





✍️ मोहम्मद इसराइल
छत्तीसगढ़ की मिट्टी से जुड़ा पहला त्योहार हरेली तिहार पूरे प्रदेश में पारंपरिक उल्लास और सांस्कृतिक रंग में सराबोर होकर मनाया गया। खेत-खलिहान, बैल, औजार और पर्यावरण से जुड़ी आस्था के इस पर्व पर गांवों में विशेष पूजा-अर्चना की गई और बच्चों ने गेड़ी चढ़कर परंपरा की थाती को जीवंत किया। घर-घर में लोटा-डोरी, नीम की पत्तियों और बैल पूजा के साथ हरियाली और समृद्धि की कामना की गई।
रायपुर : मुख्यमंत्री निवास में हरेली उत्सव: छत्तीसगढ़ी परंपराओं की झलक, पारंपरिक कृषि यंत्रों के साथ बिखरी सांस्कृतिक छटा
छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की खुशबू लिए हरेली तिहार का पारंपरिक उत्सव आज मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के निवास में विधिवत रूप से आरंभ हुआ। छत्तीसगढ़ एक ऐसा प्रदेश है, जहाँ प्रत्येक अवसर और कार्य के लिए विशेष प्रकार के पारंपरिक उपकरणों एवं वस्तुओं का उपयोग होता आया है। हरेली पर्व के अवसर पर मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में ऐसे ही पारंपरिक कृषि यंत्रों एवं परिधानों की झलक देखने को मिली, जो छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं।
काठा
सबसे बाईं ओर दो गोलनुमा लकड़ी की संरचनाएँ रखी गई थीं, जिन्हें ‘काठा’ कहा जाता है। पुराने समय में जब गाँवों में धान तौलने के लिए काँटा-बाँट प्रचलन में नहीं था, तब काठा से ही धान मापा जाता था। सामान्यतः एक काठा में लगभग चार किलो धान आता है। काठा से ही धान नाप कर मजदूरी के रूप में भुगतान किया जाता था।
खुमरी
सिर को धूप और वर्षा से बचाने हेतु बांस की पतली खपच्चियों से बनी, गुलाबी रंग में रंगी और कौड़ियों से सजी एक घेरेदार संरचना ‘खुमरी’ कहलाती है। यह प्रायः गाय चराने वाले चरवाहों द्वारा सिर पर धारण की जाती है। पूर्वकाल में चरवाहे अपने साथ ‘कमरा’ (रेनकोट) और खुमरी लेकर पशु चराने निकलते थे। ‘कमरा’ जूट के रेशे से बना एक मोटा ब्लैंकेट जैसा वस्त्र होता था, जो वर्षा से बचाव के लिए प्रयुक्त होता था।
कांसी की डोरी
यह डोरी ‘कांसी’ नामक पौधे के तने से बनाई जाती है। पहले इसे चारपाई या खटिया बुनने के लिए ‘निवार’ के रूप में प्रयोग किया जाता था। डोरी बनाने की प्रक्रिया को ‘डोरी आंटना’ कहा जाता है। वर्षा ऋतु के प्रारंभ में खेतों की मेड़ों पर कांसी पौधे उग आते हैं, जिनके तनों को काटकर डोरी बनाई जाती है। यह डोरी वर्षों तक चलने वाली मजबूत बुनाई के लिए उपयोगी होती है।
झांपी
ढक्कन युक्त, लकड़ी की गोलनुमा बड़ी संरचना ‘झांपी’ कहलाती है। यह प्राचीन समय में छत्तीसगढ़ में बैग या पेटी के विकल्प के रूप में प्रयुक्त होती थी। विशेष रूप से विवाह समारोहों में बारात के दौरान दूल्हे के वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, पकवान आदि रखने के लिए इसका उपयोग किया जाता था। यह बांस की लकड़ी से निर्मित एक मजबूत संरचना होती है, जो कई वर्षों तक सुरक्षित बनी रहती है।
कलारी
बांस के डंडे के छोर पर लोहे का नुकीला हुक लगाकर ‘कलारी’ तैयार की जाती है। इसका उपयोग धान मिंजाई के समय धान को उलटने-पलटने के लिए किया जाता है।

बिलासपुर जिले की ड्रोन दीदी तखतपुर ब्लॉक के गांव चक्राकुंड निवासी श्रीमती प्रितमा वस्त्रकार और मस्तूरी ब्लॉक के गांव पोड़ी सीपत निवासी सुश्री सीमा वर्मा ने आधुनिकता और परंपरा के संगम की मिसाल पेश करते हुए ड्रोन की पूजा कर हरेली तिहार मनाया। खेती के इस नए साथी को नमन कर ड्रोन दीदियों ने संदेश दिया अब खेती में टेक्नोलॉजी से हरित क्रांति का आगाज़ होगा।
