“बिलासपुर स्मार्ट सिटी या अतिक्रमण सिटी?” — जवाली नाले पर निगम की कार्रवाई सवालों के घेरे में, रसूखदारों पर अब तक चुप्पी क्यों?
बिलासपुर। मोहम्मद इसराइल बबलू
नगर निगम प्रशासन ने शनिवार को जवाली नाला क्षेत्र में सरकारी जमीन पर किए गए कब्जों के खिलाफ बुलडोज़र चलाया। सीमांकन रिपोर्ट के आधार पर बाउंड्री वॉल और कुछ निर्माण हटाए गए। मगर सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सचमुच पर्याप्त है?
क्योंकि जहां आम लोगों की दीवारें गिरीं, वहीं नाले किनारे खड़ी ऊँची इमारतें और विशाल कमर्शियल कॉम्प्लेक्स जस के तस खड़े हैं।
ये वही निर्माण हैं जो वर्षों से नियम विरुद्ध तरीके से नाले की ओर खुल रहे हैं, जहां किसी भी नक्शे को स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए थी।



स्मार्ट सिटी की विडंबना: अतिक्रमण पर बुलडोज़र, मगर रसूखदार सुरक्षित
नगर निगम की यह कार्रवाई दरअसल एक “आधी लड़ाई” साबित हो रही है।
क्योंकि बिलासपुर में नियम विरोधी निर्माण का यह सिलसिला पूरे शहर में जारी है,
जहां कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, आवासीय कॉलोनियाँ और भवन नाले, नजूल व सरकारी भूमि पर खुलेआम खड़े किए जा रहे हैं।
निगम की भवन शाखा और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (टीसीपी) विभाग की नाक के नीचे
कई मंज़िलों के कॉम्प्लेक्स पास हुए, नाले के मुहाने तक दीवारें खड़ी कर दी गईं।
यह सब तब हुआ जब हर स्तर पर अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अमले को इसकी जानकारी थी।


जवाली नाले का उद्देश्य था आवागमन, न कि कारोबार
जवाली नाले के ऊपर सड़क बनाने का मूल उद्देश्य था स्थानीय लोगों के लिए सुगम आवागमन सुनिश्चित करना।
मगर आज हालत यह है कि नाले की दोनों ओर से कब्ज़े बढ़ते-बढ़ते सड़क तक पहुंच चुके हैं।
कई स्थानों पर नाले के ऊपर तक दुकाने और भवन बनाए गए हैं।
नाले के ऊपर बनी सड़क अब व्यापारियों के लिए पार्किंग जोन और गली बन चुकी है,
जबकि आम लोगों के लिए यहां से गुजरना मुश्किल हो गया है।
जल निकासी, सड़क सुरक्षा और शहरी सौंदर्य—तीनों पर इसका दुष्प्रभाव साफ दिख रहा है।




“नियम मृत, व्यवस्था भ्रष्ट” — जनता के सवाल
बिलासपुर की जनता का कहना है कि “नियम अब सिर्फ आम लोगों के लिए हैं।”
जवाली नाले पर हुए कब्जों का मामला इसका सबसे ताज़ा उदाहरण है।
जहां निगम ने कुछ छोटे निर्माण गिराए, वहीं बड़े-बड़े कॉम्प्लेक्स और प्रभावशाली नामों के भवन अछूते हैं।
लोगों का आरोप है कि भवन शाखा के अधिकारी, पूर्व नगर निगम इंजीनियर और फील्ड अफसरों की मिलीभगत से
यह पूरा अतिक्रमण सालों में खड़ा हुआ है।
इसके बावजूद अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी पर जांच या निलंबन तक की कार्रवाई नहीं हुई है।
“बिलासपुर अतिक्रमण मॉडल बनता जा रहा है”
जवाली नाला सिर्फ एक उदाहरण है।
गुरुनानक चौक, लिंक रोड, मंगला, तिफरा, और नेहरू नगर जैसे क्षेत्रों में भी
सरकारी जमीनों, नालों और हरित पट्टियों पर कब्ज़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
शहर को “स्मार्ट सिटी” का तमगा तो मिला, लेकिन
नियम और पारदर्शिता की जगह ‘प्रभाव’ और ‘प्रवृत्ति’ ने ले ली है।
प्रशासनिक चुप्पी पर उठते सवाल
जवाली नाले के नजदीकी क्षेत्र में 40 से अधिक कमर्शियल परिसरों और आवासीय भवनों के निर्माण में
स्पष्ट रूप से नगर निगम अधिनियमों का उल्लंघन हुआ है।
इनमें से कई भवन नाले की दिशा में खुले हैं, जो पर्यावरण और सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करते हैं।
नगर निगम के उच्चाधिकारियों, जिला प्रशासन और स्थानीय सांसद तक को इसकी जानकारी है,
फिर भी अब तक किसी रसूखदार निर्माण पर बुलडोज़र नहीं चला।
शहर की जनता का सवाल : आखिर कब जागेगा प्रशासन?
बिलासपुर की जनता का सवाल अब सीधा है —
“क्या निगम की कार्रवाई सिर्फ दिखावा है?”
“कब चलेगा बुलडोज़र उन ऊंची इमारतों पर जो नियमों को ठेंगा दिखाकर बनीं?”
“कब जवाबदेह बनेंगे वे अधिकारी, जिनके संरक्षण में यह सब संभव हुआ?”



