गरियाबंद : झोलाछाप डॉक्टरों की लापरवाही से मौत — आदिवासी समाज में आक्रोश

पेंड्रा गांव में पुरुषोत्तम ध्रुव की जान गई, झोलाछापों ने 30 हजार ठगे — पुलिस ने मर्ग कायम किया, आदिवासी परिषद ने 50 लाख मुआवजे की मांग रखी
Mohammed israil
बिलासपुर ,रायपुर,गरियाबंद, 26 अगस्त। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से महज चार किमी दूर पेंड्रा गांव में झोलाछाप डॉक्टरों का काला खेल फिर उजागर हुआ है। पाइल्स की शिकायत पर कथित इलाज के दौरान पुरुषोत्तम ध्रुव की मौत हो गई। परिजनों ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि बिना डिग्री वाले झोलाछापों ने न केवल गलत ऑपरेशन किया बल्कि 30 हजार रुपए ठगने के बाद मौके से फरार हो गए।

ग्रामीणों के अनुसार मृतक पुरुषोत्तम ध्रुव को झोलाछाप बबलू तांडी और संजू राजपूत ने इलाज के नाम पर तीन दिनों तक कमरे में बंद रखा। पाइल्स का इलाज बताते हुए मलद्वार में चीरा लगा दिया, जिससे नस कट गई और अत्यधिक खून बहने से हालत बिगड़ गई।
24 अगस्त को परिजन जब कमरे में पहुंचे तो पुरुषोत्तम लहूलुहान हालत में तड़प रहे थे। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
इलाके के आदिवासी विकास परिषद और सामाजिक संगठनों ने इस घटना पर कड़ा रोष जताया है। मृतक परिवार को 50 लाख रुपए मुआवजा और आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जितेंद्र चंद्राकर ने बताया कि कोतवाली थाना क्षेत्र में मर्ग कायम किया गया है, पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई होगी।
1: झोलाछाप डॉक्टर — मौत का सौदा

- ग्रामीण भारत में 70% इलाज झोलाछापों के भरोसे।
- छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में यह समस्या और गहरी।
- अब तक 200 से अधिक मौतें (2000-2025) गलत इलाज के कारण।
- पाइल्स, इंजेक्शन और ऑपरेशन के झूठे इलाज से सबसे ज्यादा मौतें।
(स्रोत: BMJ अध्ययन, PARI रिपोर्ट, TOI)
2: कानूनी सख्ती
- IIPC धारा 106 :
- झोलाछाप की लापरवाही से मौत → 5 साल कैद।
- पंजीकृत डॉक्टर की लापरवाही से मौत → 2 साल कैद व जुर्माना।
- राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम (धारा 34): बिना पंजीकरण इलाज → अपराध।
- कई बार अभियान चलाए गए, लेकिन निगरानी ढीली पड़ते ही झोलाछाप फिर सक्रिय।
हाल की घटनाएं
- इंदौर (मप्र): बच्चों की मौत के बाद दर्जनों झोलाछापों पर कार्रवाई।
- बिहार: झोलाछापों के गलत इंजेक्शन से कई बच्चों की जान गई।
- छत्तीसगढ़: ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की कमी से लोग मजबूरी में इन्हीं पर निर्भर।
चेतावनी भी बेअसर
गरियाबंद की यह दर्दनाक घटना चेतावनी है कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था मज़बूत किए बिना झोलाछापों का आतंक खत्म नहीं होगा। केवल कानून नहीं, बल्कि लगातार निगरानी और जागरूकता अभियान ही समाधान है।