संस्कृति में सजीव और निर्जीव सभी के प्रति सम्मान और आभार की भावना: मुख्यमंत्री
किसानों की खुशहाली और समृद्धि हमारा प्रमुख ध्येय
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ कर रहा है ऐतिहासिक प्रगति: डॉ. रमन सिंह
किसानों की खुशहाली और हरियाली का उत्सव बना मुख्यमंत्री निवास का हरेली तिहार आयोजन
रायपुर सिविल लाइन स्थित मुख्यमंत्री निवास में आज हरेली पर्व का गरिमामय आयोजन हुआ। त्यौहार मनाने के लिए पूरे परिसर को ग्रामीण परिवेश में सजाया गया था। इस मौके पर मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि किसानों की खुशहाली और समृद्धि हमारी सरकार का मुख्य ध्येय है। हरेली तिहार छत्तीसगढ़ की परंपरा, प्रकृति और खेती-किसानी से जुड़ा ऐसा पर्व है, जो हमें अपने मूल से जोड़ता है। आज पूरा छत्तीसगढ़ हरेली की खुशी में डूबा है। मुख्यमंत्री निवास में भी यह पर्व पूरे उल्लास और पारंपरिक तरीके से मनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि बस्तर से लेकर सरगुजा तक हरेली को मनाने का अपना-अपना अंदाज है। लेकिन सभी जगह इसका रंग एक ही है, आस्था और उत्साह एक ही है। जिस तरह प्रकृति हमारा ख्याल रखती है, उसी तरह हमें भी प्रकृति का ख्याल रखना चाहिए। हरेली केवल खेती-किसानी का त्यौहार नहीं है, बल्कि यह अपनी धरती की हरियाली और प्रकृति पूजा का भी त्यौहार है। छत्तीसगढ़ महतारी की कृपा हम सब पर बरसाती रहे और सभी किसान भाई खुशहाल रहें। यही मंगल कामना है
उन्होंने कहा कि श्री साय ने कहा कि हमारी सरकार ने किसानों को 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदने और 21 क्विंटल प्रति एकड़ की सीमा तय कर ऐतिहासिक निर्णय लिया है, जिससे किसानों को सीधा लाभ मिल रहा है। हम सभी ने 2047 तक विकसित छत्तीसगढ़ का सपना देखा है और इसके लिए हमने अपना विजन डॉक्यूमेंट भी बनाया है। हमारी सरकार राज्य से भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए पूरी तरह से प्रयास कर रही है।
हरेली त्योहार पर विधानसभा अध्यक्ष डॉ रमन सिंह ने कहा कि हरेली छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपरा और किसान जीवन का उत्सव है। इस पावन अवसर पर मैं प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ। यह त्योहार प्रकृति, कृषि और पशुधन से जुड़े हमारे जीवन मूल्यों की गूंज है। उन्होंने कहा कि ऐसा विश्वास है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती स्वयं धरती पर आकर किसानों के बीच उपस्थित होते हैं और उनके खेतों का निरीक्षण करते हैं। यही कारण है कि इस दिन किसान अपने कृषि यंत्रों, हल-बैल और खेत-खलिहानों की पूजा करते हैं।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में आज छत्तीसगढ़ कृषि के क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रगति कर रहा है। किसानों को समर्थन मूल्य पर धान खरीद और विभिन्न योजनाओं में 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया है। यह हिंदुस्तान में किसी भी राज्य द्वारा किसानों के लिए किया गया सबसे बड़ा कार्य है। यह दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ में एक ऐसा मुख्यमंत्री है, जो केवल घोषणाएं नहीं करता, बल्कि धरातल पर किसानों के पसीने की कीमत चुका रहा है।
