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रफ्तार, नशा और लापरवाह ट्रैफिक सिस्टम के बीच कुचली जा रहीं ज़िंदगियां….

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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बिलासपुर। मोहम्मद इसराइल

छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा शहर बिलासपुर इन दिनों सड़क हादसों की भयावह श्रृंखला से गुजर रहा है। यातायात इंजीनियरिंग की विफलता, नशे में ड्राइविंग, बेलगाम ओवरस्पीड, भारी अतिक्रमण और शहर के भीतर बेखौफ दौड़ते भारी वाहन—इन सबके बीच आम लोग रोज़ सड़कों पर जान गंवा रहे हैं। एक ओर यातायात जागरूकता सप्ताह चल रहा है, प्रशासनिक स्तर पर चिंता जताई जा रही है, सोशल मीडिया पर अपीलें हो रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हादसों की रफ्तार थमने का नाम नहीं ले रही।


नूतन चौक हादसा: एक मोड़, एक टक्कर और दो जिंदगियां खत्म
गुरुवार रात नूतन चौक पर हुआ हादसा शहर को झकझोर देने वाला है। कार सवार चार युवकों में से जीजीयू की एक छात्रा की मौके पर ही मौत हो गई। गंभीर रूप से घायल दूसरे युवक ने शुक्रवार को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। तीसरे घायल को सिम्स से अपोलो रेफर किया गया है, जबकि चौथा युवक पुलिस हिरासत में है।
कार चला रहे युवक ने पुलिस को बताया कि नूतन चौक मोड़ पर कार सड़क से उतरने वाली थी, इसी दौरान स्टीयरिंग घुमाने पर कार करीब 90 डिग्री तक मुड़ गई और दूसरे लेन के बीच खड़ी होते ही सामने से आ रहे हाइवा से टकरा गई। चालक के बयान के बाद पुलिस घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। प्राथमिक तौर पर पुलिस इस हादसे को नशे में रश ड्राइविंग से जोड़कर देख रही है।
आंकड़े जो डराते हैं: चार साल में 50 मौतें, आधे युवा
जनवरी 2022 से दिसंबर 2025 के बीच चार वर्षों के आंकड़े बिलासपुर की सड़कों की सच्चाई उजागर करते हैं। ओवरस्पीड के कारण इस अवधि में 156 सड़क हादसे दर्ज हुए, जिनमें 50 लोगों की मौत और 164 लोग घायल हुए। मृतकों में 21 से 40 वर्ष आयु वर्ग के 36 युवा शामिल हैं—यानी कुल मौतों का करीब 50 प्रतिशत।
हादसों की प्रमुख वजह नशा सामने आया है। पुलिस ने निर्धारित गति से अधिक वाहन चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए दो वर्षों में 2400 से अधिक चालान काटे, लेकिन इसके बावजूद ओवरस्पीड पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया।
चालान बनाम नियंत्रण: व्यवस्था का विरोधाभास
शहर में यातायात व्यवस्था संभालने के नाम पर कार्रवाई का बड़ा हिस्सा चालान काटने तक सीमित दिखता है। गाड़ियों की वास्तविक गति की जांच, स्पीड कंट्रोल, संवेदनशील इलाकों में सख्त निगरानी—इन बिंदुओं पर ठोस हस्तक्षेप कम नजर आता है। नतीजा यह है कि शहर के भीतर, खासकर रात के समय, वाहन 70–80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ते दिखते हैं। इसका खामियाजा कभी खुद तेज रफ्तार वाहन चालक भुगतते हैं, तो कभी सड़क पर चलने वाले आम नागरिक।
शहर के भीतर दौड़ती मौत: भारी वाहन और बाईपास की अनदेखी
ट्रैफिक का दबाव कम करने और सुरक्षित आवागमन के लिए शहर के चारों ओर बाईपास सड़कें बनाई गई हैं। इसके बावजूद शहर के भीतर दिन और रात दोनों समय हाईवा, मेटाडोर, ट्रैक्टर, जेसीबी और क्रेन जैसे भारी वाहन बेखौफ दौड़ते दिखते हैं। ये वाहन अक्सर ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी में भी गुजरते रहते हैं, लेकिन कार्रवाई के उदाहरण कम सामने आते हैं।
गुरुवार रात की दुर्घटना इसी तस्वीर का हिस्सा बनकर सामने आई—रात साढ़े ग्यारह बजे शहर के व्यस्ततम मार्ग पर हाइवा की टक्कर से दो युवाओं की जान चली गई, जबकि उस समय भी सड़कों पर आवाजाही बनी हुई थी।
अवैध रेत परिवहन और प्रशासनिक नजरअंदाजी
शहर में फिलहाल किसी भी रेत घाट को आधिकारिक स्वीकृति नहीं मिली है। इसके बावजूद दिनभर रेत से भरे ट्रैक्टर खुलेआम और रात में चोरी-छिपे हाईवा की आवाजाही जारी है। जिन अधिकारियों की नजर इन पर पड़नी चाहिए, वही नजरअंदाज करते दिखते हैं। यह स्थिति सड़क सुरक्षा के साथ-साथ कानून के पालन पर भी सवाल खड़े करती है।
खत्म होता कानून का डर
भारी वाहन चालकों में कानून का डर खत्म होता नजर आ रहा है, खासकर रात के समय। शहर के भीतर निर्धारित गति, मार्ग और समय का पालन—इन बातों से उनका कोई सरोकार नहीं दिखता। अचानक सामने किसी छोटे वाहन, पैदल व्यक्ति या जानवर के आ जाने पर नियंत्रण न रहना और सीधे टक्कर—ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं।
स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम: चालान तक सीमित तकनीक
बिलासपुर का ट्रैफिक सिस्टम तकनीकी रूप से ‘स्मार्ट’ हो चुका है। कैमरों के जरिए वाहन की स्कैनिंग, नंबर के आधार पर जानकारी जुटाना और मोबाइल पर तत्काल चालान भेजना—यह सब हो रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह स्मार्टनेस केवल चालान भेजने तक ही सीमित है। गैर-निर्धारित समय पर शहर में घुसने वाले, ओवरलोड या ओवरस्पीड भारी वाहनों की पहचान कर उन्हें तत्काल रोकने और थाने में खड़ा करने की तस्वीरें कम नजर आती हैं।
चिंता के बीच जारी हादसे


यातायात जागरूकता सप्ताह के दौरान अपीलें, पोस्टर, सोशल मीडिया संदेश और बैठकों का दौर जारी है। जिला स्तर के उच्च अधिकारी भी सड़क सुरक्षा को लेकर चिंता जता चुके हैं। इसके बावजूद हादसों की कड़ी नहीं टूट रही। बिलासपुर की सड़कों पर रफ्तार, नशा, भारी वाहन और कमजोर नियंत्रण—इन सबके बीच हर गुजरता दिन नए सवाल छोड़ता जा रहा है।

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