मोहम्मद इसराइल

बिलासपुर।
बिलासपुर नगर निगम के वार्ड क्रमांक 29 तारबाहर का उपचुनाव अब कांग्रेस के राजनीतिक किले की अग्निपरीक्षा बन गया है, जिसे चार दशक पहले स्वर्गीय शेख गफ्फार ने खड़ा किया था और जिसे भाजपा तमाम लहरों, रणनीतियों और चेहरों के बावजूद कभी ढहा नहीं सकी।
सोमवार को नामांकन के दौरान दोनों दलों ने जिस तरह ताकत दिखाई, उससे साफ हो गया कि यह लड़ाई एक पार्षद सीट से कहीं बड़ी है। कांग्रेस इसे “गफ्फार विरासत” बचाने की जंग की तरह लड़ रही है, जबकि भाजपा इसे बदलते राजनीतिक समीकरणों और प्रदेश सरकार के विकास मॉडल की परीक्षा बताकर मैदान में उतरी है।
एक तरफ कांग्रेस ने स्व. गफ्फार के भतीजे शेख मोहम्मद आजम को उम्मीदवार बनाया है, तो दूसरी ओर भाजपा नेदो चुनाव हार चुके मधुसूदन राव पर फिर भरोसा जताया है। दिलचस्प यह है कि भाजपा इस बार हार-जीत के पुराने आंकड़ों से ज्यादा “माहौल बदलने” की बात कर रही है। पार्टी नेताओं का दावा है कि पिछली बारों की तुलना में कांग्रेस की बढ़त कम हुई है और पूर्व पार्षद के कार्यकाल को लेकर क्षेत्र में नाराजगी भी मौजूद है।


नामांकन में दिखा शक्ति प्रदर्शन, दोनों दलों ने झोंकी पूरी ताकत
तारबाहर में नामांकन का दिन किसी विधानसभा चुनाव जैसा नजर आया। कांग्रेस की ओर से विधायक, पूर्व विधायक, संगठन के पुराने चेहरे और युवा नेतृत्व एक साथ सड़क पर दिखे। पार्टी ने संदेश देने की कोशिश की कि गफ्फार परिवार अब भी पूरे संगठन की केंद्रीय धुरी है।
उधर भाजपा ने भी प्रदेश सरकार के विकास कार्यों और संगठनात्मक मजबूती को मुद्दा बनाकर शक्ति प्रदर्शन किया। पार्टी नेताओं का मानना है कि अब यह वार्ड “अभेद्य” नहीं रहा और सामाजिक समीकरणों में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है।
सियासी गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि पश्चिम बंगाल की तरह मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े मुद्दों का असर यहां भी दिखाई दे सकता है, जिसका लाभ भाजपा को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि कांग्रेस इसे पूरी तरह खारिज कर रही है और दावा कर रही है कि अल्पसंख्यक, ईसाई और पारंपरिक वोट बैंक पूरी मजबूती से उसके साथ खड़ा है।
1984 से ‘पंजे’ का पंच, हर चुनाव में भाजपा बेअसर
तारबाहर का इतिहास बिलासपुर की राजनीति में अलग पहचान रखता है। 1984 में नगर निगम गठन के बाद से अब तक इस वार्ड में कांग्रेस का वर्चस्व कायम है। मुस्लिम और ईसाई मतदाताओं की निर्णायक मौजूदगी वाले इस इलाके में भाजपा हर चुनाव में रणनीति बदलती रही, लेकिन जीत का रास्ता नहीं खोल सकी।
इस राजनीतिक गढ़ की नींव स्व. शेख गफ्फार ने रखी थी। 1984 से 1999 तक वे लगातार यहां पार्षद रहे। इसके बाद कांग्रेस ने शारदा विश्वकर्मा को मैदान में उतारा और जीत का सिलसिला जारी रहा। 2004 में गफ्फार मेयर चुनाव लड़ने उतरे तो कांग्रेस ने चंद्रभान नेताम को टिकट दिया और जीत फिर कांग्रेस के खाते में गई।
2009 में सीट आरक्षित हुई तो दिनेश ध्रुव जीते। 2014 में एसडी कार्टर रेड्डू ने कांग्रेस का झंडा बुलंद रखा। 2019 में शेख गफ्फार चुनाव मैदान में थे, लेकिन मतगणना से पहले ही उनका निधन हो गया। इसके बाद हुए उपचुनाव में जनता ने उनके छोटे भाई शेख असलम को जिताया। बाद में मुख्य चुनाव में भी असलम ने जीत दोहराई।
अब असलम के निधन के बाद खाली हुई सीट पर कांग्रेस ने एक बार फिर गफ्फार परिवार पर दांव लगाया है।
गफ्फार परिवार बनाम गफ्फार की राजनीति… कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल
इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि जिस शेख गफ्फार ने जीवनभर परिवारवाद से दूरी बनाए रखी, आज उसी परिवार के नाम पर कांग्रेस तीसरी बार टिकट दे रही है।
गफ्फार ने अपने राजनीतिक जीवन में कभी रिश्तेदारों को आगे नहीं बढ़ाया। जब वे खुद मेयर चुनाव लड़े या सीट आरक्षित हुई, तब उन्होंने परिवार की बजाय अपने करीबी नेताओं—एसडी कार्टर रेड्डू, दिनेश ध्रुव को मौका दिया।
लेकिन उनके निधन के बाद कांग्रेस लगातार परिवार के सदस्यों पर भरोसा जता रही है। पहले शेख असलम, फिर दोबारा असलम और अब शेख मोहम्मद आजम।
यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर भी यह सवाल चर्चा में है कि पार्टी “गफ्फार की विरासत” बचा रही है या “सहानुभूति की राजनीति” को आगे बढ़ा रही है।
इसी बहस के बीच एसडी कार्टर रेड्डू का नाम भी फिर चर्चा में है। पिछली बार टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर चुनाव लड़ चुके रेड्डू इस बार भी पर्चा खरीद चुके हैं। इससे कांग्रेस के भीतर की हलचल और बढ़ गई है।
भाजपा की रणनीति: हार का रिकॉर्ड नहीं, बदलता गणित
भाजपा के लिए तारबाहर सिर्फ एक वार्ड नहीं, बल्कि बिलासपुर शहर में राजनीतिक विस्तार का प्रतीक माना जा रहा है। पार्टी नेताओं का मानना है कि पिछले दो चुनावों में कांग्रेस की बढ़त घटी है और अब क्षेत्र में “भावनात्मक वोट” की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही।
भाजपा यह भी प्रचारित कर रही है कि प्रदेश सरकार की योजनाएं और विकास कार्य पहली बार इस वार्ड में असर पैदा कर रहे हैं। पार्टी का एक वर्ग यह मानकर चल रहा है कि यदि इस बार वोट प्रतिशत में बड़ा अंतर नहीं रहा, तो भविष्य की नगर राजनीति का पूरा समीकरण बदल सकता है।
हालांकि कांग्रेस अब भी गफ्फार की छवि, पुराने संगठनात्मक नेटवर्क और अल्पसंख्यक एकजुटता को अपनी सबसे बड़ी ताकत मान रही है।
तारबाहर की गलियों में फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल की है—क्या यह चुनाव फिर एक बार “गफ्फार के गढ़” की कहानी दोहराएगा, या भाजपा आखिरकार 41 साल पुराने किले में पहली दरार डाल पाएगी।