इस अवसर पर उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव, श्री विजय शर्मा, स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल, कृषि मंत्री श्री राम विचार नेताम, राजस्व मंत्री श्री टंक राम वर्मा, महिला बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े, विधायकगण, निगम मंडल आयोग के अध्यक्ष सहित जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य लोग उपस्थित थे।
रायपुर : मुख्यमंत्री निवास में हरेली उत्सव: दिखी परंपरा और प्रगति की अनूठी झलक
पारंपरिक-आधुनिक कृषि यंत्रों, लोक वेशभूषाओं की आकर्षक प्रदर्शनी
मुख्यमंत्री ने सराहा, बोले-हरेली प्रकृति के प्रति सम्मान का तिहार
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता और कृषि परंपराओं का प्रतीक हरेली तिहार इस वर्ष मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के निवास परिसर में अत्यंत हर्षाेल्लास और गरिमा के साथ मनाया गया। इस अवसर पर राज्य की समृद्ध विरासत, पारंपरिक कृषि यंत्रों, लोक परिधानों, खानपान और आधुनिक कृषि तकनीकों का समन्वय एक अद्भुत नजारे के रूप में सामने आया। कार्यक्रम स्थल को पारंपरिक छत्तीसगढ़ी रंग-रूप में सजाया गया था, जहां ग्रामीण परिधान पहने अतिथि, कलाकार और आमजन लोक संस्कृति में रमे हुए नजर आए।
हरेली उत्सव के दौरान मुख्यमंत्री निवास में परम्परागत और आधुनिक कृषि यंत्रों का प्रदर्शन किया गया। मुख्यमंत्री श्री साय ने प्रदर्शनी स्थल का भ्रमण कर विभिन्न पारंपरिक यंत्रों और वस्तुओं का अवलोकन किया। प्रदर्शनी में काठा, खुमरी, झांपी, कांसी की डोरी और तुतारी जैसे ऐतिहासिक कृषि उपकरणों को प्रदर्शित किया गया। कृषि विभाग द्वारा आयोजित आधुनिक कृषि यंत्रों की प्रदर्शनी, जिसमें नांगर, कुदाली, फावड़ा, रोटावेटर, बीज ड्रिल, पावर टिलर और स्प्रेयर जैसे यंत्रों का प्रदर्शन किया गया। ‘काठा’ वह परंपरागत मापक है जिससे पुराने समय में धान तौला जाता था; ‘खुमरी’ बांस और कौड़ियों से बनी छांव प्रदान करने वाली टोपी है; ‘झांपी’ शादी-ब्याह में उपयोग होने वाली वस्तुएं रखने की बांस से बनी पेटी; ‘कांसी की डोरी’ खाट बुनने में काम आती है और ‘तुतारी’ पशुओं को संभालने में उपयोग होती है।
मुख्यमंत्री श्री साय ने यह भी कहा कि हरेली तिहार केवल पर्व नहीं, बल्कि यह हमारे कृषि जीवन, पशुधन और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। इस अवसर पर आयोजित प्रदर्शनी किसानों, युवाओं और आमजनों के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक रही। मुख्यमंत्री ने इन उपकरणों की जानकारी लेकर कृषि तकनीकी प्रगति की सराहना की और कहा कि छत्तीसगढ़ की खेती परंपरा और तकनीक के समन्वय से और भी अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनेगी। किसानों को नई तकनीकों की जानकारी देकर हम राज्य की कृषि उत्पादकता को ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आम नागरिक, किसान, छात्र और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। इस आयोजन ने छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और कृषि नवाचार के अद्वितीय संगम को सजीव रूप में प्रस्तुत किया, जो राज्य की समृद्ध परंपरा और विकासशील सोच का प्रतीक है।
रायपुर : मुख्यमंत्री निवास में हरेली उत्सव: पारंपरिक लोक यंत्रों के साथ सुंदर नाचा का हो रहा आयोजन
मुख्यमंत्री निवास में हरेली तिहार के अवसर पर पारंपरिक लोक यंत्रों की गूंज और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक छटा के साथ सुंदर नाचा का आयोजन किया जा रहा है। पूरा परिसर उत्सवमय वातावरण से सराबोर है। ग्रामीण परिवेश की जीवंत छवि इस सुंदर माहौल में साकार हो गई है। कहीं सुंदर वस्त्रों में सजे राउत नाचा कर रहे कलाकारों की रंगत बिखरी है, तो कहीं आदिवासी कलाकार पारंपरिक लोक नृत्य की मोहक प्रस्तुतियाँ दे रहे हैं। छत्तीसगढ़ का अद्भुत ग्रामीण लैंडस्केप अपनी संपूर्ण सांस्कृतिक सुंदरता के साथ यहां सजीव रूप में अवतरित हो गया है। विभिन्न प्रकार की लोक धुनों में छत्तीसगढ़ी संगीत का माधुर्य अपने चरम पर है।
