बिलासपुर। मोहम्मद इसराइल
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम बदलकर V.B.G.RAM.G. किए जाने को लेकर देश की राजनीति में भूचाल आ गया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व उप मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टीएस सिंहदेव (बाबा) ने मोदी सरकार पर अब तक का सबसे आक्रामक हमला बोलते हुए इसे श्रमिक विरोधी साजिश, गांधीवादी सोच का अंत और गरीबों से काम का अधिकार छीनने की सुनियोजित कोशिश करार दिया है। सिंहदेव ने आरोप लगाया कि सरकार ने ‘सुधार’ के नाम पर लोकसभा में एक और बिल पास कर दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी स्कीम को कानून से योजना में बदलकर खत्म कर दिया है।


बिलासपुर स्थित कांग्रेस भवन में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए
टीएस सिंहदेव ने साफ शब्दों में कहा कि V.B.G.RAM.G. में न भगवान राम हैं और न ही महात्मा गांधी। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ गांधीजी को योजनाओं और विचारधारा से योजनाबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ राम के नाम का राजनीतिक इस्तेमाल कर जनता को गुमराह किया जा रहा है। सिंहदेव ने कहा कि यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं, बल्कि अधिकारों के कत्लेआम का दस्तावेज है।
सिंहदेव के अनुसार, मनरेगा अब तक संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़े ‘काम के अधिकार’ पर आधारित कानून था, जिसमें मजदूर अधिकारपूर्वक काम की मांग कर सकता था। नया फ्रेमवर्क इसे एक कंडीशनल, केंद्र-नियंत्रित स्कीम में बदल देता है, जहां काम देना सरकार की मर्जी पर निर्भर होगा। उन्होंने कहा कि यह बदलाव गांधीजी के ग्राम स्वराज, काम की गरिमा और विकेंद्रीकृत विकास की अवधारणा पर सीधा हमला है।
उन्होंने कहा कि मनरेगा दो दशकों से करोड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए लाइफलाइन रहा है, जिसने कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान गरीबों को आर्थिक सुरक्षा दी। अब उसी योजना को खत्म करने की दिशा में सरकार ने निर्णायक कदम बढ़ा दिया है। सिंहदेव ने आरोप लगाया कि 12 करोड़ से ज्यादा मनरेगा मजदूरों के अधिकारों को बेरहमी से कुचला गया है।
कानून से योजना तक: अधिकारों की कटौती का आरोप
टीएस सिंहदेव ने कहा कि पहले मनरेगा एक केंद्रीय कानून था, जिसमें काम रोका नहीं जा सकता था और सरकारी आदेश से कभी रोजगार बंद नहीं हुआ। नया सिस्टम हर साल तय समय के लिए जबर्दस्ती रोजगार बंद करने की अनुमति देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब राज्य और केंद्र तय करेंगे कि गरीब कब कमाएगा और कब भूखा रहेगा।
फंड खत्म होने पर या फसल के मौसम में मजदूरों को महीनों तक काम से दूर रखा जा सकेगा, जो अब तक कानून के तहत संभव नहीं था।
फंडिंग पैटर्न पर बड़ा आरोप
सिंहदेव ने कहा कि अब तक मनरेगा में 90 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार देती थी, लेकिन नए ढांचे में केंद्र-राज्य हिस्सा 60:40 कर दिया गया है। इतना ही नहीं, पहले मैचिंग ग्रांट की व्यवस्था के तहत राज्य को पहले 50 प्रतिशत राशि जमा करनी होगी, तभी केंद्र पैसा जारी करेगा।
उन्होंने कहा कि राज्यों की वित्तीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है, और जैसे ही बजट का बोझ राज्यों पर डाला जाएगा, मनरेगा धीरे-धीरे दम तोड़ने लगेगी।
सिंहदेव का आरोप है कि मोदी सरकार अब राज्यों पर करीब 50 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डालना चाहती है और उन्हें 40 प्रतिशत खर्च उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यही वह रास्ता है जिससे आने वाले समय में मनरेगा स्कीम स्वतः बंद हो जाएगी।
100 से 125 दिन का दावा ‘चालाकी’ करार
मनरेगा के तहत 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन रोजगार देने के दावे को सिंहदेव ने राजनीतिक छलावा बताया। उन्होंने कहा कि पिछले 11 सालों में मोदी सरकार किसी भी साल 100 दिन का रोजगार नहीं दे पाई।
राष्ट्रीय औसत सिर्फ 38 दिन का रहा है। छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार आने के बाद राज्य के 70 प्रतिशत गांवों में अघोषित रूप से काम नहीं दिया जा रहा है।
‘राम’ के नाम पर राजनीति का आरोप
टीएस सिंहदेव ने कहा कि भाजपा एक बार फिर भगवान राम के नाम पर झूठ बोल रही है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि V.B.G.RAM.G. का फुल फॉर्म “विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन – ग्रामीण” है, जिसमें कहीं भी भगवान राम का संदर्भ नहीं है।
उनका कहना है कि यह नामकरण सिर्फ भावनाओं से खेलने और असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
आरोपों की धार
सिंहदेव ने कहा कि मनरेगा अब काम करने का अधिकार नहीं, बल्कि एक एडमिनिस्ट्रेटिव मदद बनाकर रख दी गई है, जो पूरी तरह से केंद्र सरकार की इच्छा पर निर्भर होगी।
उन्होंने इसे श्रमिक विरोधी, गरीब विरोधी और गांधीवादी मूल्यों के खिलाफ करार देते हुए कहा कि यह फैसला सीधे तौर पर देश के सबसे कमजोर वर्गों पर हमला है।



