मोहम्मद इसराइल बबलू
बिलासपुर। धान खरीदी में अड़चनों की असली वजह अब साफ दिखने लगी है। किसानों के मुताबिक सबसे बड़ा जिम्मा जिला एवं सहकारी केंद्रीय बैंक और जिला विपणन विभाग की किलावारवाही का है, जिनकी सुस्ती, ग़लत प्लानिंग और गैर–जिम्मेदाराना रवैये ने पूरे जिले की खरीदी व्यवस्था को चरमराकर रख दिया है।
दफ्तरों में बैठकर फाइलें सरकती रहीं, मैदान में केंद्र सूने पड़े
कई केंद्रों में बारदाने समितियों की अलमारियों में बंद पड़े रहे लेकिन वितरण नहीं हुआ। तौल मशीनें और चबूतरे कई दिनों तक बिना सफाई धूल खाते रहे। बिजली-पानी, सुरक्षा, बैठने की जगह जैसे बुनियादी इंतजाम भी नहीं किए गए। किसानों का आरोप है कि विपणन विभाग और बैंक दोनों ने समन्वय ही नहीं बनाया—नतीजा, टोकन कटने की प्रक्रिया तक ठप।
हड़ताल का बहाना, कागज़ी मीटिंगें और ज़मीन पर ठहर गया अभियान
3 नवंबर से समिति प्रबंधकों और ऑपरेटरों की हड़ताल जारी है, मगर जिला सहकारी बैंक और जिला विपणन विभाग दोनों ने न तो वैकल्पिक व्यवस्था बनाई और न समाधान की ठोस कोशिशें दिखाईं। रायपुर में कागज़ी चर्चाएँ चलती रहीं, जबकि गांवों में किसान धान की रखवाली में रातें काटते रहे।
दौरे, निरीक्षण और दिखावटी सुधार — पर नतीजा वही: ठहराव
निरीक्षण की सूचनाएँ आते ही कुछ केंद्रों पर जल्दबाज़ी में टोकन कटे और थोड़ी बहुत खरीदी भी हुई, लेकिन जिले के 140 केंद्रों में से सिर्फ कुछ में ही गतिविधि दिखी। किसानों का कहना है कि बैंक और विपणन विभाग की ढीली तैयारी ने पूरे सीज़न को जोखिम में डाल दिया।
धान तैयार है, किसान तैयार है—पर दो विभागों की किलावारवाही ने खरीदी को इंतज़ार के दलदल में धकेल दिया है।