राउत नाचा, छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति का एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनृत्य है, जो विशेष रूप से दीपावली के अवसर पर गोधन पूजा के दौरान किया जाता है। यह नृत्य विशेषकर यादव समुदाय (ग्वाला/गोपालक वर्ग) द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और भगवान श्रीकृष्ण तथा गोधन की आराधना का प्रतीक माना जाता है।
राउत नाचा की परंपरा छत्तीसगढ़ में सदियों पुरानी है। इसे गोवर्धन पूजा से जोड़ा जाता है, जब ग्वाल-बाल भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की स्मृति में यह नृत्य करते हैं। नर्तक रंग-बिरंगे परिधानों में सजते हैं, सिर पर पगड़ी धारण करते हैं और हाथों में लाठी थामे रहते हैं। उनके वस्त्रों को कौड़ियों, घुंघरुओं और अन्य सजावटी वस्तुओं से अलंकृत किया जाता है।
राउत नाचा की प्रस्तुति के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों — जैसे ढोल, मांदर और नगाड़ा — का प्रयोग होता है। इनकी थाप पर नर्तक सामूहिक रूप से तालबद्ध होकर नृत्य करते हैं।
यह नृत्य केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, श्रम की महत्ता, पशुपालन के योगदान और सांस्कृतिक गौरव का संदेश भी देता है। नाचा के साथ गाए जाने वाले गीतों को ‘राउत गीत’ कहा जाता है, जिनमें धर्म, वीरता, प्रेम और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन होता है।

किसानों के मान-सम्मान और स्वाभिमान का तिहार, जो कृषि संस्कृति और किसानी सभ्यता का तिहार है- हरेली तिहार
🌳छत्तीसगढ़, जिसे भारत का ’धान का कटोरा’ कहा जाता है, सिर्फ कृषि प्रधान राज्य ही नहीं, बल्कि यह अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, रीति-रिवाज़ और त्योहारों के लिए भी प्रसिद्ध है। इन सबमें सबसे पहला और विशेष पर्व है -’हरेली तिहार’। यह पर्व न केवल कृषि से जुड़ा हुआ है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ी जीवनशैली की आत्मा को अभिव्यक्त करता है। इसके अलावा यह लोकपर्व कृषि जीवन की शुरुआत का प्रतीक के साथ लोक परंपराओं, पर्यावरण प्रेम और सामाजिक एकता का भी उत्सव है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में ’हरेली त्योहार’ का विशेष स्थान है। हरेली शब्द ही हरियाली से निकला हुआ है और इस त्योहार का उद्देश्य भी है कृषि, प्रकृति, पशुधन और स्वास्थ्य के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना। दूसरे शब्दों में हरेली शब्द “हरियाली” से आया है, जो वर्षा ऋतु की ताजगी और खेतों की हरितिमा को दर्शाता है।
यह पर्व ग्रामीणों के लिए सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक भावनात्मक, सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है, जो मिट्टी से जुड़े उनके प्रेम को दर्शाता है। परंपरागत रूप से हरेली में हल-बैल, कृषि उपकरणों और वृक्षों की पूजा की जाती है। यह लोक मानस की उस धारणा को पुष्ट करता है; जहां प्रकृति व पुरुषार्थ के मध्य गहन सामंजस्य स्थापित होता है। परंतु वर्तमान समय में, यह पर्व केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व की पुनर्पुष्टि करता है।
🌿 हरेली कब मनाया जाता है?
