
00 न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय
बिलासपुर। कोरबा जिले में एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में न्यायालय ने विवाह का झूठा वादा कर शारीरिक शोषण करने वाले आरोपी अशोक राजवाड़े को कठोर सजा सुनाई है। यह निर्णय केवल आरोपी को दंडित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में एक सख्त संदेश भी देता है कि महिलाओं के साथ छल और विश्वासघात को कानून कभी बर्दाश्त नहीं करेगा।
यह थी घटना
पीड़िता ने पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में बताया था कि आरोपी अशोक राजवाड़े ने उसे प्रेम और विवाह का झांसा देकर तीन वर्षों तक शारीरिक संबंध बनाए। आरोपी ने बिलासपुर लाकर एक नोटरी के माध्यम से इकरारनामा तैयार कर खुद को पीड़िता का पति बताया। हालांकि, बाद में पीड़िता को पता चला कि अशोक पहले से ही शादीशुदा है और उसकी एक पुत्री भी है। इसके अलावा, आरोपी ने पहले भी दो अन्य महिलाओं से विवाह कर उन्हें छोड़ दिया था। जब पीड़िता ने इस बारे में पूछताछ की तो आरोपी ने न केवल उसे धमकाया, बल्कि मारपीट भी की।
पुलिस कार्रवाई और जांच
पीड़िता की शिकायत के आधार पर पुलिस चौकी सीएसईबी, थाना कोतवाली, कोरबा में अपराध दर्ज किया गया। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(n), 417, 294 और 506 (b) के तहत मामला पंजीकृत किया गया। चूंकि पीड़िता अनुसूचित जाति की थी, इसलिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(5) भी जोड़ी गई।
विवेचना अधिकारी, तत्कालीन चौकी प्रभारी उप-निरीक्षक कृष्णा साहू ने मामले की गहन जांच की। जांच के दौरान, आरोपी की दोनों पूर्व पत्नियों के बयान दर्ज किए गए और उन्हें न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।
अदालत में सुनवाई:
इस मामले की सुनवाई विशेष न्यायालय (अजा/अजजा अत्याचार निवारण अधिनियम) कोरबा में हुई। अभियोजन पक्ष ने विशेष लोक अभियोजक कमलेश उपाध्याय के नेतृत्व में प्रभावी ढंग से सभी साक्ष्यों को प्रस्तुत किया।
आरोपी की दलीलें और न्यायालय का दृष्टिकोण:
अशोक राजवाड़े ने अदालत में यह दावा किया कि पीड़िता ने स्वेच्छा से उसके साथ संबंध बनाए थे और दोनों के बीच विवाह का इकरारनामा भी हुआ था। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। न्यायालय ने माना कि पीड़िता की सहमति छल और धोखाधड़ी के आधार पर प्राप्त की गई थी।
न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय:
विशेष न्यायालय ने आरोपी को दोषी मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(n), 417, 294 और 506 (b) के तहत आजीवन कारावास और ₹25,000 के जुर्माने की सजा सुनाई। साथ ही, अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(5) के तहत भी आजीवन कारावास और अतिरिक्त ₹25,000 का जुर्माना लगाया गया।
आरोपी का आपराधिक इतिहास:
आरोपी के पहले से दो महिलाओं से विवाह और उन्हें छोड़ देने की घटनाओं को अदालत ने गंभीर अपराध माना। इन पूर्व पत्नियों के बयान मामले में निर्णायक साबित हुए।
सहमति और धोखाधड़ी का मुद्दा:
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पीड़िता की सहमति केवल छल के कारण थी, इसलिए इसे स्वेच्छा से दी गई सहमति नहीं माना जा सकता।
पुलिस और अभियोजन की भूमिका:
विवेचना अधिकारी कृष्णा साहू और विशेष लोक अभियोजक कमलेश उपाध्याय ने प्रभावी जांच और पैरवी कर न्यायालय को यह विश्वास दिलाया कि आरोपी का अपराध गंभीर और पुनरावृत्ति वाला था।




