चीन में छत्तीसगढ़ की बेटियों ने लिखी भारत की जीत की कहानी, चार-चार गोल से चमकीं गीता यादव और मधु सिदार; बहतराई की हॉकी अकादमी बनी अंतरराष्ट्रीय सपने की नर्सरी






बिलासपुर |
एक तरफ चीन का अंतरराष्ट्रीय हॉकी मैदान था, दूसरी तरफ भारत की जर्सी में छत्तीसगढ़ की दो बेटियां—गीता यादव और मधु सिदार। यह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में खेलने की कहानी नहीं थी। यह उस सफर का अगला अध्याय था, जो बिलासपुर के बहतराई स्थित हॉकी प्रशिक्षण केंद्र से शुरू होकर चीन के मोकी शहर तक पहुंचा।
जूनियर महिला हॉकी एशिया कप में भारतीय टीम ने जब अपनी ताकत दिखाई तो छत्तीसगढ़ की इन दोनों खिलाड़ियों की स्टिक भी लगातार बोलती रही। टूर्नामेंट में गीता और मधु ने चार-चार गोल किए। दक्षिण कोरिया, मलेशिया और पाकिस्तान के खिलाफ अहम मुकाबलों में उनके गोल भारतीय आक्रमण का हिस्सा बने।
और इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि दोनों खिलाड़ी किसी महानगर की हाई-प्रोफाइल स्पोर्ट्स अकादमी से नहीं निकलीं। उनका प्रशिक्षण केंद्र बिलासपुर का बहतराई है—वही आवासीय हॉकी अकादमी, जहां मैदान, अनुशासन, कोचिंग और लगातार अभ्यास ने उनके सपनों को आकार दिया।
चीन के मैदान पर छत्तीसगढ़ की दस्तक
जूनियर महिला हॉकी एशिया कप में भारत के अभियान के दौरान गीता यादव और मधु सिदार लगातार प्रभाव छोड़ती रहीं।
दक्षिण कोरिया के खिलाफ मधु ने गोल किया।
इसके बाद मलेशिया के खिलाफ भारत की 11-1 की बड़ी जीत में गीता यादव ने दो गोल दागकर अपनी आक्रामक क्षमता दिखाई।
लेकिन टूर्नामेंट का एक मुकाबला ऐसा था, जिसकी चर्चा लंबे समय तक होती रहेगी।
भारत-पाकिस्तान मुकाबला और 19-0 का स्कोर
भारत ने पाकिस्तान को 19-0 से हराया। इस एकतरफा मुकाबले में छत्तीसगढ़ की दोनों बेटियों ने दो-दो गोल किए।
गीता और मधु के लिए यह केवल स्कोरबोर्ड पर दर्ज चार गोल नहीं थे। यह उस प्रशिक्षण और संघर्ष का परिणाम था, जिसने उन्हें गांव और छोटे शहरों की सीमाओं से निकालकर अंतरराष्ट्रीय हॉकी के मैदान तक पहुंचाया।
पूरे टूर्नामेंट में दोनों खिलाड़ियों के खाते में चार-चार गोल रहे।
लेकिन मधु की कहानी स्कोरकार्ड से कहीं बड़ी है
17 साल की मधु सिदार के लिए चीन तक पहुंचना अपने आप में एक कहानी है।
जशपुर के एक छोटे से गांव से आने वाली मधु ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती हैं जहां छह भाई-बहनों के बीच किसान पिता के कंधों पर परिवार की जिम्मेदारियां हैं। गांव का सामाजिक माहौल भी ऐसा रहा, जहां लड़कियों का जीवन अक्सर घर की चारदीवारी तक सीमित रह जाता है।
ऐसे वातावरण में खेल को करियर बनाना आसान नहीं था।
मगर मधु ने खेल को चुना और फिर खेल ने उन्हें देश की जर्सी तक पहुंचा दिया।
उनकी कहानी का सबसे अहम संदेश शायद यही है—प्रतिभा को अगर सही मंच, प्रशिक्षण और अवसर मिल जाए तो परिस्थितियां उसकी राह हमेशा नहीं रोक सकतीं।
शुरुआत हॉस्टल से हुई, मंजिल टीम इंडिया बनी
मधु को बचपन से ही खेलकूद में रुचि थी। प्राइमरी स्कूल के दिनों में उनकी खेल प्रतिभा को देखकर पिता ने उन्हें खेल परिसर के हॉस्टल में दाखिल कराया।
वहीं प्रशिक्षकों ने उनके भीतर हॉकी की संभावना देखी और उन्हें इस खेल की ओर बढ़ाया।
फिर आया वर्ष 2022।
आठवीं कक्षा पूरी करने के दौरान मधु को जानकारी मिली कि बिलासपुर के बहतराई में हॉकी एक्सीलेंस सेंटर शुरू हुआ है। उन्होंने ट्रायल दिया और चयनित हो गईं।
यहीं से उनके जीवन का रास्ता बदल गया।
बहतराई में उन्हें सिर्फ हॉकी की तकनीक नहीं मिली। उन्हें वह वातावरण मिला जहां लगातार अभ्यास, प्रतिस्पर्धा और बेहतर खिलाड़ियों के साथ खेलने ने उनकी क्षमता को धीरे-धीरे निखारा।
22 लड़कों के बीच अकेली लड़की
मधु के सफर का एक ऐसा हिस्सा है जो उनके खेल विकास को समझने के लिए खासा महत्वपूर्ण है।
प्रशिक्षकों ने उन्हें 22 लड़कों के बीच अकेले अभ्यास करने का मौका दिया।
यह आसान परिस्थिति नहीं थी। लेकिन मधु के लिए यही चुनौती प्रशिक्षण का बड़ा माध्यम बन गई।
