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रेल मंत्री जी सुनिए… इस्तीफा मत दीजिए पर छत्तीसगढ़ की जनता के सवालों का जवाब तो दीजिए…

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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मोहम्मद इसराइल बबलू

रेल की पटरियों पर एक बार फिर लहू बहा — सवाल वही, जवाब अब तक नहीं। बिलासपुर हादसे ने देश की रेल सुरक्षा की पोल खोल दी है। करोड़ों की कमाई करने वाला जोन, पर एक “कवच” तक नहीं! आखिर 11 निर्दोष यात्रियों की जान का जिम्मेदार कौन है? सिग्नल फेल हुआ या सिस्टम? अफसर सोए थे या तकनीक? कब तक हर हादसे के बाद बयानबाज़ी और जांच कमेटियों का नाटक चलेगा? क्या किसी बड़े अधिकारी की कुर्सी हिलेगी या फिर यह भी “एक और दुर्घटना” बनकर रह जाएगी? देश अब जवाब नहीं, जवाबदेही चाहता है — तय जिम्मेदार, तय सजा।

“कवच नहीं, मौत की पटरियों पर भरोसा!” — बिलासपुर रेल हादसे ने देश की रेल सुरक्षा व्यवस्था को किया बेनकाब
11 यात्रियों की मौत, 20 घायल — रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से जवाब मांग रही छत्तीसगढ़ की जनता, कांग्रेस ने खोला मोर्चा
बिलासपुर।
देश की सबसे कमाई करने वाली दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ज़ोन की पटरियों पर मंगलवार की शाम मौत दौड़ी। बिलासपुर के पास गतौरा स्टेशन के निकट मालगाड़ी और कोरबा-मेमू लोकल ट्रेन की जबरदस्त टक्कर में 11 लोगों की जान चली गई और 20 यात्री घायल हुए।
हादसा सिर्फ एक ट्रेन की टक्कर नहीं थी — यह उस “सुरक्षा कवच” पर सवाल था, जिसका वादा केंद्र सरकार ने पूरे देश की रेल व्यवस्था के लिए किया था।


रेल मंत्री से जनता का सवाल — आखिर यह हादसा क्यों हुआ?


