

छत्तीसगढ़ ने देश के दुर्लभ और संकटग्रस्त वन भैंसा संरक्षण को नई दिशा देने के लिए बड़ा कदम उठाया है। नवा रायपुर में आयोजित उच्च स्तरीय बैठक में वन्यजीव प्रबंधन की अब तक की रणनीति की समीक्षा करते हुए राज्य ने वन भैंसा की संख्या वृद्धि, प्रजनन, स्थानांतरण और सैटेलाइट-आधारित निगरानी प्रणाली जैसी हाई-टेक योजनाओं पर निर्णायक फैसले लिए। सबसे अहम—नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ और NTCA से मंजूरी तेजी से प्राप्त करने के लिए राज्य सरकार जल्द ही एक विशेष दल को दिल्ली भेज रही है, ताकि भारत की सबसे संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल वन भैंसा को संवर्धन का सुरक्षित भविष्य मिल सके।
रायपुर, बिलासपुर 27 नवम्बर 2025।
भारत की जैव-विविधता के लिए महत्वपूर्ण और अत्यंत संकटग्रस्त राजकीय पशु वन भैंसा के संरक्षण को लेकर छत्तीसगढ़ ने गुरुवार को नवा रायपुर स्थित आरण्य भवन में व्यापक और तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की। बैठक की अध्यक्षता प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एवं मुख्य वन्यजीव वार्डन अरुण कुमार पाण्डेय ने की, जिसमें वन्यजीव विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और वरिष्ठ अधिकारियों ने संरक्षण रणनीतियों पर विस्तृत चर्चा की।
संरक्षण मॉडल पर गहन समीक्षा, वैज्ञानिक रोडमैप तैयार
बैठक की शुरुआत राज्य में वन भैंसा की मौजूदा स्थिति, प्रजनन दर और भविष्य की चुनौतियों के गंभीर मूल्यांकन से हुई। श्री पाण्डेय ने साफ कहा कि वन भैंसा संरक्षण केवल एक विभागीय दायित्व नहीं बल्कि एक “इंटर-डिपार्टमेंटल मिशन” है, जिसमें वैज्ञानिक, फील्ड अधिकारी, टेक्निकल टीमें और राष्ट्रीय संस्थाओं का समन्वित प्रयास अनिवार्य है।
WTI के डॉ. आर.पी. मिश्रा ने प्रेज़ेंटेशन के माध्यम से बताया कि वन भैंसा देश का तीसरा सबसे बड़ा वन्यजीव है और इसकी शुद्ध नस्ल को संरक्षित करना एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है।
उदंती-सीतानदी और बारनवापारा बनेगा संरक्षण का हब
बैठक में यह जानकारी दी गई कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व और बारनवापारा अभयारण्य वन भैंसा के प्रजनन और संरक्षण के लिए बेहद अनुकूल हैं।
वर्तमान में बारनवापारा में 1 नर और 5 मादा वन भैंसे मौजूद हैं, जिनकी निरंतर वैज्ञानिक मॉनिटरिंग की जा रही है।
जियो-मैपिंग तकनीक के उपयोग से वन भैंसों की वास्तविक संख्या, मूवमेंट और शुद्ध नस्ल की पहचान की सटीकता बढ़ाने की तैयारी भी स्वीकृत हुई।
स्थानांतरण के लिए दिल्ली मिशन—अनुमतियाँ हासिल करने तेज़ी से कार्रवाई
वन भैंसा स्थानांतरण की प्रक्रिया को गति देने के लिए बैठक में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया—
राज्य सरकार नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ और NTCA से आवश्यक अनुमतियाँ हासिल करने हेतु एक विशेष दल को जल्द दिल्ली भेजेगी।
इसके साथ ही स्थानांतरण के दौरान वन भैंसों के स्वास्थ्य प्रबंधन को प्राथमिकता देते हुए दो चिकित्सकों को पूर्णकालिक तैनात किया जाएगा।
हाई-टेक मॉनिटरिंग—CZA से अनुमति लेकर जंगल सफारी में सैटेलाइट निगरानी
सेंट्रल जू अथॉरिटी (CZA) से अनुमति लेकर जंगल सफारी सहित अन्य क्षेत्रों में सैटेलाइट-आधारित निगरानी प्रणाली लागू करने का प्रस्ताव भी बैठक में रखा गया। इससे वन भैंसा मूवमेंट, स्वास्थ्य और सुरक्षा की तकनीकी निगरानी को नया आयाम मिलेगा।
काला हिरण संरक्षण पर बड़ी सफलता, विस्तार की योजना
बैठक में काला हिरण (Blackbuck) पुनर्स्थापन परियोजना पर भी चर्चा हुई।
50 वर्षों के बाद वर्ष 2018 में बारनवापारा अभयारण्य में शुरू की गई इस परियोजना ने उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं।
रेत व्यवस्था, जल निकासी प्रणाली, पोषण प्रबंधन और समर्पित सुरक्षा टीम तैनाती जैसे प्रयासों से आज बारनवापारा में लगभग 190 काले हिरण संरक्षित हैं।
राज्य सरकार इस मॉडल को अन्य अभयारण्यों में भी लागू करने की तैयारी कर रही है।
बैठक में शामिल रहे शीर्ष वैज्ञानिक और वन्यजीव विशेषज्ञ
इस महत्वपूर्ण बैठक में WTI, WII, कामधेनु विश्वविद्यालय, उदंती-सीतानदी व इंद्रावती टाइगर रिजर्व, कानन पेंडारी और जंगल सफारी से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने हिस्सा लिया, जिनमें शामिल थे—
श्री व्ही. माधेश्वरन, सुश्री सतीविशा समाजदार, धम्मशील गनवीर, श्री संदीप बलगा, डॉ. आर.पी. मिश्रा, डॉ. सम्राट मंडल, डॉ. विवश पांडेव, डॉ. राहुल कौल, डॉ. संदीप तिवारी, डॉ. कोमोलिका भट्टाचार्य, डॉ. जी.के. दत्ता, डॉ. जसमीत सिंह, श्री पी.के. चंदन, डॉ. जय किशोर जड़िया और अन्य अधिकारी।



