मोहम्मद इसराइल बबलू
कभी कांग्रेस का अटूट किला माने जाने वाला बिलासपुर अब पार्टी के लिए सबसे कठिन ज़मीन बन गया है। लोकसभा से लेकर विधानसभा तक लगातार हार का सिलसिला कांग्रेस को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आखिर संगठन की पकड़ ढीली कहाँ पड़ी। संगठन सृजन अभियान के तहत अब बिलासपुर में नए चेहरे, नई जातीय समीकरण और पुराने गुटों की गांठें सुलझाने की कवायद शुरू हो चुकी है। सवाल यही है — क्या यह प्रयोग कांग्रेस को खोया हुआ गढ़ वापस दिला पाएगा?
बिलासपुर।
अभिभाजित बिलासपुर संभाग कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। मध्यप्रदेश के दौर में यह इलाका सत्ता के समीकरण तय करता था, लेकिन छत्तीसगढ़ बनने के बाद से कांग्रेस इस इलाके में लगातार जमीन खोती गई। बीते 20 सालों में बिलासपुर लोकसभा सीट कांग्रेस के हाथ से नहीं लौट सकी। शहर की प्रमुख विधानसभा सीट पर भी भाजपा का वर्चस्व लंबे समय तक कायम रहा — अमर अग्रवाल लगातार विधायक बने रहे, हालांकि 2018 में शैलेश पांडे की जीत से कांग्रेस को क्षणिक उम्मीद जरूर जगी थी। मगर ताज़ा चुनावों ने फिर वही संदेश दिया — बिलासपुर अब भी कांग्रेस के लिए ‘कठिन इलाका’ बना हुआ है।
अब पार्टी संगठन सृजन अभियान के ज़रिए एक बार फिर अपने गढ़ में “घर वापसी” की कोशिश में है। संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव की तैयारी है — शहर और ग्रामीण दोनों जिलाध्यक्षों की नई नियुक्ति, ब्लॉक स्तर पर फेरबदल और जातिगत समीकरणों पर सधी हुई रणनीति।
जातीय संतुलन और समीकरण की जंग
कांग्रेस में इस बार संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर जातिगत संतुलन पर ज़ोर है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक शहर कांग्रेस अध्यक्ष पद सामान्य वर्ग से — विशेष रूप से ब्राह्मण समाज से — जबकि ग्रामीण अध्यक्ष पद ओबीसी वर्ग से तय माना जा रहा है। सूची किसी भी वक्त जारी हो सकती है।
शहर अध्यक्ष पद के लिए सिद्धांशु मिश्रा, महेश दुबे, शैलेश पांडे और राजकुमार तिवारी जैसे नाम चर्चा में हैं। वहीं, यदि ओबीसी वर्ग से चयन हुआ तो विनोद साहू और पूर्व पार्षद शैलेंद्र जायसवाल प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं। ग्रामीण इकाई के लिए सामान्य वर्ग से आशीष सिंह, राजेंद्र शुक्ला, आदित्य दीक्षित और संदीप शुक्ला, जबकि ओबीसी वर्ग से लक्ष्मीनाथ साहू और राजेंद्र साहू के नाम सामने हैं। इसके अलावा कुर्मी समाज से प्रमोद नायक, महिला वर्ग से गीतांजलि कौशिक, जगदीश कौशिक, नीरज जायसवाल और राजेंद्र धीवर भी दौड़ में शामिल बताए जा रहे हैं।
एससी वर्ग से प्रेमचंद जायसी और मस्तूरी विधायक दिलीप लहरिया के नामों पर भी चर्चा जारी है। कुल मिलाकर, दो पदों के लिए बीस से अधिक दावेदारों की होड़ ने संगठन के भीतर सक्रियता और सियासी ताप दोनों बढ़ा दिए हैं।
उमंग सिंघार का बिलासपुर दौरा और बंद कमरे की बैठकें
मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को इस बार पर्यवेक्षक बनाकर बिलासपुर भेजा गया था। वे तीन दिन तक शहर में रहे और शहर व ग्रामीण संगठन के संभावित चेहरों से बंद कमरे में चर्चा की। उनके समक्ष नेताओं ने अपनी दावेदारी पेश की, स्थानीय समीकरण और पिछले चुनावों की गणित समझाई। सूत्र बताते हैं कि सिंघार ने कई नए नामों को लेकर दिल्ली को रिपोर्ट भेजी है, जिनमें कुछ चौंकाने वाले चेहरे भी शामिल हैं।
विजय केशरवानी का रिकॉर्ड और संगठन का नया मोड़
मौजूदा जिलाध्यक्ष विजय केशरवानी ने सात साल आठ महीने का कार्यकाल पूरा कर रिकॉर्ड बनाया है। भूपेश बघेल सरकार के समय उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उनके कार्यकाल में कांग्रेस ने कई आंदोलन किए — जिनमें सबसे उल्लेखनीय रेल रोको आंदोलन था, जहाँ उन्होंने कोटा में ट्रेनें रोककर संगठन को चर्चा में ला दिया था। अब पार्टी एक नए अध्याय की तैयारी में है, जो पुराने संघर्ष और नए नेतृत्व के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेगा।
गढ़ वापसी की चुनौती और कांग्रेस की परीक्षा
बिलासपुर की कांग्रेस आज दोहरी चुनौती से गुजर रही है — एक तरफ गुटबाजी और जातीय खींचतान, दूसरी तरफ भाजपा का मजबूत संगठनात्मक ढांचा। दिल्ली से लेकर रायपुर तक यह माना जा रहा है कि बिलासपुर में कांग्रेस को अब “चेहरा” नहीं बल्कि “टीम” की ज़रूरत है — ऐसा नेतृत्व जो जातिगत समीकरणों में भी फिट बैठे और जीत दिलाने की क्षमता भी रखे।
संगठन सृजन अभियान इस दिशा में कांग्रेस की सबसे बड़ी कोशिश है। लेकिन यह प्रयोग कितना असरदार साबित होगा, यह आने वाले महीनों की राजनीतिक तस्वीर तय करेगी।
क्या कांग्रेस बिलासपुर में फिर से अपना गढ़ वापस पा सकेगी, या फिर यह खोज एक और समीकरण तक सीमित रह जाएगी — यही सवाल अब प्रदेश की सियासत में सबसे बड़ा रह गया है।