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में यह पर्व सावन माह की अमावस्या को मनाया जाता है, जब खेतों की मिट्टी अपनी नम्रता में लिपटी होती है, और आसमान से अमृत-सा जल बरसता है।
🧑🌾 क्यों मनाया जाता है?
हरेली का पर्व मुख्य रूप से किसानों का पर्व है। इस दिन तक किसान धान की खेती का एक चरण पूरा करता है और कृषि कार्य से संबंधित हल, कुदाली एवं फावड़े जैसे औजारों का काम पूरा होने पर औजारों की पूजा करके किसान कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए; उन्हें विश्राम देता है। यह परंपरा दर्शाती है कि किसान अपने औजारों को देवता की तरह मानता है, क्योंकि वही उसके जीवन का आधार होते हैं। कृषक न केवल भूमि के उपजाऊपन का उत्सव मनाता है, बल्कि श्रम को भी देवत्व प्रदान करता है। इसके अलावा खेती – किसानी की व्यस्तताओं से राहत होने पर खुशी में स्थानीय ग्रामीण पकवान गुलगुला और मीठा चीला बनाते है। यह पारंपरिक व्यंजन किसान लोग घर में तैयार कर खाते और खिलाते हैं। इन पकवानों में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू, स्वाद और अपनापन झलकता है।
🌱 हरेली तिहार कैसे मनाया जाता है?
त्यौहार में चारों ओर धरती हरियाली से भरी होती है। गांव के पौनी या बैगा घर – घर जाकर गांव के सभी घरों के चौखट में नीम की डालियां खोंचकर बधाइयां देते हैं; जिसे बुरी शक्तियों से सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। नीम को प्राकृतिक औषधि के रूप में भी पहचाना जाता है।
🐂 इस दिन गांव के युवक/युवतियां लोग छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेल गिल्ली- डंडा, भौंरा, फुगड़ी, खो-खो, डंडा- पचरंगा आदि खेलते है। सबसे प्रमुख खेलों में से एक है -’गेड़ी चढ़ना’। बच्चे बांस की बनी लाठी पर चढ़कर दौड़ लगाते हैं। यह न केवल खेल है, बल्कि संतुलन और साहस की परख भी है।यह परंपरा आज भी ग्रामीण इलाकों में जीवित है और यह दर्शाती है कि हमारी संस्कृति में स्वास्थ्य और परंपरा साथ-साथ चलते हैं। पूर्ववर्ती छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इस खेल को प्रोत्साहित करते हुए ’गेड़ी दौड़’ को एक राज्यस्तरीय प्रतियोगिता का रूप दिए थे। ग्रामीण क्षेत्रों में बैल दौड़, कुश्ती और पारंपरिक खेलों का आयोजन होता है। महिलाएं घरों में पीठा, चिला, फरा जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाती हैं और परिवार के साथ मिलकर त्योहार का आनंद लेती हैं।
🌏आधुनिक युग में हरेली का महत्व:-
आज जब आधुनिकता और शहरीकरण तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में हरेली जैसे त्योहारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। ये त्योहार हमें प्रकृति से जुड़ने, पारंपरिक जीवनशैली को अपनाने और सामूहिकता में जीने का संदेश देते हैं। पूर्ववर्ती सरकार द्वारा ’हरियर छत्तीसगढ़ अभियान’ की शुरुआत भी इसी परंपरा से प्रेरित था, जहाँ हरियाली और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया गया था।
