मोहम्मद इसराइल बबलू, बिलासपुर, रायपुर।
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयू) एक बार फिर रहस्यमयी हालात में हुई मौत से दहल गया है। विश्वविद्यालय के बॉटनी विभाग के प्रोफेसर डॉ. नरेंद्र कुमार मिश्रा मंगलवार सुबह अपने क्वार्टर में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए। वे वर्ष 2022 से सेंट्रल यूनिवर्सिटी में पदस्थ थे और अकेले ही विश्वविद्यालय कैंपस के आवासीय परिसर में रहते थे।


15 दिन पहले इसी यूनिवर्सिटी में बीएससी फिजिक्स के छात्र अर्सलान अंसारी की मौत का रहस्य अब तक नहीं सुलझा था कि एक और मौत ने सीयू को फिर से सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।
सुबह कराहने की आवाज से खुला कमरा, अंदर गिरा मिला शरीर
मंगलवार सुबह करीब 6 बजे फिजिक्स विभाग के डीन डॉ. एच.एस. तिवारी टहलने निकले थे। इसी दौरान उन्होंने प्रो. मिश्रा के क्वार्टर से कराहने की आवाज सुनी। आवाज लगातार आती रही तो उन्होंने तत्काल गार्ड प्रभारी बाबूराम खत्री को सूचना दी।
दरवाजा अंदर से बंद था। खिड़की का शीशा तोड़कर सिटकिनी खोली गई तो प्रो. मिश्रा फर्श पर गिरे मिले। उस वक्त वे जीवित थे, लेकिन बेहद कमजोर हालत में। गार्ड ने उनसे बात करने की कोशिश की, पर उनकी आवाज साफ नहीं निकल पा रही थी। तुरंत विश्वविद्यालय प्रबंधन को सूचना दी गई।
एंबुलेंस में न स्ट्रेचर, न ऑक्सीजन — रास्ते में दम तोड़ा
सुबह करीब 7 बजे एंबुलेंस पहुंची, लेकिन उसमें न तो स्ट्रेचर था और न ही ऑक्सीजन सिलेंडर। गार्ड बाबूराम खत्री और कर्मचारी बृजेश किसी तरह उन्हें बैठाकर सिम्स अस्पताल ले गए।
अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उन्हें ‘ब्रॉट डेड’ घोषित कर दिया।
सीयू के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी डॉ. सर्वेश गौरहा ने बताया कि उन्हें हाल ही में लूज मोशन और दांत दर्द की शिकायत थी, जिसके लिए सामान्य दवा दी गई थी।
घरवालों ने जताया शक, बोले – रात में बात हुई थी, सब ठीक था
प्रो. मिश्रा के पुत्र अवनीश मिश्रा और परिजन शाम को बिलासपुर पहुंचे। अवनीश ने बताया, “रात में पापा से फोन पर बात हुई थी। वे पूरी तरह ठीक थे। ये घटना बेहद संदिग्ध लग रही है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही सच्चाई सामने आएगी।”
परिवार के आने तक पोस्टमार्टम नहीं किया गया था। रात 9 बजे तक शव मरच्यूरी में रखा गया था।
संवेदनहीनता: न कुलपति पहुंचे, न कुलसचिव
प्रोफेसर की मौत की खबर के बाद भी विश्वविद्यालय के कुलपति और कुलसचिव देर रात तक अस्पताल या मौके पर नहीं पहुंचे।
कैंपस में बुजुर्ग शिक्षकों के सम्मान में एक कार्यक्रम पहले से चल रहा था, जिसे प्रशासन ने रद्द भी नहीं किया।
विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और छात्रों ने इसे “संवेदनहीन रवैया” बताया।
विभागाध्यक्ष पद को लेकर था विवाद, तनाव में थे प्रो. मिश्रा?
बॉटनी विभाग में हाल ही में विभागाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर विवाद हुआ था। प्रो. मिश्रा विभाग के वरिष्ठ प्राध्यापकों में पांचवें स्थान पर थे।
सूत्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय के उच्चाधिकारियों ने उनसे लिखित में विभागाध्यक्ष पद स्वीकार नहीं करने का पत्र ले लिया था और उनकी जगह डॉ. सुधीर कुमार पांडेय को विभागाध्यक्ष बनाया गया था।
कुछ सहयोगियों का कहना है कि इस निर्णय के बाद प्रो. मिश्रा मानसिक तनाव में थे।
हालांकि, विभागाध्यक्ष डॉ. पांडेय ने कहा कि “उन्होंने कोई पत्र लिखा था या नहीं, इसकी मुझे जानकारी नहीं है।”
छात्र की मौत का रहस्य अब तक नहीं सुलझा
15 दिन पहले इसी विश्वविद्यालय में फिजिक्स विभाग के छात्र अर्सलान अंसारी की संदिग्ध मौत हुई थी। उसकी लाश विश्वविद्यालय परिसर के तालाब में मिली थी।
उस घटना में अब तक न एफआईआर दर्ज हुई है और न ही पुलिस जांच पूरी हो सकी है।
विश्वविद्यालय ने केवल दिखावे के लिए हाउसकीपिंग के दो कर्मियों पर कार्रवाई की थी, जबकि हॉस्टल वार्डन को अब तक नहीं हटाया गया है।
दो सप्ताह में यह दूसरी मौत होने से अब छात्र और शिक्षक संगठन विश्वविद्यालय प्रशासन पर “छिपाने और टालने” का आरोप लगा रहे हैं।
कैंपस में बढ़ रहा डर और असमंजस
दो मौतों के बाद विश्वविद्यालय का माहौल दहशत में है। शिक्षकों में चिंता और छात्रों में असुरक्षा की भावना फैल गई है।
कई छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और पारदर्शी जांच प्रणाली की मांग उठाई है।
अभी तक जांच अधूरी, सवाल अनुत्तरित
प्रो. मिश्रा के मौत की जांच पुलिस ने शुरू कर दी है, लेकिन न तो कारण स्पष्ट हुआ है और न ही रिपोर्ट जारी हुई है।
विश्वविद्यालय प्रबंधन ने बयान जारी कर कहा है कि उन्हें तबीयत खराब होने की सूचना मिली थी और वे अस्पताल भेजे गए।
लेकिन परिजनों और सहयोगियों का दावा है कि इस पूरी घटना में प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था की घोर लापरवाही हुई है।
15 दिन, दो मौतें, कई सवाल
गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी अब लगातार दूसरी रहस्यमयी मौत से शोक, डर और अविश्वास के साये में है।
एक छात्र और अब एक प्राध्यापक की मौत के बीच सिर्फ पंद्रह दिन का फासला है, पर दोनों घटनाओं की सच्चाई अब तक धुंध में है।
विश्वविद्यालय की दीवारों के भीतर उठ रहे सवाल हैं —
“क्या ये सिर्फ संयोग है, या व्यवस्था में कुछ ऐसा है जो छिपाया जा रहा है?