छत्तीसगढ़ की जनता का एक ही सवाल है — “जब तकनीक थी, संसाधन थे, और वादे किए गए थे, तो फिर कवच क्यों नहीं था?”
देश के रेल मंत्री अश्विनी कुमार वैष्णव से अब जवाब मांगा जा रहा है कि
“कवच सिस्टम आखिर देश के सबसे मुनाफ़ेदार ज़ोन बिलासपुर में क्यों नहीं लगाया गया?”
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस हादसे को “तकनीकी विफलता और प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम” बताते हुए रेल मंत्री के इस्तीफ़े की मांग कर दी है।
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा —
“रेल मंत्री खुद बताएं कि 27,000 करोड़ रुपए कमाने वाले जोन में सुरक्षा कवच लगाने की फुर्सत क्यों नहीं मिली? या फिर यात्रियों की जान का मूल्य केवल आंकड़ों तक सीमित है?”
रेल प्रशासन का बुलेटिन — 11 की मौत, ₹50,000 की तात्कालिक राहत
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे ने आधिकारिक बयान में कहा है कि हादसे में 11 लोगों की मौत और 20 के घायल होने की पुष्टि हुई है।
सभी घायलों को बिलासपुर और आसपास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।
रेल प्रशासन ने प्रत्येक घायल यात्री को ₹50,000 की अग्रिम सहायता राशि प्रदान करने की घोषणा की है।
घायलों में मथुरा भास्कर (55), चौरा भास्कर (50), गीता देबनाथ (30), सोनी यादव (25), रश्मि राज (34), प्रीतम कुमार (18), शैलेश चंद्र (49), अशोक दीक्षित (54) जैसे यात्री शामिल हैं।
रेलवे ने कहा कि जांच दल गठित कर दी गई है और रिपोर्ट जल्द रेलवे बोर्ड को सौंपी जाएगी।
कवच सिस्टम — था देश की सुरक्षा का वादा, पर जोन में एक भी इंजन नहीं सुसज्जित
देश में रेलवे के पास इलेक्ट्रिक और डीज़ल मिलाकर करीब 15,000 इंजन हैं।
इनमें से सिर्फ 1,290 इंजनों में ही “कवच” (Automatic Train Protection System) लगाया गया है।
यह वही सिस्टम है जो लोको पायलट की गलती या सिग्नल फेल होने की स्थिति में ट्रेन को अपने आप रोक देता है — यानी हादसा होने से पहले ब्रेक लग जाता।
पर विडंबना देखिए —
बिलासपुर ज़ोन, जिसने बीते वित्तीय वर्ष में ₹27,000 करोड़ की कमाई की, उसके किसी भी इंजन में कवच सिस्टम नहीं है।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद में खुद कहा था कि “जुलाई 2025 तक 10,000 इंजनों में कवच लगाने का लक्ष्य है।”
लेकिन सवाल उठता है — जब कवच सिस्टम पर 2016 से परीक्षण और 2020 से कार्यान्वयन शुरू हो गया था, तो दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे अब तक इससे वंचित क्यों है?
लापरवाही या तकनीकी असफलता? सिग्नल फेल या ओवरस्पीड?
प्रारंभिक जांच में सिग्नल फेल्योर और ओवरस्पीडिंग को संभावित कारण बताया जा रहा है, लेकिन अभी तक किसी अधिकारी की जवाबदेही तय नहीं की गई है।
रेलवे सूत्रों का कहना है कि “मालगाड़ी को रुकने का सिग्नल मिला था, लेकिन सिग्नल सिस्टम ने जवाब दे दिया।”
लोको पायलट ने आपात ब्रेक लगाए, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि “यदि कवच सिस्टम होता, तो ट्रेन खुद-ब-खुद रुक जाती, और यह टक्कर टल जाती।”
कांग्रेस का आक्रमण — ‘रेल मंत्री को इस्तीफ़ा देना चाहिए’
छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने इसे “मानव निर्मित हादसा” बताया है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ट्वीट कर कहा —
“रेल मंत्री को बताना चाहिए कि 10 साल से वादे किए जा रहे हैं, फिर भी सुरक्षा कवच ज़मीन पर क्यों नहीं दिखता?
यह हादसा रेल प्रशासन की आपराधिक लापरवाही का नतीजा है।”
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने भी दिल्ली तक मोर्चा खोलते हुए कहा —
“हमें जांच रिपोर्ट नहीं, जिम्मेदारी चाहिए। जब तक रेल मंत्री इस्तीफ़ा नहीं देते, आंदोलन जारी रहेगा।”
आंकड़ों में सुरक्षा, जमीनी स्तर पर मौतें
रेल मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल औसतन 100 से अधिक ट्रेन हादसे होते हैं।
लेकिन “कवच”, “एंटी-कोलिजन सिस्टम” और “स्मार्ट मॉनिटरिंग” जैसे तकनीकी प्रोजेक्ट्स अब तक सिर्फ सीमित पटरियों तक सिमटे हैं।
तकनीक और जमीनी अमल के बीच यह दूरी ही यात्रियों की मौत की वजह बनती जा रही है।
बिलासपुर जोन — देश की रेल संपदा का धड़कता दिल
छत्तीसगढ़ का बिलासपुर जोन देश की औद्योगिक रेल ढांचा का मेरुदंड है।
यह अकेले देश की कुल माल ढुलाई का 18% संभालता है, और कोयला परिवहन से हर साल अरबों की कमाई देता है।
ऐसे ज़ोन में सुरक्षा कवच का अभाव केवल तकनीकी भूल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की नीति असफलता मानी जा रही है।
जवाबदेही तय होनी चाहिए, मुआवजा नहीं
इस हादसे ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि
“भारत की पटरियाँ अब केवल गति की नहीं, जवाबदेही की भी मांग कर रही हैं।”
जब देश का सबसे समृद्ध रेलवे ज़ोन एक कवच तक से वंचित रह जाए,
जब सिग्नल फेल होने पर 11 लाशें ट्रैक पर बिछ जाएं,
और जब हर हादसे के बाद वही बयान — “जांच चल रही है” — सुनाई दे,
तो यह सिर्फ दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता कहलाती है।गतौरा हादसा केवल एक टक्कर नहीं, बल्कि उस सिस्टम की क्रूर विडंबना है जो “आधुनिक भारत की रेल” का दावा करता है, लेकिन अपने यात्रियों को अब भी तकनीकी सुरक्षा नहीं, केवल भरोसे की मौत देता है।
अब देश पूछ रहा है —
“कब तक चलेगी यह रेल बिना कवच, और कब मिलेगा इस लापरवाही का जवाब?”

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