शहरों में बसे हुए लोग; जिनसे अपनी जड़ों का सम्बन्ध विच्छेद हो गया है, उनके लिए हरेली पुनर्संवाद का निमंत्रण है- एक पुकार जो कहती है, “वापस लौटो मिट्टी की ओर, जहाँ से जीवन ने अंगड़ाई ली थी।” वर्तमान समय में कृत्रिमता और बाज़ारीकरण ने जीवनशैली को स्वाभाविकता से दूर कर दिया है, तब हरेली जैसे पर्व हमारे सांस्कृतिक पुनःस्थापन के संवाहक बन सकते हैं। यह पर्व जैविक खेती, देसी बीजों और लोक-परंपराओं को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा देता है। जब संपूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक असंतुलन और पर्यावरणीय आपातकाल की कगार पर खड़ा है, तब हरेली जैसे उत्सव वैश्विक विमर्श में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यह एक लोक-पहल है, जो बिना किसी सरकारी नीति के, प्रकृति संरक्षण और स्थायी जीवनशैली का संदेश देती है। हरेली हमें सिखाता है कि जड़ों से जुड़कर ही हम समृद्धि की शाखाएं फैला सकते हैं।
🤝 हरेली का सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव-
जहाँ आधुनिक त्योहारों में उपभोक्तावाद की चमक है, वहीं हरेली सामूहिकता, समरसता और परंपरा के गहन सौंदर्य से ओतप्रोत है। यह पर्व स्थानीयता का उत्सव है, जिसमें ना कोई प्रदर्शन है और ना ही कोई कृत्रिमता। यह जन-जीवन की वास्तविकताओं के सबसे निकट खड़ा पर्व है।
यह त्योहार गांवों में सामूहिकता, सहयोग और प्रकृति के प्रति श्रद्धा को प्रकट करता है। इस प्रकार हरेली छत्तीसगढ़ का पहला त्योहार होने के नाते न केवल कृषि चक्र की शुरुआत का संकेत देता है, बल्कि यह प्रदेश की आत्मा को भी उजागर करता है। यह पर्व हमें प्रकृति से जुड़ने, परंपराओं को सहेजने और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने की प्रेरणा देता है। हरेली की हरियाली में छत्तीसगढ़ की संस्कृति की गहराई और जीवन की सरलता झलकती है। ऐसा लोक पर्व जो छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, पर्यावरणीय चेतना और सामाजिक समरसता को एक सूत्र में पिरोता है।
हरेली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के मन, मिट्टी और मेहनत का प्रतीक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन का आधार प्रकृति, परिश्रम और परंपरा है। जब किसान अपने औजारों को सजाता है, जब बच्चे गेड़ी पर चढ़ते हैं, जब नीम की डालियाँ दरवाजे पर लटकती हैं, तब लगता है जैसे पूरी धरती मुस्कुरा रही हो। हरेली हमें सिखाता है कि सादगी में भी सौंदर्य होता है, मिट्टी में भी शक्ति होती है, और परंपरा में भी प्रगति छिपी होती है।
🤝 नव दृष्टिकोण से हरेली को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता-
