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मस्तूरी में माफिया राज! — गोलियों से गूंजता बिलासपुर, प्रशासन की नींद क्यों नहीं खुली?

Mohammed Israil
Mohammed Israil  - Editor
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पृथक छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक हत्या, बदला, खनन, ठेकेदारी और राजनीति के संगठित गढ़ में बदलता गया पूरा जिला


मोहम्मद इसराइल बबलू | बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
बिलासपुर शहर की सड़कों पर गोलियों की गूंज अब इतिहास नहीं, बल्कि चेतावनी है — उस व्यवस्था के लिए जो वर्षों से हिंसा की धूल में आंखें मूंदे बैठी है।
मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र आज छत्तीसगढ़ का नया ‘क्राइम जंक्शन’ बन चुका है, जहां सत्ता, खनन, जुआ, ठेकेदारी और हथियारबंद गिरोहों का गठजोड़ लगातार खून बहा रहा है।
2004 से लेकर अब तक का सिलसिला बताता है — इस जिले ने हर दशक में अपने एक ‘रविकांत’, एक ‘सुशील पाठक’, एक ‘संजू त्रिपाठी’ खोए हैं, और हर बार कानून बस दर्शक बना रहा।
गोलीबारी का इतिहास: शहर में मौत की पहली गूंज 2004 में
बिलासपुर में गोलीकांडों की शुरुआत साल 2004 से मानी जाती है।
तब तोरवा थाना क्षेत्र के लालखदान में रविकांत राय की सरेआम गोली मारकर हत्या की गई थी।
इस हत्याकांड का नाम हिस्ट्रीशीटर रंजन गर्ग और शशि गर्ग गैंग से जुड़ा था।