रेस्ट टाइम में भी उन्होंने अभ्यास जारी रखा। वह अल्फाज भैया के साथ अभ्यास करती थीं, जो गोलकीपर के रूप में टीम इंडिया के असेसमेंट कैंप तक पहुंच चुके हैं।
मधु के मुताबिक इसी लगातार अभ्यास ने उनके खेल में सुधार किया और उन्हें इंडिया कैंप तक पहुंचने में मदद मिली।
फिर वह क्षण आया जिसका सपना हर युवा खिलाड़ी देखता है—टीम इंडिया की जर्सी।
पहली अंतरराष्ट्रीय यात्रा और मैच से एक दिन पहले चीन पहुंचना
अंतरराष्ट्रीय हॉकी का पहला अनुभव हर खिलाड़ी के लिए खास होता है। मधु के लिए यह अनुभव थोड़ा और कठिन था।
वीजा और पासपोर्ट बनने में देरी के कारण वह टूर्नामेंट शुरू होने के बाद मैच से महज एक दिन पहले चीन पहुंचीं।
देश से बाहर पहली बार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता खेलने पहुंची मधु स्वाभाविक रूप से दबाव में थीं। उनके मुताबिक शुरुआत के दो-तीन मुकाबलों में नर्वसनेस के कारण वह अपनी क्षमता के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकीं।
लेकिन अंतरराष्ट्रीय खेल की असली परीक्षा यही होती है—गलत शुरुआत के बाद खिलाड़ी कितनी तेजी से वापसी करता है।
मधु ने वापसी की।
और फिर सेमीफाइनल में दक्षिण कोरिया के खिलाफ उनका प्रदर्शन टूर्नामेंट की यादगार तस्वीरों में शामिल हो गया।
सेमीफाइनल में पहला वार मधु का
दक्षिण कोरिया जैसी मजबूत टीम के खिलाफ सेमीफाइनल में भारत को शुरुआत से ही कड़ी चुनौती का सामना करना था।
इस मुकाबले में मधु सिदार ने भारत की ओर से पहला गोल दागा।
इसके बाद भारतीय टीम ने लय पकड़ी और मुकाबला 5-1 से अपने नाम कर लिया।
मधु के लिए यही टूर्नामेंट का सबसे यादगार पल रहा—कप जीतना अपनी जगह, लेकिन पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतनी बड़ी टीम के खिलाफ सेमीफाइनल में पहला गोल करना उनके लिए विशेष अनुभव रहा।
पाकिस्तान के खिलाफ मैच से पहले टीम ने कहा—इतिहास रचना है
भारत और पाकिस्तान का मुकाबला खेल से आगे बढ़कर भावनाओं से जुड़ जाता है। इस बार जूनियर एशिया कप में पाकिस्तान पहली बार हिस्सा ले रहा था।
मधु के मुताबिक बैंगलुरू कैंप के दौरान ही टीम को पाकिस्तान के साथ होने वाले मुकाबले की जानकारी थी।
मैच से एक दिन पहले टीम में एक ही चर्चा थी—इस मुकाबले को यादगार बनाना है।
मैदान पर भारतीय टीम ने वही किया।
स्कोरबोर्ड पर 19-0 का परिणाम दर्ज हुआ और छत्तीसगढ़ की दोनों खिलाड़ियों ने उसमें अपनी भूमिका निभाई।
गीता ने दो गोल किए और मधु ने भी दो बार गेंद को पाकिस्तान के गोलपोस्ट में पहुंचाया।
दिल्ली का बुलावा आया, लेकिन मधु ने छत्तीसगढ़ को चुना
मधु के सफर में एक और महत्वपूर्ण मोड़ आया।
वर्ष 2023 में उन्हें दिल्ली स्थित एक सेंटर से भी बुलावा मिला था।
लेकिन उन्होंने वहां जाने के बजाय छत्तीसगढ़ में ही प्रशिक्षण जारी रखने का फैसला किया।
बहतराई उनके लिए केवल प्रशिक्षण केंद्र नहीं रह गया था। यहां उन्हें अपने कोच, प्रशिक्षण व्यवस्था और वह वातावरण मिल चुका था जिसमें उन्होंने अपने खेल को विकसित किया था।
करीब चार साल एक्सीलेंस सेंटर से जुड़ी रहीं मधु इस व्यवस्था को अपने सफर का अहम हिस्सा मानती हैं।
गांव से बहतराई, बहतराई से चीन
मधु की कहानी को अगर एक लाइन में समेटना हो तो शायद यह कहा जा सकता है—
जशपुर के गांव से निकली एक लड़की, बिलासपुर के बहतराई मैदान पर तैयार हुई और चीन में भारत की जर्सी पहनकर एशिया कप जीतने वाली टीम का हिस्सा बनी।
यह बदलाव केवल भौगोलिक दूरी का नहीं है।
यह उस मानसिक दूरी को पार करने की कहानी भी है जिसमें छोटे गांव की एक लड़की के लिए अंतरराष्ट्रीय खेल की कल्पना कभी दूर की चीज लग सकती है।
आज वही खिलाड़ी अगले लक्ष्य की बात कर रही है।
अब नजर जूनियर वर्ल्ड कप पर
मधु के लिए एशिया कप मंजिल नहीं है।
उनका अगला बड़ा लक्ष्य अगले साल होने वाला जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप है। वह भारत के लिए यह खिताब जीतना चाहती हैं।
इसके बाद उनका लक्ष्य सीनियर भारतीय टीम में जगह बनाना है।
और सबसे बड़ा सपना?
ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना।
यानी चीन में मिली जीत उनके सफर का अंत नहीं, बल्कि अगले बड़े मंच की शुरुआत है।
बहतराई में तैयार हो रही है अगली अंतरराष्ट्रीय पीढ़ी
गीता यादव और मधु सिदार की सफलता का एक दूसरा पहलू भी है।
इन दोनों खिलाड़ियों की अंतरराष्ट्रीय पहचान के साथ बिलासपुर की आवासीय हॉकी अकादमी और बहतराई खेल प्रशिक्षण केंद्र भी चर्चा में आया है।
खेल एवं युवा कल्याण विभाग की आवासीय हॉकी अकादमी में प्रशिक्षण ले रहीं दोनों खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन कर यह दिखाया है कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों में पैदा नहीं होती।
जरूरत होती है उसे पहचानने, प्रशिक्षित करने और सही मंच तक पहुंचाने की।
बहतराई इस कहानी में उसी मंच की भूमिका निभाता है।
बिलासपुर पहुंचीं तो मिला भव्य स्वागत
जूनियर महिला हॉकी एशिया कप जीतने के बाद मधु सिदार के बिलासपुर पहुंचने पर जिला खेल परिसर से लेकर बहतराई स्टेडियम तक उनका स्वागत किया गया।
सहायक संचालक ए. एक्का, वरिष्ठ प्रशिक्षक राकेश टोप्पो, खेलो इंडिया एक्सीलेंस सेंटर बिलासपुर के हाई परफॉर्मेंस मैनेजर कुलदीप बरार, खेल अधिकारी सुशील अमलेश, हॉकी संघ के अध्यक्ष सहित अन्य लोगों ने उनका स्वागत किया और मोमेंटो देकर सम्मानित किया।
वीजा-पासपोर्ट से जुड़ी अड़चन के दौरान भी अधिकारियों और खेल विभाग की ओर से प्रयास किए जाने का उल्लेख मधु ने किया।
गीता-मधु की कहानी का असली अर्थ
किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट का स्कोरकार्ड कुछ आंकड़े दर्ज करता है—किसने कितने गोल किए, कौन जीता, किस अंतर से जीत मिली।
लेकिन खिलाड़ियों का सफर स्कोरकार्ड में दर्ज नहीं होता।
मधु के चार गोलों के पीछे जशपुर का गांव है।
छह भाई-बहनों का परिवार है।
किसान पिता की जिम्मेदारियां हैं।
हॉस्टल के शुरुआती दिन हैं।
बहतराई का मैदान है।
22 लड़कों के बीच अभ्यास है।
दिल्ली से आया बुलावा है जिसे उन्होंने ठुकराया।
वीजा-पासपोर्ट की देरी है।
चीन पहुंचने से ठीक एक दिन पहले की बेचैनी है।
पहले मैचों की नर्वसनेस है।
और फिर दक्षिण कोरिया के खिलाफ सेमीफाइनल में भारत के लिए पहला गोल है।
दूसरी तरफ गीता यादव की कहानी भी उसी बहतराई की मेहनत से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चार गोल तक पहुंचती है।
यही वजह है कि चीन में भारतीय टीम की जीत के साथ छत्तीसगढ़ के लिए यह कहानी केवल पदक या स्कोर की कहानी नहीं है।
यह उस भरोसे की कहानी है कि अगर गांव की लड़की को मैदान मिल जाए, तो उसकी मंजिल सिर्फ गांव तक सीमित नहीं रहती।
बहतराई के मैदान से निकली इन दोनों बेटियों ने फिलहाल एशिया का मंच पार कर लिया है।
अब नजर दुनिया के मंच पर है।



