्जा बना हुआ है। नगर निगम गठन के बाद से भाजपा यहां लगातार चुनाव हारती रही है। इस पूरे राजनीतिक किले की नींव स्वर्गीय शेख गफ्फार ने रखी थी।
1984 से 1999 तक लगातार पार्षद रहने वाले गफ्फार ने इस वार्ड में ऐसा राजनीतिक नेटवर्क तैयार किया, जिसे कांग्रेस आज भी सबसे मजबूत वोट बैंक मानती है।
गफ्फार के बाद शारदा विश्वकर्मा, चंद्रभान नेताम, दिनेश ध्रुव और एसडी कार्टर रेड्डू जैसे नेताओं ने इस सीट पर कांग्रेस की पकड़ बनाए रखी। 2019 में गफ्फार के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके छोटे भाई शेख असलम को जनता ने जिताया। बाद में मुख्य चुनाव में भी असलम ने जीत दोहराई।
अब असलम के निधन के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर गफ्फार परिवार पर भरोसा जताते हुए शेख मोहम्मद आजम को मैदान में उतारा है।
कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ा सवाल: विरासत या परिवारवाद?
तारबाहर की राजनीति में इस बार सबसे ज्यादा चर्चा इसी मुद्दे पर है।
स्व. शेख गफ्फार ने अपने राजनीतिक जीवन में परिवारवाद से दूरी बनाए रखी थी। जब सीट आरक्षित हुई या वे खुद मेयर चुनाव लड़े, तब उन्होंने रिश्तेदारों की बजाय अपने करीबी नेताओं—एसडी कार्टर रेड्डू और दिनेश ध्रुव जैसे चेहरों को आगे बढ़ाया।
लेकिन उनके निधन के बाद कांग्रेस लगातार परिवार के सदस्यों पर भरोसा जता रही है। पहले शेख असलम, फिर दोबारा असलम और अब शेख मोहम्मद आजम।
यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर भी यह सवाल तैर रहा है कि पार्टी “गफ्फार की राजनीतिक सोच” को आगे बढ़ा रही है या “सहानुभूति की राजनीति” को।
इसी बहस के बीच एसडी कार्टर रेड्डू का नाम भी फिर चर्चा में आ गया है। पिछली बार टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर चुनाव लड़ चुके रेड्डू इस बार भी पर्चा खरीद चुके हैं। इससे कांग्रेस के भीतर की आंतरिक हलचल और तेज हो गई है।
वार्ड छोटा, लेकिन संदेश पूरे शहर के लिए
तारबाहर का उपचुनाव अब वार्ड की सीमाओं से बाहर निकल चुका है। भाजपा इसे कांग्रेस के सबसे मजबूत किले में सेंध लगाने के अवसर की तरह देख रही है, जबकि कांग्रेस इसे अपने पारंपरिक जनाधार और संगठनात्मक पकड़ की परीक्षा मानकर पूरी ताकत झोंक चुकी है।
यही वजह है कि शहर की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा किसी मेयर, विधायक या मंत्री की नहीं, बल्कि वार्ड क्रमांक 29 की गलियों में चल रही चुनावी रणनीति की हो रही है।