आज आवश्यकता है कि हरेली जैसे लोकपर्वों को केवल ग्रामीण परिवेश की घटनाएं न मानकर, शहरी जीवन में भी पुनःस्थापित किया जाए। स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संस्थानों में इस पर्व के आयोजन से नई पीढ़ी में अपनी जड़ों के प्रति जिज्ञासा और सम्मान का भाव विकसित होगा। हरेली के माध्यम से हम यह सीख सकते हैं कि जीवन केवल उपभोग नहीं, बल्कि प्रकृति से तादात्म्य और परिश्रम से परिपूर्ण समर्पण भी है।
वर्तमान में वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण और सांस्कृतिक क्षरण के दौर में हरेली एक ऐसा दीप है; जो गांव की चौपाल से लेकर विश्व मंच तक रोशनी बिखेर सकता है। हरेली पर्व उस मूक संवाद का प्रतीक है; जो किसान और प्रकृति के मध्य घटित होता है। यह संवाद केवल अन्न के रूप में नहीं, संस्कृति के रूप में फलता-फूलता है।
आजकल जब हम अतीत से कटकर आधुनिकता की अंधी दौड़ में व्यस्त हैं, हरेली हमें ठहरकर सोचने का अवसर देता है कि क्या हम अपने मूल से दूर हो चुके हैं? और यदि हाँ, तो हरेली हमें उस ओर लौटने की रहनुमा बन सकती है। यह परंपरा स्वच्छता और स्वास्थ्य दोनों का सामूहिक पाठ है, जिसे आज की महामारी-प्रप्रवण दुनिया में पुनः आत्मसात करना होगा।
ऐसे हमर छत्तीसगढ़ के पहली लोक परब सुग्घर हरिहर तिहार ’हरेली’ के आप सब ल झांपी-झांपी, टुकना-टुकना बधाई…
कृषि और किसान!
हरेली का मूल आधार !!
हरेली_तिहार
- डॉ. जीतेन्द्र सिंगरौल,

मस्तूरी विधानसभा के ग्राम पंचायत महमंद में छत्तीसगढ़ के पहली तिहार हरेली की महा उत्सव का कार्यक्रम रखा गया
मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए जिला पंचायत अध्यक्ष राजेश सूर्यवंशी डॉ कृष्णमूर्ति बांधी, भाजपा नेता चंद्रप्रकाश सूर्या
दिन गुरुवार ग्राम पंचायत महमंद में दिन भर हरेलीउत्सव का माहौल रहा
छत्तीसगढ़ के पहली त्यौहार के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता नारियल फेंक प्रतियोगिता एवं 400 से ज्यादा बुजुर्गों का सम्मान साल एवं श्रीफल से किया 500 से ज्यादा बच्चे एवं युवा गेड़ी दौड़ प्रतियोगिता में भाग लिए जीतने वाले प्रतिभागियों को क्रमशः 500 1000 एवं 1500 रुपए का सम्मान स्वरूप राशि एवं साल श्री फल से सम्मानित किया गया मुख्य अतिथि के रूप में राजेश सूर्यवंशी जिला पंचायत अध्यक्ष डीआर कृष्णमूर्ति बांधी पूर्व कैबिनेट मंत्री,, अरुना चंद्रप्रकाश सूर्या जिला पंचायत सभापति स्वास्थ्य परिवार कल्याण सरपंच पूजा विक्की निर्मलकर , बी पी सिंह मंडल अध्यक्ष रवि बरगाह, रेलवे मंडल अध्यक्ष मुकेश राव, राकेश सूर्यवंशी अमित रजक कुलदीप रजक ओमप्रकाश सूर्यवंशी शैलेंद्र तिवारी, माधव साहू, वार्ड पंच शत्रुघ्न कश्यप, वार्ड पंच रामा टंडन जी, संजय सूर्यवंशी, गंगे निर्मलकर, सीना यादव, पूर्व सरपंच धरमलाल सूर्यवंशी, ललन सूर्यवंशी, हर्ष केडिया शिवम, किशन रजक, आदि मुख्य रूप से शामिल हुए