वही गैंग बाद में शहर में पहला संगठित ‘शूटआउट नेटवर्क’ बना — जिसने अपराध को खुलेआम ‘वर्चस्व’ का हथियार बनाया।
2010: होटल इंटरसिटी और सरकंडा का ‘ब्लडी ईयर’
8 जून 2010 को दयालबंद स्थित होटल इंटरसिटी में गुड्डा सोनकर और उसके जीजा ननका घोरे को गोली मार दी गई।
दोनों की मौत ने पूरे शहर में दहशत फैला दी थी।
उसी साल 19 सितंबर 2010 को सरकंडा में पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
पत्रकार की हत्या आज तक अनसुलझी है — आरोपियों के नाम कभी सार्वजनिक नहीं हुए, और केस जांच के अंधेरे में दफन हो गया।
2022: बिलासपुर में हिंसा का साल — माफिया खुलेआम, गोलियाँ आम
साल 2022 में जिले ने संगठित गैंग-हिंसा का सबसे खतरनाक चेहरा देखा
14 दिसंबर 2022 को सकरी क्षेत्र में हिस्ट्रीशीटर संजू त्रिपाठी की गोली मारकर हत्या की गई —
हत्या में उसके ही भाई ने बाहर से शूटर बुलाए थे।
कुछ महीने पहले पचपेड़ी में दुकान संचालक मंगतूराय की पिस्टल से हत्या,
गोंडपारा में ज्वेलरी शॉप संचालक दीपक सोनी पर फायरिंग,
और उसलापुर में सती श्री ज्वेलरी शॉप पर लूट के दौरान गोलीबारी जैसी घटनाएँ दर्ज की गईं।
इन सबने साबित किया कि बिलासपुर अब अपराधियों की ‘सेफ ज़ोन’ में तब्दील हो चुका है।
मस्तूरी — ‘खदानों का इलाका’ या ‘गैंगों की प्रयोगशाला’?
मस्तूरी विधानसभा क्षेत्र अब अपराध का ऑपरेशनल हब बन चुका है।
यहां अवैध उत्खनन, जुआ-सट्टा, भू-माफिया, और ठेकेदारी पर कब्जे की लड़ाइयाँ रोजाना की बात हैं।
खनन स्थलों से लेकर रेत घाटों तक, हर जगह गैंग सक्रिय हैं —
जो ठेके और जमीन के नाम पर एक-दूसरे के खिलाफ हथियार उठा रहे हैं।
स्थानीय सूत्र बताते हैं कि —
“यहां एक ही गांव में दो गुट हैं — एक खदान संभालता है, दूसरा ट्रांसपोर्ट।
दोनों के बीच झगड़ा हुआ तो बंदूकें चल जाती हैं,
पुलिस रिपोर्ट करती है और फिर मामला ठंडा पड़ जाता है।”
माफिया का नेटवर्क: मस्तूरी से निकलकर पूरे जिले पर कब्ज़े की कोशिश
अब मस्तूरी के अपराधी संगठित गैंगों में तब्दील हो चुके हैं।
उनके पास बाहरी राज्यों से आए शूटर,
स्थानीय ठेकेदारों से जुड़ा पैसा,
और राजनीतिक संरक्षण की परतें मौजूद हैं।
ये लोग अब सिर्फ अपने गांव या ब्लॉक में नहीं,
बल्कि पूरा जिला — रतनपुर, कोटा, सकरी, तखतपुर तक — अपना इलाका मानने लगे हैं।
यह नेटवर्क तीन हिस्सों में बंटा है —
1️⃣ खनन और ठेका माफिया,
2️⃣ जुआ-सट्टा नेटवर्क,
3️⃣ जमीन और राजनीतिक ‘फंड चैनल’।
इन सबका सिरा एक ही जगह जाकर मिलता है — बंदूक और पैसों का सौदा।
ठेकेदारी में रंगदारी — ‘बोली नहीं, गोली चलेगी’
बिलासपुर में सरकारी टेंडर और ठेके अब सिर्फ़ दफ़्तरों में तय नहीं होते।
यहां एक नया फार्मूला चल पड़ा है —
“जो बोलेगा, वो बचेगा नहीं।”
स्थानीय ठेकेदार बताते हैं कि
खनन से लेकर सड़कों तक के कॉन्ट्रैक्ट पर माफिया का एकाधिकार है।
जो ठेके में बोली लगाने की हिम्मत करता है, उसे धमकी, हमला या झूठे केस में फंसा दिया जाता है।
इसकी पुष्टि कई एफआईआर और गुप्त रिपोर्टों में दर्ज है।
राजनीतिक संरक्षण और पुलिस की चुप्पी
जिले के जानकार लोग कहते हैं —
“माफिया बदलते हैं, मगर उनका संरक्षण वही रहता है।”
पुलिस अक्सर फाइल बंद कर देती है या “जांच जारी” का स्टिकर लगाकर दबाव टाल देती है।
बड़ी हत्याओं में भी चार्जशीट तैयार होने में महीनों लग जाते हैं।
साल 2010 में पत्रकार सुशील पाठक की हत्या इसका सबसे बड़ा उदाहरण है —
आज तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
मस्तूरी में बढ़ती अपराध संस्कृति — ‘डर का लोकतंत्र’
मस्तूरी अब सिर्फ एक विधानसभा नहीं रही,
यह एक अलग सत्ता तंत्र बन चुकी है,
जहां लोग पुलिस से नहीं,
स्थानीय दबंगों से “सुरक्षा” मांगते हैं।
ग्रामीण कहते हैं कि
“यहां गोली की आवाज़ सुनकर लोग भागते नहीं,
बल्कि पूछते हैं — कौन गिरा?”
बिलासपुर की बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर सवाल
इतनी घटनाओं के बाद भी जिला प्रशासन ने
कोई सख्त संयुक्त कार्रवाई नहीं की।
खनन, हथियार और भूमि विवादों की मॉनिटरिंग कागज़ों में ही सीमित है।
अगर यही रफ्तार रही तो मस्तूरी का अपराध मॉडल
पूरा बिलासपुर और आसपास के जिलों तक फैल जाएगा।
गोलियों की कालक्रमिका (2004–2022):
वर्षस्थानघटनामुख्य आरोपी/प्रसंग2004लालखदानरविकांत राय की हत्यारंजन गर्ग गैंग2010होटल इंटरसिटीगुड्डा सोनकर व ननका घोरे की हत्यास्थानीय गिरोह2010सरकंडापत्रकार सुशील पाठक की हत्याअज्ञात2022सकरीहिस्ट्रीशीटर संजू त्रिपाठी की हत्याभाई व बाहरी शूटर2022पचपेड़ीमंगतूराय की हत्याग्राहक द्वारा गोली2022गोंडपाराज्वेलर दीपक सोनी पर फायरिंगलूट के इरादे से2022उसलापुरसती श्री ज्वेलरी शॉप फायरिंगडकैत गिरोह
अंतिम तथ्य
मस्तूरी और बिलासपुर अब छत्तीसगढ़ का नया क्राइम बेल्ट बन चुके हैं।
यहां की जमीन, खदानें, ठेके और सत्ता — सब पर अपराधियों की पकड़ गहराती जा रही है।
2004 से चली यह बंदूक की राजनीति अब प्रशासनिक शांति को चीर चुकी है।
अगर व्यवस्था ने समय रहते चेहरा नहीं बदला,
तो अगली गोली कब और कहां चलेगी — कोई नहीं जानता।

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