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बिलासपुर रेल हादसा : सिस्टम फेल पर बलि का बकरा बना एक ड्राइवर?

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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00 बिलासपुर पुलिस की एफआईआर स्पीड भी हाई, जांच होगी कह रहे अफसर

मोहम्मद इसराइल बबलू | बिलासपुर
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर रेल हादसे के बाद पूरा रेलवे तंत्र मानो एक “बलि का बकरा” तलाशने में जुट गया है। हादसे में जान गंवाने वाले लोको पायलट विद्या सागर अब जिंदा नहीं हैं, लेकिन उन पर ही पूरा दोष मढ़ने की प्रक्रिया इतनी तेज़ी से चली कि पुलिस ने बिना देर किए गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज कर दिया।


पर बड़ा सवाल यही है —
क्या असली अपराधी एक मृत ड्राइवर है,
या फिर वह रेलवे सिस्टम, जो सालाना 27 हजार करोड़ की कमाई के बावजूद अपने कर्मचारियों को सुरक्षा और तकनीक दोनों से वंचित रखता है?
76 किमी की रफ्तार, रेड सिग्नल, और सेकंडों में मौत का मंजर
4 नवंबर की दोपहर, बिलासपुर स्टेशन से कुछ किलोमीटर पहले, गेवरा-बिलासपुर मेमू ट्रेन 76 किमी की रफ्तार से बढ़ रही थी।
रेलवे की प्रारंभिक रिपोर्ट में कहा गया —
“लोको पायलट ने रेड सिग्नल पार किया और ट्रेन मालगाड़ी से टकरा गई।”
यही लाइन पूरे सिस्टम को “क्लीन चिट” दिलाने का आधार बन गई।
पर रिपोर्ट की गहराई में जाएं तो कहानी कुछ और कहती है —
जिस स्थान पर हादसा हुआ, वहां कर्व (घुमाव) था।
इस रूट पर हाल ही में 2 से बढ़ाकर 4 लाइनें की गई हैं, और अब 4 की जगह 16 अलग-अलग सिग्नल लगे हैं।
एलआरएसए (लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन) ने महीनों पहले सिग्नल भ्रम की शिकायत लिखित में दी थी,
मगर रेलवे प्रबंधन ने सिर्फ फाइल आगे बढ़ाई, समाधान नहीं।
सिस्टम फेल, इंसान दोषी घोषित — यही है भारतीय रेलवे की परंपरा
विद्या सागर को महज़ एक महीने पहले ही पैसेंजर ट्रेन का जिम्मा सौंपा गया था।
इससे पहले वे मालगाड़ी चलाते थे।
उन्हें न नई लाइन की ट्रेनिंग दी गई, न नए सिग्नल सिस्टम की।
लेकिन हादसे के बाद पहला कदम क्या हुआ?
“ड्राइवर के खिलाफ एफआईआर।”


रेलवे एक्ट और आईपीसी की धाराओं में मृत व्यक्ति को आरोपी बना देना शायद दुनिया की सबसे क्रूर नौकरशाही प्रक्रिया है।
रेल प्रशासन के लिए यह आसान है —
सवाल उठाने वालों को चुप कर दो, फाइल में ‘मानव त्रुटि’ लिख दो, और केस बंद।
महिला असिस्टेंट लोको पायलट रश्मि राज — जिंदा सबूत, पर अब वही जांच के घेरे में
इस हादसे में गंभीर रूप से घायल महिला सहायक लोको पायलट रश्मि राज अब भी अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रही हैं।
लेकिन रेलवे प्रशासन ने उन्हें भी CRS जांच में तलब किया है।
वह इस हादसे की प्रत्यक्ष गवाह हैं,
पर उनसे जवाब मांगने वाला सिस्टम भूल गया कि शायद उन्हें जवाब चाहिए था — सुरक्षा के नाम पर क्या इंतज़ाम किए गए थे?
सिग्नल पास्ड एट डेंजर (SPAD): तकनीकी टर्म, पर असल में रेलवे की पुरानी बीमारी
रेलवे की हर बड़ी दुर्घटना में एक शब्द बार-बार आता है — SPAD (Signal Passed At Danger)
यानी ट्रेन ने लाल सिग्नल पार कर लिया।
लेकिन कभी किसी ने पूछा कि सिग्नल कैब में दिखा ही नहीं, या लाइन बदलने के बाद पुराना सिग्नल रह गया था,
तो जिम्मेदारी कौन लेगा?
बिलासपुर हादसे में भी यही हुआ।
रेलवे की अपनी तकनीकी खामियां, अधूरी मॉडर्नाइजेशन, और गलत सिग्नल सिस्टम ने यह दुर्घटना रची,
मगर रिपोर्ट में दोषी सिर्फ एक नाम — “लोको पायलट।”
रेलवे जांच बनाम सच्चाई — 19 अधिकारियों की तलब, पर निशाना अब भी नीचे की पंक्ति
कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (CRS) बृजेश कुमार मिश्र की टीम ने 19 अधिकारियों-कर्मचारियों को तलब किया है।
इसमें सिग्नल इंजीनियर, सेक्शन कंट्रोलर, स्टेशन मास्टर, यहां तक कि घायल लोको पायलट भी शामिल हैं।
पूछताछ 6 और 7 नवंबर को DRM ऑफिस बिलासपुर में होगी।
पर सवाल वही —
क्या इस जांच से कभी ज़ोनल मैनेजर या सिग्नल प्लानिंग विभाग की जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर फिर एक बार किसी लोको पायलट की डायरी से ‘क्लोजिंग नोट’ मिल जाएगा और फाइल बंद हो जाएगी?
रेलवे सिस्टम: कमाई अरबों की, मगर सुरक्षा “भगवान भरोसे”
बिलासपुर जोन भारतीय रेलवे के सबसे मुनाफे वाले जोनों में से है —
सालाना 27,000 करोड़ रुपए की कमाई,
लेकिन लोको कैब में अब भी पुराने कंट्रोल स्विच, मैनुअल सिग्नल रीडिंग और फॉल्ट मॉनिटरिंग के नाम पर नोटबुक।
वहां न ऑटोमेटिक ट्रेन प्रोटेक्शन है, न कैब सिग्नल सिस्टम।
जब तक यह तकनीकी सुधार धरातल पर नहीं उतरेंगे,
तब तक हर बार कोई “विद्या सागर” ही मरेगा, और सिस्टम बच निकलेगा।
सवाल बाकी है…
रेलवे के लिए यह हादसा एक और केस फाइल भर है,
लेकिन देश के लिए यह सवाल है —
“क्या हम हर बार उसी पैटर्न पर जांच चलाकर, उसी सिस्टम को क्लीन चिट देकर,
किसी और विद्या सागर की मौत का इंतजार कर रहे हैं?”

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