पार्ट 1— सावधान बिलासपुर पुलिस…13 साल बाद भी अपराधियों की गोली और नेताओं की साठगांठ ने शहर को बना दिया है ‘गुंडों का बाजार’
मोहम्मद इसराइल बबलू | बिलासपुर
छत्तीसगढ़ की पुलिस फाइलों में दर्ज वह एक रात आज भी ‘एनकाउंटर इतिहास’ की आखिरी पंक्ति मानी जाती है — 23 जुलाई 2012 की रात, जब बिलासपुर का कुख्यात बदमाश चुन्नू गर्ग पुलिस की गोली से ढेर हुआ था। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद साय सरकार के कार्यकाल में दुर्ग पुलिस ने एक बदमाश को ढेर किया था।
कांस्टेबल किरीट राम पटेल की हत्या के बाद हुई इस कार्रवाई ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। यह छत्तीसगढ़ का पहला और अब तक का आखिरी एनकाउंटर था, जिसने एक ओर पुलिस की साख बचाई, तो दूसरी ओर अपराध जगत को कुछ वक्त के लिए ठंडा कर दिया।
लेकिन, तेरह साल बाद वही बिलासपुर फिर से उसी पुराने रास्ते पर लौटता दिख रहा है — जहां गुंडों के पास जमीन है, कारोबार है, नेटवर्क है… और पुलिस के पास सिर्फ सूची।

शराब, जमीन और पुलिस — चुन्नू गर्ग का साम्राज्य
तोरवा से लेकर कोरबा तक चुन्नू गर्ग का नाम दहशत का पर्याय था।
शुरुआत में उसने शराब माफियाओं और स्थानीय पुलिस के संरक्षण में कई वारदातें कीं। थानों में उसकी आवाज चलती थी, मुखबिरी के नाम पर कई पुलिसकर्मी उससे ‘कर्जदार’ बन गए थे।
पर कहानी तब पलटी, जब नए थाना प्रभारी से उसकी जमी नहीं। संरक्षण खत्म हुआ और पुलिस पीछे पड़ गई।
जेल में सालों गुजारने के बाद 2012 में बाहर निकला चुन्नू गर्ग — और महज़ दूसरे दिन ही उसने एक दंपति को बंधक बनाकर रातभर पीटा।
तखतपुर में अपने रिश्तेदार की रायफल लूट ली और प्रेमिका के साथ फरारी काटने निकल गया।
कांस्टेबल किरीट पटेल की शहादत और पांच घंटे का ‘ऑपरेशन चुन्नू’
23 जुलाई 2012 की रात — कोरबा के एक किराए के कमरे में चुन्नू गर्ग अपनी प्रेमिका के साथ था।
एक होमगार्ड और पुलिस कांस्टेबल ने शक के आधार पर खिड़की से झांका — तभी गोली चली…
कांस्टेबल किरीट पटेल के पेट में लगी गोली ने बिलासपुर और कोरबा पुलिस को हिला दिया।
उस वक्त कोरबा के एसपी थे 2003 बैच के आईपीएस सुंदरराज पी.
घटना के पांच घंटे के भीतर पूरी फोर्स को अलर्ट कर दिया गया। चुन्नू का मोबाइल ऑन था — पुलिस ने लोकेशन ट्रेस की और चांपा स्टेशन से उसे पकड़ लिया।
लेकिन गिरफ्तारी की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई।
रात तीन बजे खबर आई — किरीट पटेल की मौत हो गई।
कुछ ही मिनटों बाद दूसरी खबर — “कोरबा जंगल में पुलिस मुठभेड़ में चुन्नू गर्ग मारा गया।”
बिलासपुर ने राहत की सांस ली — पर अदालत ने सब बरी कर दिए
चुन्नू गर्ग की मौत के बाद पुलिस और आम लोगों ने राहत महसूस की।
शहर की गलियों में डर खत्म हुआ। लेकिन, केस अदालत में पहुंचा तो पुलिस की कहानी टिक नहीं पाई।
चुन्नू की प्रेमिका समेत चार अन्य आरोपी, जिन्हें हत्या और साजिश में जोड़ा गया था, साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिए गए।
कांस्टेबल की हत्या का मुख्य आरोपी मर चुका था, पर न्याय की फाइलों में सवाल बाकी रह गए।
बिलासपुर पुलिस का ट्रिगर क्यों नहीं दबा
2012 के बाद से बिलासपुर पुलिस ने किसी भी कुख्यात बदमाश पर ट्रिगर नहीं चलाया।
कानून का डर या तंत्र की नीति — वजह जो भी हो, शहर में गुंडागर्दी ने फिर पैर पसार लिए हैं।
छोटे-छोटे ‘छुटभैये डॉन’ अब जमीनों की दलाली और कब्जे के कारोबार में उतर चुके हैं।
कलेक्टर द्वारा छोटी जमीनों की रजिस्ट्री पर रोक ने इनके नेटवर्क को हिला दिया है, और अब ये गैंग विवादित जमीनों पर कब्जे की नई ‘रणनीति’ बना रहे हैं।
गुंडा लिस्ट लंबी, कार्रवाई सीमित
बिलासपुर पुलिस हर बार “गुंडा लिस्ट” तैयार करने और “थाने में बुलाकर समझाइश देने” की बात करती है।
पिछले दिनों रिवरव्यू में हुए दो गुटों के बीच खुलेआम झगड़े के बाद पुलिस ने दिखावे की सख्ती तो की, लेकिन फाइलें फिर ठंडी पड़ गईं।
शहर के कई इलाकों में अवैध नशीली सामग्रियों का व्यापार, जमीन के सौदे और सट्टे का खेल बदमाशों की मुख्य कमाई का जरिया बन चुके हैं।
13 साल बाद सवाल वही — क्या बिलासपुर फिर चुन्नू जैसे किसी का इंतज़ार कर रहा है?
एक कांस्टेबल की शहादत ने 2012 में पुलिस को ‘एनकाउंटर की ताकत’ दिखाई थी,
पर आज वही पुलिस कानूनी पेचीदगियों और राजनीतिक दबाव के बीच जैसे थमी हुई है।
अपराधी बढ़े हैं, लेकिन “कठोर कार्रवाई” अब सिर्फ बयान बनकर रह गई है।
बिलासपुर की गलियों में लोग आज भी उस रात की कहानी सुनाते हैं —
जब पुलिस ने पहली और आखिरी बार ट्रिगर दबाया था…
और एक शहर कुछ सालों के लिए सांस लेकर सो सका था।



