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रेल हादसा : जब ‘लाइट, कैमरा, एक्शन’ बन गया राहत अभियान — राजनीति के साये में कराहते रहे घायल

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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बिलासपुर | मोहम्मद इसराइल बबलूरेल हादसे के बाद अस्पतालों में दर्द का सैलाब है, लेकिन बाहर फ्लैश लाइटें हैं — नेता हैं, कैमरे हैं, और बयानबाज़ी का शोर है। सवाल बस एक — क्या इन लाइटों के नीचे इंसाफ़ भी मिलेगा या फिर यह सब “एक और हादसे” की पटकथा बनकर रह जाएगा?

बिलासपुर के लाल खदान के पास हुए भयावह रेल हादसे में 11 यात्रियों की मौत और 20 से ज़्यादा घायल हुए। शहर के सिम्स, अपोलो, रेलवे और अरपा मेड सिटी अस्पतालों में घायलों का इलाज जारी है। इसी बीच उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने  चारों अस्पतालों का दौरा किया, डॉक्टरों को बेहतर इलाज के निर्देश दिए और घायलों को हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया। उनके साथ महापौर पूजा विधानी, कलेक्टर संजय अग्रवाल, एसपी रजनेश सिंह, सिम्स डीन रमनेश मूर्ति, और नगर निगम आयुक्त अमित कुमार मौजूद थे।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि पीड़ित परिवार अभी भी मुआवजे और राहत की अस्पष्ट घोषणाओं में उलझे हैं — न इलाज पूरी तरह मुफ़्त, न भविष्य की गारंटी।

कांग्रेस का हमला — “रेलवे की सबसे बड़ी कमाई छत्तीसगढ़ से, लेकिन सुरक्षा सबसे कमजोर!”

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज और नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत ने बिलासपुर पहुंचकर घायलों से मुलाकात की और रेल प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा —

“यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, केंद्र सरकार की उपेक्षा का नतीजा है। जब देशभर में ‘कवच’ सिग्नल तकनीक लगाई जा रही है, तो छत्तीसगढ़ के ट्रैक पर क्यों नहीं?”

दीपक बैज ने मृतकों के लिए 1 करोड़ रुपये और घायलों के लिए 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की।
उन्होंने खुलासा किया कि बिलासपुर जोन से रेलवे हर साल 25,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा राजस्व कमाता है, लेकिन यहां के 600 किलोमीटर अप-डाउन ट्रैक पर “कवच सुरक्षा प्रणाली” का प्रस्ताव मई 2024 से केंद्र सरकार के पास लंबित है।

उन्होंने भाजपा के सांसदों को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा —

“छत्तीसगढ़ से 10 सांसद चुने गए, लेकिन किसी ने संसद में आवाज़ नहीं उठाई। बिलासपुर के सांसद तोखन साहू मंत्री हैं — अगर छत्तीसगढ़ के रेल यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते तो पद छोड़ दें।”

‘कवच’ तकनीक पर उठे सवाल — सुरक्षा कब मिलेगी?

कांग्रेस ने यह भी पूछा कि जब ऑटो ब्रेकिंग सुरक्षा प्रणाली देश के कई जोनों में लग चुकी है, तो छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं?
रेलवे दावा करता है कि इस तकनीक से ट्रेनों के बीच 400 मीटर की दूरी पर ही ऑटोमेटिक ब्रेक लग जाता है, जिससे टक्कर असंभव हो जाती है।
फिर भी बिलासपुर जोन, जो देश की कमाई का सबसे बड़ा स्रोत है, सुरक्षा के सबसे निचले पायदान पर है।

राजनीति बनाम पीड़ा — जनता के जख्मों पर तस्वीरों की चमक

हादसे के बाद नेताओं के दौरे तेज़ हैं, पर सवाल वही —
क्या यह संवेदना है या कैमरों के लिए मंचन?
क्या पीड़ितों के परिजन इस बार भरोसा करें कि उन्हें न्याय मिलेगा,
या कुछ दिनों बाद यह भी वही कहानी बन जाएगी —
“जांच जारी है, दोषी चिन्हित होंगे…”

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