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धान खरीदी कर्मचारी छुट्टी के दिन भी आंदोलन पर, चार सूत्रीय मांगों पर अड़े कर्मचारी बोले — नहीं मानी मांगे तो धान खरीदी का करेंगे बहिष्कार

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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मोहम्मद इसराइल बबलू

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बिलासपुर।छत्तीसगढ़ में धान खरीदी सीजन शुरू होने से पहले ही आंदोलन की आंच तेज हो गई है। छत्तीसगढ़ सहकारी समिति कर्मचारी महासंघ और छत्तीसगढ़ समर्थन मूल्य धान खरीदी ऑपरेटर संघ के हजारों कर्मचारियों ने बुधवार को बिलासपुर के कोन्हेर गार्डन में जमकर प्रदर्शन किया। कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दी — “जब तक चार सूत्रीय मांगों पर सरकार कैबिनेट से निर्णय नहीं लेती, तब तक हम धान खरीदी का बहिष्कार करेंगे और अनिश्चितकालीन आंदोलन जारी रहेगा।”चार सूत्रीय मांगें — किसानों से जुड़ी व्यवस्था में सुधार और कर्मचारियों के हक की लड़ाई“हम किसानों की रीढ़ हैं, मगर हमारे ही अधिकार कुचले जा रहे हैं” — प्रदेश अध्यक्ष की चेतावनीपूर्व की बैठकों के बाद भी ठोस कदम नहीं: अब सड़क से कैबिनेट तक लड़ी जाएगी लड़ाईआंदोलन की रूपरेखा — चरणबद्ध तरीके से पूरे प्रदेश में उबालसरकार के लिए बढ़ी मुश्किलें — खरीदी सीजन से पहले आंदोलन ने बढ़ाई टेंशन

बिलासपुर।छत्तीसगढ़ में धान खरीदी सीजन शुरू होने से पहले ही आंदोलन की आंच तेज हो गई है। छत्तीसगढ़ सहकारी समिति कर्मचारी महासंघ और छत्तीसगढ़ समर्थन मूल्य धान खरीदी ऑपरेटर संघ के हजारों कर्मचारियों ने बुधवार को बिलासपुर के कोन्हेर गार्डन में जमकर प्रदर्शन किया। कर्मचारियों ने साफ चेतावनी दी — “जब तक चार सूत्रीय मांगों पर सरकार कैबिनेट से निर्णय नहीं लेती, तब तक हम धान खरीदी का बहिष्कार करेंगे और अनिश्चितकालीन आंदोलन जारी रहेगा।”

आंदोलनकारी कर्मचारियों ने छुट्टी के दिन भी पूरे उत्साह और आक्रोश के साथ रैली निकाली, नारेबाजी की और सरकार को खुली चुनौती दी कि “अब आश्वासन नहीं, निर्णय चाहिए।”


चार सूत्रीय मांगें — किसानों से जुड़ी व्यवस्था में सुधार और कर्मचारियों के हक की लड़ाई

कर्मचारियों का कहना है कि वे वर्षों से धान खरीदी में अहम भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी लंबित मांगों को लगातार नजरअंदाज कर रही है।
संघों ने जिन चार सूत्रीय मांगों पर आंदोलन छेड़ा है, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  1. धान परिवहन और सुखत राशि का पूरा भुगतान – वर्ष 2023-24 और 2024-25 की खरीदी में समितियों को सुखत, सुरक्षा और कमीशन राशि का पूरा भुगतान किया जाए।
  2. आउटसोर्सिंग नीति समाप्त कर नियमितिकरण – 18 साल से लगातार कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों को नियमित किया जाए और आउटसोर्सिंग की व्यवस्था समाप्त की जाए।
  3. सहकारी समितियों को प्रबंधकीय अनुदान – प्रदेश की 2068 समितियों को मध्यप्रदेश की तरह प्रति वर्ष ₹3 लाख का अनुदान दिया जाए, ताकि कर्मचारियों को समय पर वेतन मिल सके।
  4. कांडे कमेटी की अनुशंसाओं का तत्काल क्रियान्वयन – भविष्य निधि, ईएसआईसी, महंगाई भत्ता और भर्ती में प्राथमिकता जैसी सुविधाएं लागू की जाएं।

“हम किसानों की रीढ़ हैं, मगर हमारे ही अधिकार कुचले जा रहे हैं” — प्रदेश अध्यक्ष की चेतावनी

प्रदेश अध्यक्ष ने आंदोलन स्थल पर कहा,

“हम वही लोग हैं जो हर साल किसानों से धान तौलकर सरकार तक पहुंचाते हैं। लेकिन हमारी मेहनत का सम्मान नहीं हो रहा। वेतन समय पर नहीं मिलता, सुविधाएं नहीं दी जातीं, और ऊपर से आउटसोर्सिंग थोप दी गई है। अगर यही हाल रहा तो इस बार धान खरीदी केंद्रों पर ताले लटकेंगे।”

उन्होंने आरोप लगाया कि मार्कफेड और मिलर्स की मिलीभगत से सुखत राशि समितियों तक नहीं पहुंचती, जिससे समितियों पर आर्थिक संकट गहराता जा रहा है।


पूर्व की बैठकों के बाद भी ठोस कदम नहीं: अब सड़क से कैबिनेट तक लड़ी जाएगी लड़ाई

कर्मचारियों ने याद दिलाया कि नवंबर 2024 में हुई कोर कमेटी की बैठक और दिसंबर 2024 में खाद्य विभाग द्वारा जारी पत्रों के बावजूद कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। 12 दिसंबर 2024 और 25 फरवरी 2025 को शासन स्तर पर लिखे गए पत्र आज तक अमल में नहीं आए।

संघ ने साफ कहा कि “अब सिर्फ बैठकों और पत्राचार का दौर खत्म — इस बार परिणाम चाहिए।”


आंदोलन की रूपरेखा — चरणबद्ध तरीके से पूरे प्रदेश में उबाल

  1. 24 अक्टूबर 2025: सभी 33 जिलों में जिला मुख्यालय स्तर पर ज्ञापन रैली।
  2. 28 अक्टूबर 2025: रायपुर में प्रदेश स्तरीय महा हुंकार रैली
  3. 3 नवंबर से 11 नवंबर: संभाग स्तर पर अनिश्चितकालीन आंदोलन।
  4. 12 नवंबर से आगे: जब तक चार सूत्रीय मांगों पर कैबिनेट से निर्णय नहीं आता, आंदोलन जारी रहेगा।

सरकार के लिए बढ़ी मुश्किलें — खरीदी सीजन से पहले आंदोलन ने बढ़ाई टेंशन

धान खरीदी के पहले ही कर्मचारियों के सड़क पर उतर आने से शासन-प्रशासन की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अगर यह आंदोलन लंबा खिंचता है तो किसानों से धान खरीदी प्रभावित होना तय है।

सरकार की महत्वाकांक्षी योजना “सहकार से समृद्धि” इस समय कर्मचारियों की नाराजगी के बीच डांवाडोल होती दिख रही है।


संक्षेप में:
यह सिर्फ कर्मचारियों की मांग नहीं, बल्कि उस प्रणाली का प्रश्न है जिसके भरोसे हर साल करोड़ों क्विंटल धान खरीदा जाता है। सवाल अब यही है —

क्या सरकार समय रहते यह आवाज सुनेगी, या फिर इस बार आंदोलन के शोर में खरीदी व्यवस्था की नींव हिल जाएगी?

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